TRIIN SOOMETS  की कविता

*
मैं बिल्कुल तुम्हारी तरह
चुन सकती हूँ
कि मुझे पीड़ित होना हैं
नहीं
गर तुमने चुन ही लिया है तो
तुम्हारे पास
पूछने को कुछ सवाल जरूर होंगे
और तुमसे पूछने के लिए
औरों के पास होंगे
तुमसे कहीं अधिक

**
वे सारे शहर ,जहाँ तुमने प्यार किया
किसी न किसी अर्थ में एक से हैं
चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने पर रहें हों

सबके एक से ही चौराहे हैं
वे एक सी नदी को प्रतिबिम्बित करते हैं
और बिलकुल एक जैसे बादल उड़ते हैं
कुछ अर्थों में बिलकुल एक से हैं
कि वे सारे तुम्हारे अपने शहर हैं


( TRIIN SOOMETS  की और कविताएँ)
 


 Zingonia Zingone  की कविता

 

अभी अधिक वक़्त नही बीता

मैंने दुनिया के विषय में रूचि लेनी शुरू की


मैं भटकती रही घंटों

सदमा पहुचने वाली यथार्थता से

वहां वापसी का कोई मोड़ नही था


सभी बातें कही जा चुकी थीं

सभी टेबल पर रखीं हैं

बाइबिल ,भविष्यवाणीयां .प्रचलित देव वाणियाँ

अन्य कवियों की उनमत्तता

ईश्वर ने ये सब कहा है मनुष्यों से


मैं मौलिक होना चाहती थी

कुछ अनसुना सा साबित करना

लेकिन मैं ठोकर खाती हूँ

उसी पुराने उदासीनता के विलाप से

जो मुझे बाधित करती है

मेरा चेहरा गुलाब के मुखौटे द्वारा

मेरे बालों की निस्सारता

वही पुराना गूढ़ विलाप

वही टालमटोल वही खोखलापन

मातृत्व के कौतुक द्वारा


चमत्कार जो कुचल दिए जाते हैं

परिस्थितियों की दीवार के विपरीत

पितृत्व कभी त्याज्य नही होता

न ही प्रेम और

न ही आंसू बहाना अहसासों से अलग है


किसी का जीवन उदहारण नही है

मैं ज़िन्दगी से पवित्रता के लिए लडती हूँ

मैं 'ईव' और पैसे की बेटी हूँ

मैं नकेल कसती हूँ

अपने विशुद्ध प्रजनित मौन की


ये फिसलती है

मैं खींचती हूँ

ये फिसलती है


मैं इस दिमाग की मालिक नही बन सकती

ये दिखावा निस्सार है

सब दिखावा है


इस नर्क को टाल नहीं सकते


मैं आदतन पेपर पढ़ती हूँ

आज एक अलग प्रयास किया

आज पेन के धब्बे सिर्फ धब्बे थे

हजारों रोज मरते हैं

हजारों मार डाले जाते हैं

नए स्थाई अस्तित्व के लड़ाके

रोज पैदा होते हैं


जीवन की कविता लयहीन है

दिखावा ही सब कुछ है

और कला इसी का दर्पण है


मैं अपने साथ के आदमी को देखती हूँ

उसके( ) प्रेम के साथ

मैं अपनी असफलता मानती हूँ

मेरा प्यार एक अन्य प्यार के साथ उलझ जाता है


मैं क्या उदाहरण रहूंगी अपने बच्चों के लिए

समान अभिभावकों के संतान सा

हमारे आदर्श कैसे उदाहरण बनेंगे

यदि हम उनके इरादों की स्पष्टता जान लें


हम कभी चींटियाँ नही बन सकते

सर्वहित में ऊपर उठती भीड़ में

नीचे की ओर भागती


मनुष्य कभी संत न होंगे

संत अकेले मनुष्य की चमड़ी से ही पैदा होते हैं

एक कथा सुनाने को

कि कैसे कभी न सुधर सकने

से मुक्ति दिलाएं


ये अदृश्य विषाद नही है

लेकिन एक निहित विलाप है

जो हमे अकेलेपन की ओर धकेलती है

ताकि लगातार खुदाई कर

निर्मल जल के

उस कुंए को ढूँढ सके


मैं सड़कों से गुजरती हूँ

हर किसी की तरह

मुस्कुराते हुए ,ढूँढ़ते हुए


मैं बिना विचार किये नहीं भटकती

मैं सरसरी नज़र का भी लुत्फ़ उठाती हूँ


तुम मेरे बाजु चलोगे

फिर भी कुछ नही बदलेगा

ये पहेली नही सुलझेगी

और मैं जारी रखूंगी बिना पेपर पढ़े


मैं लगातार सोचती रहूंगी

मैं कुछ भी अलग नही कर सकती


न तुम्हारी ज़िन्दगी में

न दुसरे आदमी की ज़िन्दगी में


एक लड़के की आँख में

भविष्य रहस्य की तरह होता है

क्या वो भी निजी सनातनता तलाशेगा


ये विलाप है

भाइयों

सचेत हो कर किये पाप सा विलाप

 

Translated by Rajlakshmi Sharma

(Zingonia Zingone की और कविताएँ)


Odveig Klyve  की कविता

आओ ,हम गिरें
हम गिरें
जंगल ,पत्थर और लोहे के भीतर
आओ गिरें शरीर के भीतर

हर चीज़ जो अस्तित्व रखती है
हमारे साथ ही गिर जाती है

हम पानी होंठ तक उठाते हैं
पीते हैं
बूंदें गिर जाती हैं
ख़ाली जगह से
ख़ाली जगह गिरती है


(Odveig Klyve की अन्य कविताएँ)


Annelisa Addolorato   की  कविता


अन्य स्थान


रेल की पटरियां
कठोर रक्षक होती हैं
गाँव की जमीन के
चक्की के पाटों की.
और ,सीमेंट हमें बताती है
समय की नदी के बारे में
तुम्हे जिसे
जीतना है
एटलस ,

और कुचलना है चुम्बनों से

एक झुर्रीदार स्टेशन की घडी पर
आदमी का चित्र
हवा में लटक रहा है
जिसने अपने कंधे पर
एक लौकिक अंडा
उठा रखा है

रेल की पटरियां यहीं पैदा होती हैं
और पेड़ों और चौराहों से पोषित होती हैं



Translated by Rajlakshmi Edited by Rati Saxena

( Annelisa Addolorato  की अन्य कविताएँ)


Maryam Ala Amjadi  की  कविता

 

मूर्च्छा


जो मेरे अन्दर कैद है
वो एक औरत है
खूबसूरत और खोई खोई
तुम्हारी बदसूरत लालसाओं का अंत

मैं तुम्हे बिस्तरज्वर के बारे में बताना चाहती हूँ
मैं तुम्हे ख़ाली पालने के
वो लयहीन गीत सुनाना चाहती हूँ
जिनका गला घोंट दफ्न कर दिया गया

मैं इस कहानी की पुतली बनना चाहती हूँ
उस कुबड़े नपुंसक की आँखों में

हजारों तिलस्मी शहर्ज़ादा कहानियों के आरामगाह में
उस आग को बुझाते हुए जो भय भगाने को जलाई गई

मुझे सुनो
यदि हिम्मत है

मैंने कहा न
एक खूबसूरत खोयी खोयीस्त्री क़ैद है
आओ. आओ
यही धरती कहती है
हाँ धरती भी
मैं कौन होती हूँ बैठने वाली
जब पेड़ खड़े खड़े मृत्यु वरण कर रहे

मैंने कहा ना .प्रतीक्षा करो तुम्हारे लालसाओं के बदसूरत अंत की
क्यूँ कि मैं जानती हूँ ,मैं सब जानती हूँ

 

(Maryam Ala Amjadi की अन्य कविताएँ)



मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ