मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली
आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से
साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 
* All the legal application should be filed in Kerala, India, where the Kritya Trust registered.

 

 

 

 

        

 

वैश्विक पटल के इस कठिन दौर में विश्वबन्धुत्व की बात करना जितना मुश्किल है, उतना जरूरी भी है। मुश्किल इसलिये कि व्यवसायिकता के क्षेत्र में जहाँ बाह्य रूप से सब कुछ समान सा लग रहा है, उतनी ही तेजी से भीतरी खोखलापन उभरता जा रहा है। हालांकि बाहरी उत्थान या विकास किसी भी समाज या देश के लिये जितना जरूरी है, उतना ही आत्मीय अथवा सांस्कृतिक व कलात्मक उत्थान भी आवश्यक है। कविता का सम्बन्ध इसी आत्मीयता से है।
इस कठिन दौर में जब कि विश्व भर में भौतिक विकास की कोशिशे नाकाम सी लग रही हैं, अर्थव्यवस्था के तमाम नियम फीके पड़ रहे हैं, आत्मीय अथवा भीतरी विकास को भी दरअन्दाज किये जाने के कारण हम एक ऐसे रास्ते की और जो निसन्देह हमें मानवता की ओर नहीं ले जाता। है।
ऐसे कठिन दौर में कविता क्या कर सकती है, यह मेडिलिन पोइट्ड़ी फेस्टीवल से समझा जा सकता हैं जिसने २३ वर्षों में नशे और ड्रग की जमीन को कविता और कला की जमीन के रूप में पुनरप्रतिष्ठा दी। कृत्या इसी कड़ी में स्थापित वर्ल्ड पोइट्री मूवमेन्ट की फाउन्डर मेम्बर भी है।
कृत्या ने २००५ में एक छोटी सी कोशिश आरम्भ की थी, बिना किसी भूमिका और तैयारी के... और पूरे आठ वर्ष से हम इस कोशिश को अंजाम देने का प्रयास करते रहे। कृत्या में हमने अपने लिये कुछ दिशाएँ निर्धारित कीं, जैसे हम जमीनी भाषाओं से जुड़ी कविताओं और कलाओं की ओर स्वयम् पहुँचेंगे, कविता को केन्द्रित करते हुए अन्य कलाओं में भी कविता को खोजेंगे, और भारतीय भाषाओं को वैश्विक कविता से जोड़ने की कड़ी में अनुवाद को रेखांकित करेंगे।कविता महोत्सव को हमने कारपरेट से दूर रखते हुए सदैव सरकारी संस्थाओं एवं शिक्षा संस्थानों की सहायता मनाने की जिद भी रखी। इसी कड़ी में हम आठवां कविता महोत्सव मनाने वर्धा में एकत्रित हैं.


रति सक्सेना
और »

 

 

मैं बिल्कुल तुम्हारी तरह
चुन सकती हूँ
कि मुझे पीड़ित होना हैं
नहीं
गर तुमने चुन ही लिया है तो
तुम्हारे पास
पूछने को कुछ सवाल जरूर होंगे
और तुमसे पूछने के लिए
औरों के पास होंगे
तुमसे कहीं अधिक

TRIIN SOOMETS
*
अभी अधिक वक़्त नही बीता
मैंने दुनिया के विषय में रूचि लेनी शुरू की

मैं भटकती रही घंटों
सदमा पहुचने वाली यथार्थता से
वहां वापसी का कोई मोड़ नही था

सभी बातें कही जा चुकी थीं
सभी टेबल पर रखीं हैं

बाइबिल ,भविष्यवाणीयां .प्रचलित देव वाणियाँ
अन्य कवियों की उनमत्तता

ईश्वर ने ये सब कहा है मनुष्यों से

Zingonia Zingone
*
आओ ,हम गिरें
हम गिरें
जंगल ,पत्थर और लोहे के भीतर
आओ गिरें शरीर के भीतर

हर चीज़ जो अस्तित्व रखती है
हमारे साथ ही गिर जाती है

हम पानी होंठ तक उठाते हैं
पीते हैं
बूंदें गिर जाती हैं
ख़ाली जगह से
ख़ाली जगह गिरती है

Odveig Klyve

अन्य स्थान

रेल की पटरियां
कठोर रक्षक होती हैं
गाँव की जमीन के
चक्की के पाटों की.
और ,सीमेंट हमें बताती है
समय की नदी के बारे में
तुम्हे जिसे
जीतना है
एटलस ,

और कुचलना है चुम्बनों से

एक झुर्रीदार स्टेशन की घडी पर
आदमी का चित्र
हवा में लटक रहा है
जिसने अपने कंधे पर
एक लौकिक अंडा
उठा रखा है

रेल की पटरियां यहीं पैदा होती हैं
और पेड़ों और चौराहों से पोषित होती हैं
Annelisa Addolorato
जो मेरे अन्दर कैद है
वो एक औरत है
खूबसूरत और खोई खोई
तुम्हारी बदसूरत लालसाओं का अंत
Maryam Ala Amjadi
और »

 

बीयर का गिलास-A Glass of Beer

अचूक हत्या के लिए कारण की जरूरत नहीं, उसने कहा
अचूक हत्या के लिये पूर्ण वस्तु की जरुरत होती है
जैसा Auschwitz.में हुआ था
निश्चित रूप से शवदाह गृह में नही , बल्कि उसके बाद
काम के घण्टों के बाद
कहते हुए वह चुप्पी में डूब गया
बीयर के झाग को देखते हुए
एक घूँट भरते हुए वह बोला

अचूक हत्या प्रेम है
अचूक हत्या में कुछ भी पूर्ण नहीं होता
दिए जाने के अलावा
जितना तुम दे सको

यहां तक कि गले को मरोड़ने की यादें भी
अनन्त हैं
यहाँ तक कि वे चीखें
जिन्होंने मेरे हाथ कंपा दिये
यहाँ तक पेशाब जो शिष्टता की तरह
ठण्डी देह पर गिर गई
यहाँ तक कि जूते की एड़ियाँ जो
दूसरी अनन्तता जगाती है
यहाँ तक कि सन्नाटा
उसने झाग में देखते हुए कहा

सच है .. a decent arbeit macht frei,
लेकिन एक अचूक हत्या एक बून्द भी
नहीं गिराती
बच्चे के होंठों की तरह, उसने स्पष्ट किया
रेत या झाग की तरह
तुम्हारी तरह
जो ध्यान से सुन रहा है
घूंट भरते हुए

*
बर्बर-The Barbarians (Round Two)
व्यर्थ नही था कि हमने जंगलियों का इंतजार किया
शहर के चौक पर इकठ्ठा होना भी व्यर्थ नही था
व्यर्थ नही था कि हमारे महान लोगों ने सरकारी पौशाक पहन ली
और फिर खास मौके के लिये भाषणों का अभ्यास किया
व्यर्थ नही था कि हमने अपने मन्दिर तोड़ दिये
और नयों को उनका खुदा बना दिया
बिल्कुल वैसे ही जैसे कि अपनी किताबें जलाना
जिसमे उन जैसे मनुष्यों के लिए कुछ नही था
जैसी कि भविष्यवाणी थी बर्बर आये
और राजा से शहर की चाबी ले ली

लेकिन जब वे आये तो उस जमीन का लिबास पहना
उनकी परम्पराएँ 'अब शहर की परंपरा थी
और जब उन्होंने हमारी भाषा में आज्ञा देनी शुरु की
अब हम नही जानते
ये बर्बर कब हममे उतर गए


और »  

 

ए आर एस पोइतिका

कविता कोई पत्ते नही
हवा बुहार दे जिन्हें सड़कों पर
यह समन्दर भी नहीं
जिसपर लंगर डाल ले जहाज
नहीं है नीला आसमान
और स्वच्छ पर्यावरण
कविता दुनिया के
सीने पर गड़ा एक खूंटा है
कस्बों में सीधा घुपा
चमकदार चाकू है
कविता सन्ताप है
एक चमकदार धातु है
बर्फ और गहरा घाव है
कविता कठोर है
पोलिहाइड्रल हीरे सी
कठोर, तराशा हुआ संगमरमर
गरजती एक नदी एशिया की

कविता आवाज नहीं है
न ही चिड़िया की बींट
यह गोली है
इतिहास के क्षितिज में
कविता फूल नहीं जो कुम्हला जाये
यह संलेपित दर्द है

*
अनाबेल ली

तुम्हारी आँखें
पाले और महावृष्टि के साथ
जाड़े का उत्तरार्ध है
अनजाने पदचिह्न और धूल
उतार फैंकने वाला सुनसान कब्रिस्तान हैं
बरसाती खून तारों और फूलों की, और
देह का खून हैं

तुम्हारी आँखे खोखली दीवारें
जिससे कि विदेशी सेना गुजर सके
समन्दर के ऊपर से हवा की ठिठुरन हैं

झुर्रियाँ भविष्य में फीकी पड़ जाती हैं
रात खाली कफन में कसमसाती है
रौशनी से भी ज्यादा गहरी
आसमान धरती पर दफन हुआ
तटों की खोखली खोपड़ियाँ
समुद्री शैवाल पर परावर्तन
रोशनी की मोमबत्ती बन गया
भूमिगत धाराएँ और अंधकार
तुम्हारी आँखें
मौत और महामारी से भरपूर हैं

NON EST
सुनसान सड़कें, पितलाये क्षितिज
खाली कुर्सियां और उसके पदचिह्न
एक गुप्त बुखार शहर खा रहा है
छितराई रोशनी, फीका रक्त
उसने अपनी जेब में अपनी उंगलियाँ चटखाईं
अपने दीमाग को वाष्पित होते देखा
अटल, सुलगने को तैयार
एक घायल दिन, वह फुसफुसाता है
पदचिह्न, फिर पदचिह्न, गली से दूर तक
पदचिह्न दूर पदचिह्नों से..
Anastassis Vistonitis

और »  

 

Sergio Infante

उपन्यास के बारे में
रात गहरी है,हर एक कोण से,
नायक की भौं पर सितारा
अनपहचानी राहों को मुश्किल से दिखा पा रहा है

भ्रमित हो मैं लिखता हूँ पतवार
हालांकि सोचता हूँ रकाब की जोड़ी,
धूप से भरपूर चरागाह
और दूर किसी टोले के बारे में
जब स्मृति नैश्चित्य की खोई नगरी की गलियों में
घसीटती है तो मै खूँटे से बंधा सा दौड़ लगा रहा हूँ

यह निकाल पाने के लिये काफी देर हो गई है कि
कौन जादू टोने को उच्चरित करता है,
या फिर एक गूंगा जिसकी एड़ी हर कहानी के आसन्न अन्त के एन पहले
मुचक जाती हो. उस संभ्रम और दर्द के बीच खपच्ची सी मेरी आवाज
मैं कूद लगाता हूँ
तैरता हूआ
बच निकलता हूँ , एक कविता को दाँतों में दबाये

दूसरा ग्रीष्म -ANOTHER SUMMER

समन्दर तक पहुँचने के लिये घण्टों लगते हैं
मैं अपने घर के सामने लगे पाइन दरख्तों से
काम चलाता हूँ
वे निपुणता से उसकी गर्जन की नकल करते है
और समन्दर सरसराहट में बदल जाता है
अण्डियन हवा
शाखाओं और पैने पत्तियों मथती हुई
पानी सूर्यास्त की स्मृतियों की प्रतिच्छाया
और उन पावों की स्मृतियाँ है जो
समुद्र फेन में भीगने को आगे बढ़ते हैं

कविता

लेकिन असलियत में
मैं तुमसे किस फूल के बारे में बात कर सकता हूँ?
नाम
पत्तियों की खिलाफत नहीं
अथवा
इत्र में समाहित
केन्द्र से अनुलयता नहीं
नाम
जो कुम्लाया हुआ है आरम्भ से
यह कोई गन्ध नहीं देता
नाम
किसी हवा का ना होना, यह साहस है
यही नहीं
पाप्पस का घिसटना
अपनी मृत्यु की खनखनाहट सहित
रोमों के साथ
जो शोभित करते हैं ताजे फलों को
और शाखाओं को खड़खड़ाना
लेकिन जो कुछ मेरे पास है,
वह है नाम
और बिना नाम के
सम्पूर्ण उपवन अर्थहीन है

 और »

VOL - VIII/ ISSUE-XI
(जुलाई अगस्त2013
)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए