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उसने अपनी उंगलियों के बीच उभरे निशान की ओर देखा
जहाँ कभी कलम हुआ करती थी
स्याही का नीलापन, कागज पर आसमान का विस्तार पा जाता था

उसने फिर पोरों की ओर देखा जिनकी हर एक ठोकर,
ए सी स्टोर में प्लास्टिक में बन्द तरकारी सी मिट्टी की गंध से काफी दूर

उसने चाहा कि अपने शब्दों को ताजी हवा में सूखने दे
फिर कड़कड़े शब्दों को डिब्बा बन्द कर दूर भेज दे
किसी ऐसी जमीन पर
जहाँ बर्फ की परतों ने जमीन पर कब्जा कर लिया है

लेकिन बर्फ के देश में बसने वाले
असीमता को सीमा में नहीं बाँधते


कवि का पेशा कविता लिखना नहीं बल्कि पपड़ाते होंठों की बात को आवाज देना है। कवि के लिये परख को पेड़ों से उतार कर जमीन पर लाना जरूरी है। कवि के लिये रक्त को छूना मना नहीं है, लेकिन उस रक्त को अपनी कलम की नोक में जगह देना उचित नहीं दुख के विस्तार को चुल्लू में बाँधने की कला है।

कवि एक पेशा नहीं जिन्दगी की जरूरत है....

ऐसा भी नहीं कि कवि हर दौर या अनुभव से सशरीर गुजर सकें, लेकिन उसके लिये जरूरी है कि वह अनुभवों को अपने भीतर से गुजरने दे।


बर्फ दूर से अच्छी दिखती है मुझे
उमस भरे दिनों में तस्वीरों मे भी लुभाती है

पहाड़ों की बर्फ फ्रीजर की बर्फ से अलहदा जरूर होती होगी
रंगीन प्यालों पे तैरते बर्फीले टुकड़े
पहाड़ी बर्फ के इतिहास को दर्ज नहीं करते

उस दिन मेरी मुलाकात हुई
गुनगुने कमरे में बैठ बर्फबारी को शब्दों में बाँधने वाले कवि से
के छूते ही तस्वीर की बर्फ शर्म से पिघलने लगी

हालांकि उसके प्यालें में बर्फ के टुकड़े बेशरमी से तैर रहे थे

मुझे नहीं मालूम कि बरफ के देश में लिखी कविता
बरफ सी सफेद झक्क होती है
या कालिख का सफेद इतिहास लिखती है


इस दौर अच्छे बुरे दौर में कवि की भूमिका और बढ़ जाती है

इस अंक की कलाकार अनुराधा रिषि हैं जो बर्फ के देश से है और उस शीतलता को दिल्ली की उमस में बाँटती हैं। http://anuradharishi.com/#/home


शुभकामनायें

रति सक्सेना



     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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