नित्यानंद गायेन
 

कुरुक्षेत्र का मार्ग

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राजन अंधे थे
बहरे नही
फिर हुई अनहोनी

नही चली विदुरनीति
असहाय थे भीष्म
फिर वही हुआ
जो प्रायोजित था

राज्यसभा में नही सुनी जाती
असहाय की अपील
यहीं से शुरू होता है
कुरुक्षेत्र का मार्ग ||


विभाजन की रेखाएं


भूखंड पर खींची गई
लंबी -लंबी रेखाएं
फिर उन्ही मानवों ने खींच दी
विभाजन की रेखाएं
मानवों के बीच
खुश हैं
विभाजन की रेखाएं खींचने वाले
वे जानते हैं
विभाजित होने पर
कमजोर हो जाता है
इंसान और इंसानियत

साजिशों को जानते हुए भी
खामोश रहे इंसान
मैं इंसानों में
खोज रहा हूँ
खोई हुई
इंसानियत आज ||

पत्तो से अधिक चिंता है

मुझे फ़िक्र है झड़ते पत्तो की
पत्तो से अधिक चिंता है
मुझे इस वृक्ष की उम्र की
मैं पतझड़ के इस मौसम को लेकर
चिंतित हूँ,
जब चिड़िया बैठी है
किसी उम्मीद से ...


 


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