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जितने ऊँचे होते हैं पहाड़
उतनी गहरी होती हैं
उनकी यादें

ज़मीनों की टकराहट के
उबलने से पहले
ज्वालामुखियों के फटने से पहले
लावा की नदियों के उफनने से पहले
वे याद करते हैं
उस वक्त को
जब न सागर था न जमीन
न पानी न आकाश
केवल थी आग
निगलती हुई लपटे

जितने गहरे होते हैं पहाड़
उतनी उथली होती हैं
उनकी यादें

आगों से उपजती आगों के बारे में
भूख, जलन और प्यासों के बारे में
जानवर के आदमी
और आदमी के जानवर बनने के बारे में


चार जनवरी २००२ में कविता की ये पंक्तियाँ लिखते वक्त कभी ये तो नहीं सोचा था कि कभी उत्तराखण्ड में घटित हादसों जैसी स्थिति भी आ सकती है। किन्तु इस बात में सन्देह नहीं कि इन हादसों की पदचाप बहुत पहले से सुनाई देने लगी थी। प्रकृति को हमने ना केवल जीवन से बेदखल किया अपितु साहित्य से भी बाहर निकाल फैंका है। पंत, महादेवी के आसन तो नहीं हिला पाये लेकिन फणीश्वर नाथ रेणु जैंसे महान प्रकृति प्रेमी साहित्यकारों की रचनाएँ अचानक हाशिये में डाल दी गई। प्रकृति और उसका नियमन पुरातन बातें बन गईं। यह तो सत्य है कि आगे बढ़ने के लिये पुरातन तरीके को छोड़ना पड़ेगा, लेकिन पुरातन में संचित ज्ञान का अल्प स्वल्प तो गाँठ में बन्धा होना चाहिये, फिर चाहे हम अपने समय के साथ चले या उससे भी आगे निकलने की कोशिश करें।

जिन दिनों तीर्थ यात्राओं का चलन आरंभ हुआ था, उन दिनों लोग जीवन के अन्तिम दिनों में तीर्थ यात्राओं पर जाते थ। केरल के पुराने उपन्यासों से पता चलता है कि उन दिनों काशी तीर्थ के लिये जाने वालों से भी वापिस आने की आशा नहीं की जाती थी। कारण स्पष्ट है कि उन दिनों इस तरह की यात्राएँ अध्यात्मिक भाव से की जाती थी, और संचार के साधनों के पर्याप्त साधनों के अभाव में दुष्कर भी होती थीं। अब संचार साधनों की सुविधा हो गई है, लेकिन इसी सुविधा ने अध्यात्म का बाजारीकरण कर दिया। पहाड़ की गोद में नदियो के रास्तों पर निर्मित हजारों होटलों और पहाड़ की छाती दलती लाखों गाड़ियों ने पहाड़ को भी तनिक डगमगाया। निसन्देह उसका नुक्सान जितना पहाड़ या नदियों को हुआ, उतना आदम जात को भी...इस सब के पीछे प्रकृति की अवमानना की वृत्ति को कोई नहीं नकार सकता। हमारे देश में जो गिने चुने पहाड़ नदियाँ आदि बचे हैं, हम ना उन्हें बचा पा रहे हैं और ना ही उनके लिये कुछ काम कर पा रहे हैं, इन खूबसूरत तौहफों को भी हमने राजनीति और व्यवसाय का माध्यम बना कर रख दिया है।

यूं तो आपदा के वक्त साहित्य की दृष्टि से कोई सीधा कर्म अपेक्षित नहीं है, जब लाखों हजारों मर रहे हों, उस वक्त त्रासदी पर कवितायें रचना या कहानियाँ लिख मारना उतनी ही जुगुप्सा उत्पन्न कर सकता है, जितनी कि राजनेताओं के बयान। साहित्य का काम त्रासदी से कहीं पहले से आरम्भ होता है और वह भी कागज पर नहीं बल्कि यथार्थ में, जैसे कि केरल मे कवयित्री सुगत कुमारी करती है, प्रकृति के अपहरण के विरोध में आवाज उठाते हुए वे उन स्थानों पर जाती हैं, जहाँ प्रकृति का अपहरण हो रहा है, जैसे कि नदियाँ , पहाड़, जंगल आदि और लोगों को इक्कट्ठा कर बड़ा साहित्यक विरोध प्रकट करती हैं, लोग कविता या कथाएँ सुनते -सुनाते हैं और संगठित होते जाते है.....ध्यातव्य है कि उनका कार्य आपदा का इंतजार नहीं करता।

विश्व में ऐसा होता रहा है, मेडिलिन में पैंतीस साल पुराने कवितोत्सव को आरम्भ करते हुए फरनान्दो और उसके साथियों ने ड्रग माफिया के डर से बचने के लिये कविता का सहारा लिया और आज मेडिलिन विश्व का सबसे अधिक कविता से जुड़ा शहर है, जहाँ फुटबाल देखने से ज्यादा लोग कविता सुनने आते हैं। .नोर्वे में हेल्गे पहाड़ों और समुद्र के किनारों से ही नहीं तिनकों और घास से भी प्रेम करने वाले कवि हैं, जिन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ कर कई प्राकृतिक स्थानो को बचाया है।

आखिर हम कब तक अपने दामन में नहीं झाँकेंगे, कब तक अपनी खोल से नहीं निकलेंगे?
कब तक अपने कवि कर्म के यथार्थ को नही समझेंगे, बस इसी सवाल के साथ, कृत्या का नया अंक...

इस अंक के कलाकार हैं कवि कलाकार प्रभात पाण्डे जी

सादर


रति सक्सेना

     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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