दिवांशु गोयल 'स्पर्श'
 

 रेल की पटरियां

रेल की दो पटरियां,
अनवरत चलती हुई,
जीवन की जटिलताओं से दूर,
मानो जिद हो गंतव्य तक पहुँच जाने की,

रुकावटें अनेक पड़ती हैं,
मोड़ अनेक मुड़ते हैं,
हर मोड़ पे आके कन्धा देती,
एक तीसरी पटरी,
मनो जिद हो अपना वादा निभाने की,

कभी जेठ की गर्मी में,
कभी फूस की सर्दी में,
समझोतों की रस्म अदा करती 'स्पर्श'
वो जीवन की पाठशाला,
मनो जिद हो दुनिया को पढ़ाने की।

-दिवांशु गोयल 'स्पर्श'

खुश रहोगी ना ?

आज एक महीना हो गया है,
एक दिन भी भूला नहीं हूँ तुम्हें,
चाहो तो मेरे तकिये से पूछ लो,
हर रात मेरी करवटों का हिसाब वही तो रखता है,

अरे ! उसे क्यूँ कोसने लगीं,
वो तो मुझसे भी खुशनसीब है,
तुम्हारी तस्वीर के सबसे करीब वही तो होता है,
और जब तुम नहीं होती ना,
मेरी गर्म सांसों की आवाज भी वही सुनता है,

वक़्त कैसे गुज़रा?
याद है वो रुमाल,
जो तुम मेरे पास छोड़ गयी थीं,
बस उसी से तुम्हारी यादें छन कर आती थीं,
और मेरा वक़्त गुजार देती थीं,
नहीं, चाँद एक भी दिन नहीं निकला यहाँ,
हर रात अमावास थी,

अच्छा अपनी कहो?
क्यूँ रातभर खिड़की में बैठती हो?
मैं अपने आप को क्या जवाब दूंगा?
पता है, मेरे बाग़ के उस फूल ने खिलने से मना कर दिया,
कहता है तुम्हारा 'स्पर्श' चाहिए,
चलो अब बस करता हूँ,
कुछ धुंधला सा दिखने लगा है अब,
शायद आँख में कुछ चला गया है,
खुश रहोगी ना ?


 एक शिकायत है तुमसे


आज एक टूटी सी कलम मिली बस्ते में,
ये शायद वही है,
जिससे हम साथ लिखा करते थे,
मेरी कविता के नीचे अपना नाम भी,
तुमने इसी से लिखा था शायद,
तुम्हारे बिना कुछ उदास सी है आज,
कहो तो वो कलम भिजवा दूँ ......

क्या इतनी व्यस्त हो गयी हो तुम,
अब तो दुपहरी का बहाना भी बनाने लगी हो,
मेरी हंसाने की अदा की तो तुम कायल थी,
उसी का क़र्ज़ उतार दिया होता,
एक ख़त में अपनी हंसी भिजवा दी होती,
अभी भी फुर्सत के दो पल पड़े हैं मेरे पास,
कहो तो वो पल भिजवा दूँ .......

साथ बैठकर देखे वो सपने तो नहीं भूलीं न तुम,
बाल अभी भी खुले रखती हो या चोटी बाँध ली है,
एक रुपया उधार है तुम्हारा मुझ पे,
लौटने के बहाने मिलेगा किसी रोज़ 'स्पर्श',
मेरा दिया दुपट्टा ओढ़ के आना,
फिलहाल तो कुछ यादें ही अब शेष हैं मेरे पास,
कहो तो वो यादें भिजवा दूँ .........!!!

मुझे अभिमान हो

आज मुझे फिर इस बात का गुमान हो,
मस्जिद में भजन, मंदिरों में अज़ान हो,

खून का रंग फिर एक जैसा हो,
तुम मनाओ दिवाली ,मैं कहूं रमजान हो,

तेरे घर भगवान की पूजा हो,
मेरे घर भी रखी एक कुरान हो,

तुम सुनाओ छन्द 'निराला' के,
यहाँ 'ग़ालिब' से मेरी पहचान हो,

हिंदी की कलम तुम्हारी हो,
यहाँ उर्दू मेरी जुबान हो,

बस एक बात तुझमे मुझमे,
वतन की खातिर यहाँ समान हो,

मैं तिरंगे को बलिदान दूँ,
तुम तिरंगे पे कुर्बान हो।
 

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