नवीन सागर


तस्वीर


शीशे के पीछे धुंधली उसकी तस्वीर
एक शख्सियत है
उससे अलग उसका चलना फिरना ​
जिसका चेहरा और जिसकी आवाज़
सब अवास्तविक अपने बचपन
की तरह लगता है
तस्वीर एक शख्सियत है
अगर हम अकेले बैठे हैं कमरे में
कई तस्वीरों वाला कमरा
अलग - अलग कोणों से
घेरता है


​मां की तस्वीर
ठिठकी - सी लगती है ​
वह जैसे
किसी प्रकाश में धुंधली होती जाये


एक दिन हमारे एलबम से
पता नहीं चलता कि माँ
कहाँ चली जाती हैं
उसकी चिट्ठियां और उसका नाम
भाषा में नहीं मिलता


जहाँ गिरेंगे हम
वहां वह नहीं होती जब
हम उसे भूल जाते हैं और याद करते हैं


एक दिन
दीवार से उसकी तस्वीर गिर जाती है
दीवारें गिरती हैं और नगर बसते हैं
हम दूर
किसी बस्ती के कोने में
धब्बे की तरह नज़र आते हैं
जब
टूटी तस्वीर हमें देखती है
और उठती नहीं है |


मेरे जाने बगैर


भागती रेल के बारे में
कहना मुश्किल है कि वह
आ रही है
या जा रही है
दूर - दूर टिमटिमाता अँधेरा
पेड़ों की धुंध में छुपता है
तो कहना मुश्किल है
छुपता है कि दिखता है


तेजी से गुजर गए एक स्टेशन के पार
नामालूम - सी बस्ती की आधी रात
खुली रौशन खिड़की किसी में
एक चेहरा छूटकर रह गया है


बहुत बाद में कभी
वह चेहरा मेरे चेहरे में से गुज़र जायेगा
रेल की आवाज़
भीतर कहीं मेरे दूर बहुत - सी छायाओं में
तेजी से भागती
मुझे अकेला छोड़ देगी
और कभी मुझे उस किसी संसार का
पता नहीं चलेगा
जो मेरे जाने बगैर
मेरे भीतर फैलता रहेगा |



राम कुमार के लैंड स्कैप में रहना है


मैं जब भूल जाता हूँ
भाग जाता हूँ लौटता हुआ
पहचान में नहीं आता
मैं जब कुछ नहीं होता सिवा
पहली बार के
अकेला बहुत मैं जब
रह जाता हूँ रहते - रहते
राम कुमार का चित्र देखने जाता हूँ
देखते ही चित्र वह अपने में सिमटता है
अपनी तरह अपने में
लौटता हुआ खुद को अलोप करने की
स्थिरता में ठहरा हुआ

रामकुमार के चित्र में भीतर
चला जाता हूँ
लैंड स्कैप बहुत अपने और भीतर
चला जाता है कितने भीतर जाने के बाद
रुकने के असंभव संयोग में
कहाँ होता हूँ !
इतने बाहर दूर निकल जाऊंगा
कि हर हद पर खड़ा हुआ बेहद
रह जाऊंगा अकेला

मैं रामकुमार के लैंड स्कैप में
रहना चाहता हूँ
दिखना नहीं चाहता
खुद को भूलकर
उसमे याद आना चाहता हूँ |


रचनाकार -------- स्वर्गीय : ----- नवीन सागर
प्रस्तुति ----------- मिता दास |


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