प्रमोद त्रिवेदी की अन्य कविताएँ
 

गाइड


किसी कविता से अधिक रूमानी
उपन्यास से अधिक रोचक और रोमांचक
नाटकों की नाटकीयता को परास्त करता --- शब्दों का सतत प्रवाह
जितना खँडहरों के आसपास और उनके भीतर उतना ही उनसे दूर......
तारिख और तवारीख की वास्तविकता के आसपास एक रहस्यलोक
अवास्तविक वास्तविकताओं से लबरेज़ एक संसार |

अभ्यस्त आँखें ,सैलानियों की हैसियत टटोलतीं
अभ्यस्त भाषा , उनमे अपने लिए जगह बनाती
एक सम्मोहन रचने में व्यस्त
इतिहास की अंधी सुरंगों में सम्मोहन रचते
अटलांटिक घटना क्रम
पेश करते ----
शाही ख्वाबगाह , उन्मादी अट्टहास , बेबस सिसकियाँ ,
गुलाब के खुशबू भरे हम्माम
शराब के प्यालों में छलकती दुरभिसंधियां , पशुता ,
बगावत इतिहास का अवसान वधस्थल चीत्कारें
इन्ही के आसपास कहीं आलीजाह की पाकशाला
शाही पकवानों की महक
सैलानियों की भूख को उत्तेजित करती |

जो रच रहा है शब्द का जादू
वही है , इन शब्दों के सम्मोहन से बाहर
जो रच रहा है नहरें --- ठन्डे और मीठे पानी की
वही भटक रहा है , प्यासे हिरण की तरह अपने
अपने रेगिस्तान में .....
आदमी से धीरे - धीरे वह हो गया तब्दील
एक यंत्र भाषा में
धसक रहा है किसी भव्य दुर्ग के भग्न प्राचीर
की तरह हो रहा है --
वह लगातार खँडहर |

वह जानता है --
अपने वक़्त की कीमत
उसकी भाषा है -- घडी के काँटों पर सवार
दिनारम्भ से दिनान्त तक उसे बने रहना है भाषा
के छलावे में
शाही भोज हों चाहे उसके शब्दों में कितने ही लज़ीज़
पर उसका निवाला तो है ----
अभी उससे दूर , दूर है
भाषा के माया रूप से उसका अपना संसार
इतिहास के सोपानों पर रची गई अपनी कविता में
कब तक ? आखिर कब तक ?


भाषा को इतिहास के कंगूरों पर टांगकर
वह लौटता है अपने जीवन में |
रक्सखाने में माचिस की तीली जलाकर
वह दिखाता है चमत्कार
पर खुद को रौशन कर सके ऐसी नहीं है उसके पास
माचिस की तीली |


हम हँसे


मैं हंसा तो वे भी हँसे
वे हँसे
आखिर पा ही लिया उन्होंने विकल्प
कोई नहीं हो सकता ---- विकल्प किसीका |
फिर भी ,
मैं उनकी समझदारी पर हँसा
मैं हँसा ठीक उसी समय
अपनी बेवकूफी पर भी |


मुझे हँसी आई , अपने हंसने पर
फिर भी मैंने माना ---
अच्छा होता है हँसना सेहत के लिए
फिर भी हम हंसते रहे
अपनी - अपनी सेहत के लिए |
हमने माना ,
हमारी सेहत पर जरूर असर होगा ---
इसी हँसी का .....


हमारे हंसने पर और तमाम लोग हँसे
हम पर हंसने के मौके बचाकर वे हँसे
हंसने के अवसर मिलते कहाँ हैं अब !
ऐसे अवसर गवांने नहीं चाहिए
मैंने अपना भय दबाया और हम हँसे
जाहिर हुई हकीकत
तब भी हँसे
कुल मिलाकर हम हँसे
हम मुर्ख हँसी हँसे
हम समझदार हँसी भी हँसे
हँसाना भूल जाने के बाद
हम सचमुच हँसे |



रचनाकार- प्रमोद त्रिवेदी |
प्रस्तुति - मिता दास |

 

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