वीणा पंडिता कौल
 


इतिहास बदलेगा

निकलूँ
जो में अपनी पृथ्वी अपना आकाश ढूँढने
रोके से न रुक जाउंगी मैं
आये कोई, काटे मुझे
टुकड़े -टुकड़े कर दे मेरे कई बार
केंचुए की तरह हर टुकड़ा
रेंग-रेंग कर चल पड़ेगा, ढूँढने
संसार अपना
कुचला भी जायेगा
तो ज़मीन में गल जायेगा
फिर जन्म लेगा
पौधों में, फूलों में
फैलाते हुए महक
अपना घर बसाएगा
इतिहास बदलेगा ...

घोंसला

रोकने से क्या कोई
रोक लेगा पंछी को
अपना
घोंसला बनाने से
दिल में जिंदा हो आस
तो पंख कुतर भी लिए तो क्या ..
पाँव में उमंग हो
उड़ान न भी भर पाएँ तो क्या
चोंच कलम बनेगी उसकी
तलवार ज़बान होगी
चलेंगे पैर कदम - कदम
पेट के बल छटपटाएगा ....
तिनका -तिनका जोड़ के
घोंसला बनाएगा

श्याम

मंद मंद रोशनी
सर पे लहराते बादल
सामने श्याम रंग पानी
झील डल

मेरी नज़र तक सीमित
हर कण कण में
मेरे श्याम तुम थे
बस तुम ही तुम थे


दूर कहीं हवाओं में
मिठास भरी
बांसुरी की आवाज़
तुहारी ही तो थी

पर तुम तब कहाँ थे
जब ऐसी एक शाम
मेरा घोंसला
जल के खँडहर हुआ था

कलियुग में ही सही
एक और द्रौपदी ने अपना
अस्तित्व खोया था
धैर्य उसका टूटा था

तब भी तुम यहीं कहीं थे
शाम रंग धुंए से
तुम्हारी भी आँखें
भर आईं होंगी

पलकें तुम्हारी भी झपकी
नहीं होंगी तब से
कि आंसू आँखों से टपके
नहीं थे तब के

डलकी आज, लाज की
जो कुछ बूँदें तुम्हारी पलकों से
मैंने अपनी हथेली में
जी भर के समेट लीं

याद सदैव रखूंगी
कि तुम भी
मेरे संग संग कभी
जार - जार रो लिए


धरोहर..1

नन्ही सी चिड़िया
खिड़की के पल्ले पर
चहकती निहारती
आई हो जैसे मेरी बिटिया
पूछने मेरा हाल
भाग भाग हुआ ह्रदय मेरा
और मैं बोली
ओ रूचि ,मेरी बच्ची
खुश रहो जहाँ भी हो
रहो उछलती कूदती
महकती चहकती सदैव….

पर भूलना नहीं
कि थीं तुम नन्हीं सी
जब ठिठुरती डरावनी रात के अँधेरे में
भागती ट्रक के पीछे
लदी गठरियों के साथ
एक गठरी जैसे ही
तुम्हें भी लाद दिया था मैंने,
नहीं भूलना कि तुम्हारे मुंह को
कांपते हाथ से ढककर कहा था मैंने-
' रोना नहीं वर्ना जाग जायेंगे लोग '
और उसी भयानक रात के अँधेरे में
हम हुए थे घर से बेघर
जलावतन

भूलना नहीं मेरी बच्ची
तपती धूप में संघर्ष हमारा
न बुझने वाली प्यास हमारी
बेबसी और अपमान हमारा…

धरोहर....2

हम भाग निकले थे
छुपते छुपाते चुपचाप
डरावनी अँधेरी सडकों पर
बिना जाने किधर
किस ओर
और कब तक
मेरी बच्ची,
यह मेरी पलकों पर
आधा रुका आंसूं
और माथे पर चिंतित रेखाए
तभी से हैं,
तुम न भूलना कभी
फिर लौट आने की तड़प और बेचारगी मेरी
मेरी बच्ची ,
मेरे इस दर्द को न होने देना कभी ओझल
जीवित रखना इसे अपने साथ
संजोये रखना इसे दिल में
और जहाँ मेरी कलम रुके
वहाँ से आगे तुम लिखना
स्वपन और संकल्प मेरा
याद रखना घर लौटने का अधिकार तुम्हारा
है पीढ़ी दर पीढ़ी
दर पीढ़ी

पार तक समयों के आगे फैला
जैसे सदियों पुराने विराट वृक्ष की जड़ें
धरती की गहरी परतों तक फैली.....

एक चिड़िया आई मेरी खिड़की पर बैठी
इस तरह…

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