Sergio Infante

सर्जिओ इन्फेन्ते चिली के मशहूर कवि, लेखक हैं, जो स्वीडन में रहते हुए यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं । आपने कविता की छह पुस्तके लिखी हैं।
Gray Abysses (Santiago, 1967), On Exiles (Stockholm, 1979), Portrait of an Era (Stockholm, 1982), The Pariahs’ Love (Santiago, 1990), Day was Dawning (Santiago, 2002) and The Leap Waters (Santiago, 2012).आपकी कविताएँ यूरोप अमेरिका , स्पेन आदि देशों में अनुदित हो कर विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। आप विभिन्न साहित्यिक समूहों जैसे कि Grupo Taller de Estocolmo, Stockholm Workshop Group जिसे चिलि के कवियों ने 1977 बनाया था , के सहनिर्माता रहे हैं। 2008,में आपका एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है.. The Flocks of the Cyclops। आपकी एक आलोचना की पुस्तक हैThe Stigma of Falseness। आपको 2002. में Condor Prize मिला है।

Translated by Rati Saxena

उपन्यास के बारे में (ABOUT A NOVEL )

रात गहरी है,हर एक कोण से,
नायक की भौं पर सितारा
अनपहचानी राहों को मुश्किल से दिखा पा रहा है

भ्रमित हो मैं लिखता हूँ पतवार
हालांकि सोचता हूँ रकाब की जोड़ी,
धूप से भरपूर चरागाह
और दूर किसी टोले के बारे में
जब स्मृति नैश्चित्य की खोई नगरी की गलियों में
घसीटती है तो मै खूँटे से बंधा सा दौड़ लगा रहा हूँ

यह निकाल पाने के लिये काफी देर हो गई है कि
कौन जादू टोने को उच्चरित करता है,
या फिर एक गूंगा जिसकी एड़ी हर कहानी के आसन्न अन्त के एन पहले
मुचक जाती हो. उस संभ्रम और दर्द के बीच खपच्ची सी मेरी आवाज
मैं कूद लगाता हूँ
तैरता हूआ
बच निकलता हूँ , एक कविता को दाँतों में दबाये


दूसरा ग्रीष्म -ANOTHER SUMMER

समन्दर तक पहुँचने के लिये घण्टों लगते हैं
मैं अपने घर के सामने लगे पाइन दरख्तों से
काम चलाता हूँ
वे निपुणता से उसकी गर्जन की नकल करते है
और समन्दर सरसराहट में बदल जाता है
अण्डियन हवा
शाखाओं और पैने पत्तियों मथती हुई
पानी सूर्यास्त की स्मृतियों की प्रतिच्छाया
और उन पावों की स्मृतियाँ है जो
समुद्र फेन में भीगने को आगे बढ़ते हैं


कविता

लेकिन असलियत में
मैं तुमसे किस फूल के बारे में बात कर सकता हूँ?
नाम
पत्तियों की खिलाफत नहीं
अथवा
इत्र में समाहित
केन्द्र से अनुलयता नहीं
नाम
जो कुम्लाया हुआ है आरम्भ से
यह कोई गन्ध नहीं देता
नाम
किसी हवा का ना होना, यह साहस है
यही नहीं
पाप्पस का घिसटना
अपनी मृत्यु की खनखनाहट सहित
रोमों के साथ
जो शोभित करते हैं ताजे फलों को
और शाखाओं को खड़खड़ाना
लेकिन जो कुछ मेरे पास है,
वह है नाम
और बिना नाम के
सम्पूर्ण उपवन अर्थहीन है


नार्कीसस की दूसरी मौत

मैं सागरी झील की सतह के करीब आता हूँ
यह मुझ महान अनाड़ी का अप्रतीक्षित चेहरा दिखाता है
फिर भी मैं अचम्भित सा खड़ा रहता हँ, जब कि जल का
ह्रास मुझे लगातार मेरा चेहरा दिखाता रहा
जल वाष्प बन उड़ गया, आकार कम कर हो जाता है
यहाँ तक कंकड़ और काई रह जाती है
जल्द ही जल जाता है
मेरा वह अनाड़ी चेहरा
उसी सूरज से, जिसने ओजोन की लनी को तोड़ दिया
सूरज से जले कुछ तख्ते और झींगे
मेरी गर्दन के पीछे गिरते हैं
अज्ञानी गिलोटिन की तरह
बड़ी सफाई से, मुझे कहना पड़ेगा


नाव

सागरी यात्रा, तुम्हारी आवाज नहीं
हालाँकि तुम दिखाई दीं
बस भूमध्यवर्ती हवा

कमान से पर टिकी हुई
अधिकार पूर्वक चलती रहती है
आसपास कोई जमीन नहीं
जो दूरी का भान करवा सके

बस कुछ निष्ठावान सामुद्रिक पक्षी हैं
जो थकावट बारे में कुछ ज्यादा नहीं जानते

हर तरफ समन्दर और
चमकते चाकुओं की तरह
उड़तीं मछलियाँ

हर ओर समन्दर और
और सूरज का लंगर
रोम रोम में अंगार

आसपास कोई जमीन नहीं
जो दूरी का भान करवा सके

बस समन्दर और दर्द
दूसरी उठती लहर
वह डेरे का स्थिर प्रतिबिम्ब

आसपास कोई जमीन नहीं
जो दूरी का भान करवा सके


खण्डहर में आसमान


ऊपर जो दरारे दिख रही हैं
क्या स्वर्गकम्प का परिणाम है?

यदि ऐसा है तो विंसेन्ट हुईडोब्रो को
रास्ता मिल गया होगा
घावों ने निशान दिख रहे हैं
बादलों के बीच?
वे पर्यावरण को सरकस के तम्बू में बदल रहे हैं
जिसके चबूतरे पर
आरामदायक दुर्भाग्य बैठा है
काव्यात्मक दृष्टि के अवशेष से काफी दूर

ऊपर जो दरारे हैं, सभवतया
आसमान की ओर फैंके गये पत्थर हैं

किसने फैंके पत्थर
कौन फैंक सकता है उन्हें?
किसने इतनी ताकत को होने दिया
कि आसमान में पत्थर फैंक सके?
कौन इतना निराशावादी है
कि हाथ छिपा लिया?

यहाँ तक कि पत्थर तक नहीं
हम जैसे सुस्त हैं, तो केवल
वे भभाके देख पाये जो अब भी ऊपर चढ़ रहे हैं
और ये गैसे बदबू मार रही हैं
अस्पष्टता अभी भी ऊपर उठ रही है
और ये द्रव भी चढ़ रहे हैं अभी
ना देखे जा सकते ना सूँघें
लेकिन जैसे नजदीक से गुजरते हैं होंठ फट जाते हैं
आँखों में खुजली और जलन होने लगती है

तर्जनी के सिरे पर विलाप
हम कहते हैं कि ये भभाके
ये गैसे और, ये द्रव्य परिरेखाएँ हैं
घिसटने हैं पत्थरों द्वारा छोड़ी गईं
अब आसमान चूर चूर हो गया है
हमारे सिर पर गिर
पड़ने की आकांशा है

बहुत से छेदों अथवा
घने प्रतिशोधों के कारण


चमकते दर्पण हवा में लटकते हैं
हर जगह आँखे खिल उठती हैं

 


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