मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली
आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से
साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 
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उसने अपनी उंगलियों के बीच उभरे निशान की ओर देखा
जहाँ कभी कलम हुआ करती थी
स्याही का नीलापन, कागज पर आसमान का विस्तार पा जाता था

उसने फिर पोरों की ओर देखा जिनकी हर एक ठोकर,
ए सी स्टोर में प्लास्टिक में बन्द तरकारी सी मिट्टी की गंध से काफी दूर

उसने चाहा कि अपने शब्दों को ताजी हवा में सूखने दे
फिर कड़कड़े शब्दों को डिब्बा बन्द कर दूर भेज दे
किसी ऐसी जमीन पर
जहाँ बर्फ की परतों ने जमीन पर कब्जा कर लिया है

लेकिन बर्फ के देश में बसने वाले
असीमता को सीमा में नहीं बाँधते

कवि का पेशा कविता लिखना नहीं बल्कि पपड़ाते होंठों की बात को आवाज देना है। कवि के लिये परख को पेड़ों से उतार कर जमीन पर लाना जरूरी है। कवि के लिये रक्त को छूना मना नहीं है, लेकिन उस रक्त को अपनी कलम की नोक में जगह देना उचित नहीं दुख के विस्तार को चुल्लू में बाँधने की कला है।
कवि एक पेशा नहीं जिन्दगी की जरूरत है....

ऐसा भी नहीं कि कवि हर दौर या अनुभव से सशरीर गुजर सकें, लेकिन उसके लिये जरूरी है कि वह अनुभवों को अपने भीतर से गुजरने दे।

बर्फ दूर से अच्छी दिखती है मुझे
उमस भरे दिनों में तस्वीरों मे भी लुभाती है

पहाड़ों की बर्फ फ्रीजर की बर्फ से अलहदा जरूर होती होगी
रंगीन प्यालों पे तैरते बर्फीले टुकड़े
पहाड़ी बर्फ के इतिहास को दर्ज नहीं करते
रति सक्सेना
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जबसे दिल्ली के दिल में दरार देखी है
मेरे गले के गुलदान में रखी हुई
साँस की सफ़ेद कलियाँ सूखने लगी हैं गुलाब की पंखुड़ियों से लहू की बू आ रही है
किसी ‘पथार’ की तरह टूटने लगी है आवाज़
पपनियों के पोरों पर स्याह बर्फ़ जम गई है
नसों में उड़ते घोड़ों के पंख पिघल गए हैं
रह-रहकर सिहर उठता है उदासी का सिरा
वक़्त की मटमैली और बंज़र धड़कनों में
मैं एक बार फिर बात के बीज बोने लगता हूँ।
त्रिपुरारि कुमार शर्मा
*
अपना -अपना सच
एक -दूसरे के बारे में
सच बोलने का आग्रह
दोनों ओर से था
दोनों ने कहा
दोनों ने सुना
अपना -अपना सच
एक -दूसरे के बारे में
आजकल अपरिचित से हैं
एक -दूसरे से
दोनों पक्ष....
नित्यानंद गायेन
*
अनकहे शब्दों के बीच
मिलीं नज़रें
जन्मा गीत
शब्दहीन…….
गुनगुनाया उसे
और भीग गई आत्मा
मिठास से ….
हाथों ने
अनदेखे ,अनकहे ,अनछुए
एहसास को जीकर
अपनी रेखाओं के प्रतिबिम्ब में
सदियों से छिपी लकीरों को
तलाशा…….
*

मैं एक वृक्ष हूँ
बूढा हो चला हूँ मैं,
पत्तों की रंगत बदलने लगी है,
खड़े रहने की ताकत अब मुझमे नही,
खड़ा रहता हूँ मगर,
शायद कोई छाँव के लिए पूछ ले।
शाख भी कमज़ोर सी पड़ती हैं,
दरारों से भर गयी हैं,
खड़ा रहता हूँ मगर,
शायद कभी बिटिया झूला डाल ले।
दिवांशु गोयल 'स्पर्श'

*

तुम्हें फूल पर विश्वास है
लेकिन मछली ने तितली खाई
तुम्हें फूल पर विश्वास है
मछली को ऊदविलाव ने खाया
तुम्हें फूल पर विश्वास है
फूल को तितली ने खाया
कोस्मो

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एक नदी थी । नदी के समानांतर नदी के जल की गति से बैलगाड़ियाँ चलती थी । पूर्वज जिस गति से सफ़र करते थे वह इतनी धीमी थी की एक गाँव से दुसरे गाँव, एक शहर से दुसरे शहर, एक दुःख से दुसरे दुःख तक पहुँचने में वक्त लगता था । कभी कभार यह वक्त इतना लम्बा होता था कि एक ही दुःख को भोगते-भोगते पूर्वज दम तोड़ देते थे । लेकिन मैं सौभाग्यशाली हूँ , अभी मैं एक बस पकडूँगा और नदी की रफ्तार से कई गुना तेज़ गाँव के दुःख को पीछे छोड़ शहर के दुःख में प्रवेश कर जाऊँगा ।
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कोई भला कैसे इतनी समग्रता से चला जा सकता हैं कि दृश्य की स्मृति तक शेष न रहें । वह गुजरेगा तो समय के भीतर से गुजरेगा, और समय एक चिपचिपी चीज़ हैं ।
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चमत्कार किस लिए प्रभु ? मैं तो एक फुल देखकर भी चौंक जाता हूँ ।
सोचता हूँ, इस क्रूरता से भरी हुई पृथ्वी पर ऐसा कैसे हो सकता हैं ।
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अवसाद का पेड़ था
उसपर शांति की शाखाएं
कभी-कभार एक पत्ता गिरता था
शून्य का पत्ता ।
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एक बार कि बात हैं कि हर बार "एक बार" एक बार होकर ऊब चूका था अब वह दूसरा, तीसरा होना चाहता था।
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थार के पेड़ों में अधिक करुणा होती हैं । हो सकता हैं वह धरती के भीतर पानी के संघर्ष से पैदा हुई हो। जब थार में किसी एक पेड़ की पत्तियां झर जाती है तो पड़ोस का पेड़ भी अपनी पत्तियां झरा देता हैं । और इस तरह पड़ोस दर पड़ोस पत्तियां झरती जाती हैं । एक पेड़ का दुःख इतने हिस्सों में बाँट लिया जाता हैं की एक पेड़ का पतझड़ सामूहिक दुःख बन जाता हैं, और "दुःख" पतझड़ का उत्सव...अहर्निश सागर
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वे कुंवारियाँ, जो हमें उल्काओं वाले आसमान के नीचे
नीन्द की सवारी में खलल डालती हैं
खून पीने वालों जैसी संलग्न हैं
प्रौढ़ता को बढ़ते हुए खजुराहो के मन्दिर में
जब कि मैं अजीब बुखार में पसीने से भीग रहा था
वह गर्मी की रात थी और आग से भस्म
जंगल में ब्रह्माण्ड मिल गया था
दीवार पर चमकता पानी और मच्छर
झाड़ियों के पीछे से एक भूखे शेर घबरा देने वाली गुरगुराहट
वे अक्षत योनियाँ, जो हमारी नीन्द में खलल डालती हैं
एक चक्रवाती अन्धड़ रिक्त और जलहीन
बिल्कुल एक आवारा आत्मा जैसा
बचाव की रात
वे कभी नहीं जान पायेंगे कि रात को क्या हुआ जब
तुम देह को सहलाते अंधेरे में पनाह ले रहे थे
जब कि खिड़की में सड़क आसमान तक
पसरी पड़ी थी
ऐसी कोई राह नहीं थी जो ब्रह्माण्ड के भूल भुलैये में
छोटी गली ना पकड़ती हो
छालों से भरे उनके दैविक पदचिह्न बर्फ पर फिसल रहे थे
और मस्त्य अपने को दलदली चट्टानों पर चिह्नित कर रही थीं
वे नहीं जानते थे कि क्या होगा
उस रात जब वे रेंगते कीड़ों वाली धर्मशाला में पनाह ले रहे थे
जब आग ने अपनी कालिख राख
तुम्हारे सीने के रहस्यों पर डाल दी
तूफानी दिन
वांग वी सन्देह में है
कौन सी परेशानी उसे लीयान के बारे में सोचने को मजबूर कर रही है
क्या तूफान तांग डाइनेस्टी पर पीछे से चूहे सा गुर्रायेगा?
पाले के नीचे दबे रुपहले गुच्छे सा
बकल की कील नहीं लगती
जब छांगि अनायास विपदा में गायब हो गई
कोई बहाना नहीं बनाया जा सकता
इसलिये वह ऐसे उदास है जैसे कि इमली के पत्ते ऐसे झड़ रहे हैं
जैसे की राजसिंहासन डौल रहा हो
सेरजिओ बदिल्ला (Sergio Badilla)
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तस्वीर

शीशे के पीछे धुंधली उसकी तस्वीर
एक शख्सियत है
उससे अलग उसका चलना फिरना ​
जिसका चेहरा और जिसकी आवाज़
सब अवास्तविक अपने बचपन
की तरह लगता है
तस्वीर एक शख्सियत है
अगर हम अकेले बैठे हैं कमरे में
कई तस्वीरों वाला कमरा
अलग - अलग कोणों से
घेरता है

​मां की तस्वीर
ठिठकी - सी लगती है ​वह जैसे
किसी प्रकाश में धुंधली होती जाये

एक दिन हमारे एलबम से
पता नहीं चलता कि माँ
कहाँ चली जाती हैं
उसकी चिट्ठियां और उसका नाम
भाषा में नहीं मिलता

जहाँ गिरेंगे हम
वहां वह नहीं होती जब
हम उसे भूल जाते हैं और याद करते हैं

एक दिन
दीवार से उसकी तस्वीर गिर जाती है
दीवारें गिरती हैं और नगर बसते हैं
हम दूर
किसी बस्ती के कोने में
धब्बे की तरह नज़र आते हैं
जब
टूटी तस्वीर हमें देखती है
और उठती नहीं है |
मेरे जाने बगैर
भागती रेल के बारे में
कहना मुश्किल है कि वह
आ रही है
या जा रही है
दूर - दूर टिमटिमाता अँधेरा
पेड़ों की धुंध में छुपता है
तो कहना मुश्किल है
छुपता है कि दिखता है
तेजी से गुजर गए एक स्टेशन के पार
नामालूम - सी बस्ती की आधी रात
खुली रौशन खिड़की किसी में
एक चेहरा छूटकर रह गया है
बहुत बाद में कभी
वह चेहरा मेरे चेहरे में से गुज़र जायेगा
रेल की आवाज़

नवीन सागर
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VOL - VIII/ ISSUE-XII
(नवम्बर -दिसम्बर्त2013
)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

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