त्रिपुरारि कुमार शर्मा
 

मुखौटा


वह जानती है कि ख़ूबसूरत शब्दों के पीछे
उसका चेहरा आज भी नंगा है
बेलिबास हैं उसकी आँखें
जिनकी पुतलियों की सतह पर
नीले रंग का एक फूल
बत्तीस जुगनुओं की रोशनी में
शाम होते ही महकने लगता है
और सूख जाता है सुबह सूरज के निकलते ही।
वह जानती है कि नाबालिग माँ होना
कितना सुखद और शर्मनाक है
कितनी बेबस हो जाती है आत्मा
जब एक कविता बन जाती है नगर-वधु
और कवि को ‘दलाल’ घोषित कर दिया जाता है।
वह जानती है कि शहर की दीवारों पर लिखे नाम
उस नाम से मेल नहीं खाते हैं
जो उसने पढ़ा था अपने बचपन में
अपनी क्लासमेट की सियाह स्लेट पर
या पोखर के किनारे उगे पेड़ों की पीठ पर
जिसे वह भूल जाया करती थी ‘ती-ती’ खेलते हुए।
वह जानती है कि एक चेहरे में
सिर्फ़ दो आँखें नहीं होतीं
सिर्फ़ एक मुँह नहीं होता आदमी के पास
उसके पास होता है झूठ बोलने का ‘लाइसेंस’
दस हज़ार जानवरों का वहशीपन और
पलकों की ज़मीन पर सपने बनाने के कई नुस्ख़े।
वह जानती है कि मुस्काती हुई मुलायम हवा
समंदर के जिस्म में सिहरन पैदा करती है
एक जादू जगा देती है धूप
अगर घास के होंठों पर ओस की प्यास मौजूद हो
एक मौसम उतर सकता है जंगल में
अगर पत्तियों के झुरमुट में कोई घोंसला बुना जा रहा हो।
वह जानती है कि अकेलापन कोई फर्नीचर नहीं है
जिसे फेंका जा सके घर के बाहर
और धीमी बारिश एक ऐसी चीज़ है
जो ज़ख़्म जगाती भी है और सुलाती भी।
वह सभाओं के समाप्त होने पर पहुंचती है
सारे गिरे हुए चेहरे चुनती है
सारे मुखौटे बुहार कर साफ़ कर देती है ज़मीन
और कहती है—“मुखौटा इंसान की सबसे बड़ी ज़रूरत है”।


चश्मा


माँ चली जाती है नहा कर
मैं धोने लगता हूँ उनके कपड़े
निचोड़ना चाहता हूँ उन कपड़ों से
उनके भीगे हुए दुख
वह रोती है नहाते समय सिर्फ़
सिर्फ़ मैं जानता हूँ यह बात
एक चश्मा है मेरे पास
देख सकता हूँ सच
पहचान लेता हूँ पानी के बीच आँसू
लहू बहता है समय के तलवों से जब
देखता हूँ कुछ पाँव के निशान
पानी के उपर, सारे एक जैसे
रोने लगता है सूरज आधी रात को
बार-बार पलकें बेहोश होती हैं
महकता है स्वप्न की तरह तन
मुस्कान दफ़्न है अनाथालय के फाइलों में
किसी वृद्धाश्रम में, कोई संबंध अब भी
अपने घावों पर करता है मरहम पट्टी
कई लोग सो जाते है भूखे पेट
नहीं देख पाते हैं चाँद और सूरज
इन्हें तो हर चीज़ रोटी लगती है
कुछ लोग मर गए चाँदनी पीकर
सूरज खा कर भी ज़िन्दा हैं कुछ लोग
हवा पर हैं दाँतों के निशान
कुत्ते की नींद है आत्मा मेरी
मैंने रखा है अपने गुल्लक में
एक मुट्ठी आकाश और माँ की दुआ
बाबूजी की चिट्ठी खो गई है कहीं
हथेलियों पर हैं आग की लपटें
चलना नहीं आया आकाश पर अब तक
संबंध का स्वेटर बुन नहीं पाता
बस खोदता रहता हूँ
अपने अंदर सन्नाटे की मिट्टी
इच्छा– कभी तितली, कभी पतंग
अंधेरा करता है आँख-मिचौली
आती है किसी के जाने की आहट
खुलती हैं नींद की खिड़कियाँ
सामने ताक़ पर रखा एक चश्मा
यहीं पड़ा है पिछले चौदह सालों से
बस घूरता रहता है सबको
यही चश्मा पहना करते थे बाबूजी।
परिचय : त्रिपुरारि कुमार शर्मा
एरौत (बिहार) में जन्मे त्रिपुरारि कुमार शर्मा एक कवि, लेखक, संपादक और अनुवादक हैं। इन्होंने शिक्षा, रचनात्मक लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में सफलतापूर्वक कार्य किया है। ये दिल्ली विश्वविद्यालय, इंडियन अकादेमी ऑफ़ ड्रामैटिक आर्ट्स, दैनिक जागरण, स्वाभिमान टाइम्स, हमवतन, अल्पेसो प्रोडक्शंस (फ्रांस), वेस्टलैंड बुक्स और नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया सहित कई संस्थानों के साथ काम कर चुके हैं। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है और फिलहाल, हिंदी फ़िल्मी गीतों पर शोध कर रहे हैं।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, लेख, आदि प्रकशित। ‘स्मृति में साथ’ नरेंद्र मोहन पर केंद्रित संस्मरण-संग्रह में एक लेख शामिल है। पहला कविता-संग्रह ‘नींद की नदी’ और कहानी की किताब प्रकाशनाधीन है। इन्होंने मर्लिन मुनरो, जेन ऑस्टेन, जेनिफर रीसर, केनेथ पैटचेन, स्टीवन वान नेस्ट, नागार्जुन, हरिमोहन झा, आरसी प्रसाद सिंह और राजकमल चौधरी की रचनाओं का हिंदी अनुवाद किया है।
 


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