अहर्निश सागर

एक नदी थी । नदी के समानांतर नदी के जल की गति से बैलगाड़ियाँ चलती थी । पूर्वज जिस गति से सफ़र करते थे वह इतनी धीमी थी की एक गाँव से दुसरे गाँव, एक शहर से दुसरे शहर, एक दुःख से दुसरे दुःख तक पहुँचने में वक्त लगता था । कभीकभार यह वक्त इतना लम्बा होता था कि एक ही दुःख को भोगते-भोगते पूर्वज दम तोड़ देते थे । लेकिन मैं सौभाग्यशाली हूँ , अभी मैं एक बस पकडूँगा और नदी की रफ्तार से कई गुना तेज़ गाँव के दुःख को पीछे छोड़ शहर के दुःख में प्रवेश कर जाऊँगा ।

*******


कोई भला कैसे इतनी समग्रता से चला जा सकता हैं कि दृश्य की स्मृति तक शेष न रहें । वह गुजरेगा तो समय के भीतर से गुजरेगा, और समय एक चिपचिपी चीज़ हैं ।

*******


चमत्कार किस लिए प्रभु ? मैं तो एक फुल देखकर भी चौंक जाता हूँ ।
सोचता हूँ, इस क्रूरता से भरी हुई पृथ्वी पर ऐसा कैसे हो सकता हैं ।

*********

अवसाद का पेड़ था
उसपर शांति की शाखाएं
कभी-कभार एक पत्ता गिरता था
शून्य का पत्ता ।

*****


एक बार कि बात हैं कि हर बार "एक बार" एक बार होकर ऊब चूका था अब वह दूसरा, तीसरा होना चाहता था।

*******


थार के पेड़ों में अधिक करुणा होती हैं । हो सकता हैं वह धरती के भीतर पानी के संघर्ष से पैदा हुई हो। जब थार में किसी एक पेड़ की पत्तियां झर जाती है तो पड़ोस का पेड़ भी अपनी पत्तियां झरा देता हैं । और इस तरह पड़ोस दर पड़ोस पत्तियां झरती जाती हैं । एक पेड़ का दुःख इतने हिस्सों में बाँट लिया जाता हैं की एक पेड़ का पतझड़ सामूहिक दुःख बन जाता हैं, और "दुःख" पतझड़ का उत्सव...

********


कविता जानती हैं यह तथ्य
कि सारी कविताएँ किसी अनसुने दु:ख का
विस्तृत ब्यौरा हैं

********


जीवन अराजकता में गुजरा तो मृत्यु शांति की तरह आई। हम पृथ्वी की कक्षा में साइकिलों पर सवार बेहद साधारण लोग थे। हमारे जीवन में बड़े-बड़े गजद्वार नहीं थे सिर्फ छोटे-छोटे सुराख़ थे, हमें जीने को उतना ही जीवन मिल पाया जितना तुम्हारे जी लेने के बाद सुराखों के इस तरफ ढुल पाया। पृथ्वी पर बसे शहरों में हम चूहों की तरह थे। डर, दुर्गन्ध और वितृष्णा से भरे हुए। इस सम्मोहन को तोड़ने के लिए की हम सचमुच चूहे नहीं हैं, जोर जोर से साइकिलों की घंटियाँ बजाते हुए शहरों को पार करते थे। और अपने बिलों में दुबक जाते। हमें अपने गाँवों की याद आती थी, अगर हम शहरों में चूहों की तरह थे तो गाँवों में बिल्लियों की तरह थे। बिल्लियों के अलावा हम अभिजात्य पशु घोडा या हाथी भी तो हो सकते थे, लेकिन घोडा या हाथी होना हमारे मोक्ष का हिस्सा नहीं था।
एक चूहा अपना मोक्ष हमेशा बिल्ली होने में तलाशता रहा।

********

 

वे जो प्रेम करते हैं
और कवितायेँ लिखते हैं
उन्हें थोडा दुःख मिलें
प्रेम के शीर्ष पर जीवन उतार दें सौन्दर्य की केंचुली
प्रेमी के हिस्से का सौन्दर्य उस वैश्या को मिलें

जो जवानी में दिखने लगी हैं बूढी
उल्लू की एक आँख में मोतिया हो
हमेशा रहें चिड़िया की रगों में बिल्ली का भय
कोई धातु इतनी मजबूत ना बनें
की युद्ध में बंदूकें जाम ना हो

*********

मैं मछली की वो जात हूँ
जिसकी दस पीढियां एक्वेरियम में बीत चुकी हैं
मेरे लिए समन्दर एक मिथक हैं


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ