अमीर ओर  ( Amir Or) वैश्विक कविता में विशेष महत्वपूर्ण कवि हैं, इसलिये भी कि वे अपने को सार्वभोमिक मानते हैं, और इजराइल के वासी होते हुए भी, अपने देश पर गर्व करते हुए भी देश की राजनीति के खिलाफ खड़े होने का दम रखते हैं, फिलस्तान ०र इजराइल की दोस्ती की कोशिशे करते रहते हैं। आपकी कविताओं की दस पुस्तके हैं, और आपकी कविताये चालीस भाषाओं में अनुदित हो चुकी है। 2000 में आपको Pleiades Tribute (Macedonia) "a significant contribution to modern world poetry." के लिये । उन्हे प्राप्त पुरस्कारों की सूची काफी लम्बी है....the Bernstein Prize, the Fulbright Award for Writers, the Levi Eshkol Prime Minister’s Poetry Prize and the Oeneumi literary prize of the Tetovo Poetry Festival.आपको अनेक अन्तर्राष्ट्रीय फेलोशिप भी मिली हैं। आपने देश विदेशों में कविता पढ़ाई है। 1990, में ओर ने the Helicon Poetry Society की स्थापना की जो एक जानी मानी साहित्यिक संस्था है। वे वैश्विक शान्ति के लिये सदैव प्रयत्नशील रहे हैं.

बीयर का गिलास-A Glass of Beer

अचूक हत्या के लिए कारण की जरूरत नहीं, उसने कहा
अचूक हत्या के लिये पूर्ण वस्तु की जरुरत होती है
जैसा Auschwitz.में हुआ था
निश्चित रूप से शवदाह गृह में नही , बल्कि उसके बाद
काम के घण्टों के बाद
कहते हुए वह चुप्पी में डूब गया
बीयर के झाग को देखते हुए
एक घूँट भरते हुए वह बोला

अचूक हत्या प्रेम है
अचूक हत्या में कुछ भी पूर्ण नहीं होता
दिए जाने के अलावा
जितना तुम दे सको

यहां तक कि गले को मरोड़ने की यादें भी
अनन्त हैं
यहाँ तक कि वे चीखें
जिन्होंने मेरे हाथ कंपा दिये
यहाँ तक पेशाब जो शिष्टता की तरह
ठण्डी देह पर गिर गई
यहाँ तक कि जूते की एड़ियाँ जो
दूसरी अनन्तता जगाती है
यहाँ तक कि सन्नाटा
उसने झाग में देखते हुए कहा

सच है .. a decent arbeit macht frei,
लेकिन एक अचूक हत्या एक बून्द भी
नहीं गिराती
बच्चे के होंठों की तरह, उसने स्पष्ट किया
रेत या झाग की तरह
तुम्हारी तरह
जो ध्यान से सुन रहा है
घूंट भरते हुए


*
बर्बर-The Barbarians (Round Two)


व्यर्थ नही था कि हमने जंगलियों का इंतजार किया
शहर के चौक पर इकठ्ठा होना भी व्यर्थ नही था
व्यर्थ नही था कि हमारे महान लोगों ने सरकारी पौशाक पहन ली
और फिर खास मौके के लिये भाषणों का अभ्यास किया
व्यर्थ नही था कि हमने अपने मन्दिर तोड़ दिये
और नयों को उनका खुदा बना दिया
बिल्कुल वैसे ही जैसे कि अपनी किताबें जलाना
जिसमे उन जैसे मनुष्यों के लिए कुछ नही था
जैसी कि भविष्यवाणी थी बर्बर आये
और राजा से शहर की चाबी ले ली

लेकिन जब वे आये तो उस जमीन का लिबास पहना
उनकी परम्पराएँ 'अब शहर की परंपरा थी
और जब उन्होंने हमारी भाषा में आज्ञा देनी शुरु की
अब हम नही जानते
ये बर्बर कब हममे उतर गए

*
परछाई -Shadow


देह की तरह वक्त के साथ
यह भी बढ़ती है
शुरुआत में ये अँधेरे का पिल्ला जैसी थी
अपने दिल से खींच कर निकाला गया
निश्चित रूप में उस कारण से
और जब तुम इसके बारे सोचते हो
तो भुलाना बेहद आसान होता है
जैसे ही उजाला उगता है
ये अपनी गर्म जबान से
तुम्हारी पिण्डलियाँ चाटने लगता है
बेहद सुखद लगता है
उसके लिये एक सफेद हड्डी उछलना
पर एक घंटे में
यह कदम कदम पर काटने लगती है
जितनी यह गहराती है
उतने कदम पुल से धीमे उतरने लगते हैं
रात एक नदी है
अँधेरे का उदर
अब या तो तुम डरते हो
या फिर दूसरा प्यार
कोई बात नही
अब तुम इसके हो गये
यह हमारे क़दमों जितनी लम्बी हो गई
लपकने को तैयार और भूखी
एक लम्बा जानवर
सैंकड़ों साँप से जहरीले दांत वाला
तुम हड्डी दे कर या हाथ फेर
शान्त करते हों
किसी भी तरह
उससे पहले कि ये बड़ी हो जाये

*
कुछ लोग कहते हैं-SOME SAY

कुछ कहते हैं जीवन विकल्पताओ की श्रृंखला है
कुछ कहते हैं विजित प्रदेश है,कुछ इसे जीवन औरअभाव के बीच की
समानान्तर का चिह्न खींच देते हैं
और कुछ कहते हैं हमें जीवन इसलिये दिया गया
ताकि लोगों की ज़िन्दगी बना सके , जिनकी कोई जिन्दगी नहीं
ये एक आसान व्याख्या है,मैं तुमसे कहता हूँ

जो कुछ नजआ रहा था, रात ने ढ़ंक दिया
घर पर लैंप जलगएहैं

इस रौशनी में कोई झलनही
सिवाय जो आईने में झलरही है

कुछ नहीं, जो मुझे देखता है
इसे देख रहा है, यहकोई आश्वासन नहीं देती
लालसा जगाती है, मृत्यु की नहीं जिन्दगी की

मैं इस निगाह से गर्माहट औरठण्डक पाता हूँ
रात सब कुछ ढँक लेती है

मैं चाहता हूँ कि मुझे कोई स्पर्ष के द्वारा देखे
और फिर कुछ ना रहे, बस यही बचे

*
कविता-POET

शिक्षिका बोल रही थी
उसे कोई शब्द नहीं
सुनाई दे रहे थे
वह मात्र संगीत
सुनता रहा


खिड़की के पार दो पेड़ झूम रहे थे
वह अपने सपनो की आकृतियाँ गिनता रहा
उसके प्रेमिका ने खिड़की बंद कर दी
सियाही नोट बुक में आकार लेने लगी
'दो पेड़ '
शिक्षिका बोल रही थी
वह अपने पन्ने के हाशिये पर बैठ गया
और उसका दिल घडी के साथ घूम रहा था
वह आँखे बंद कर के सुनता रहा
पेड़ अब नोट बुक में झूम रहे थे
और जब घंटी बजी
वहाँ उसका लिखा एक भी शब्द नहीं था

*
खिलना-Bloom

जब मृत अगले जन्म को तैयार हो रहें हो
और श्मशान बसंत सा महकता हो
तब वे सपने के भी करीब होते हैं
अपनी दुनिया से दूर घूमते हुए

इस दुनिया में मरने के लिए
तुम उन्हें अचानक पकड़ लेते हो
जब वे भूत की ओर जाते हैं, मानो कि तुम प्रेत हो
तुम्हारी काया चौंकती है
इस विचारों के गुम्बद पर
एक झीना पर्दा
नीला आकाश और कुछ हलके बादल
तुम्हे बचा सकने में असक्षम
घंटियों की और सीपियों की आवाजें तुम्हे कान के
करीब सुनायी देती हैं हर सांस जो लेते हो
वर्तमान है
बसंत में हर चीज़ मांसल हो जाती है
चमकते दर्पण हवा में लटकते हैं
हर जगह आँखे खिल उठती हैं

अनुवाद राजलक्ष्मी and रति सक्सेना
Translated By Rajlakshmi & Rati Saxena


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