मेरी बात

रचनात्मक क्षणों में कवि के पास कविता होती है या कुछ भाव, कुछ विचार होते हैं या मात्र प्रतीक। या फिर शब्दों का अंबार होता है, जिसमें से चुन चुन कर कवि अपनी कविता रचता है। कविता अपने आप चल कर आती है, या फिर कवि को उसके पास जाना पड़ता है? क्या कविता भी अपने जन्म के बारे में उसी तरह चिन्तित होती है, क्या वह भी अपने रचनाकर्ता से सवाल पूछती है जिस तरह कि हम कभी- कभी अपने ईश्वर से सवाल करते हैं।
मेरी एक मित्र मेडिसन की डाक्टर हैं, काफी ऊँचे पद पर है, पर वे ना तो आम डाक्टरों जैसे प्रेक्टिस से रुपया कमाती है, न ही नाम के पीछे भागती हैं। एक विचित्र भक्ति भाव में डूबी रहती हैं, मन्दिर जाती रहती हैं। एक बार मैंने पूछा.. आप तो विज्ञान पढ़ी हैं शारीरिक कष्टों का निवारण जानती हैं फिर इस निष्कलंक भक्ति को कैसे अपना पाईं ? उनका जवाब मुझे चौकाने वाला था। उन्होंने कहा कि-- हमे यह तो पढ़ाया जाता है कि किस रोग की रोकथाम कैसे की जाए,  कैसे निवारण किया जाए, यह भी कुछ हद तक जान जाते हैं कि रोग विशेष का मूल कारण क्या होगा। किन्तु यह तो सारी जिन्दगी जान ही नहीं पाते कि रोग होता क्या है,  ‌और क्यों है ? बस यही नहीं जानना मुझे उस अनजान के करीब ले जाता है।
मुझे लगा कि वे मेडिसन की नहीं कविता की बात कर रही हैं। कविता क्या है कि जगह हम यही नहीं खोजते कि कविता क्यों, या कब या फिर किसके लिए है ?  चलिए कविता भी अनेक कारणों के केन्द्र में है,  तो फिर यह भी पूछा जा सकता है कि क्या जरुरत?.......... क्या जरुरत आज के युग में कविता जैसी चीज की, जो अपने आप को ही स्पष्ट ना कर सके।
यह सवाल मैंने अपने से पूछा ,  कुछ मित्रों से भी पूछा। आज जब में नेट पर हजारों कविता के साइट देखती हूँ, विश्व की करीब- करीब हर भाषा में ,  तो मैं सोचने लगती हूँ , कि कुछ तो बात होगी जो कविता अभी भी चल रही है, जलकुम्भी की तरह बिना किसी कारण की खोज किए। यही सोच मुझे शक्ति देती है कि मैं कविता से जुड़ी रहूँ , बिना किसी तरह की प्राप्ति की चिन्ता किए।

कृत्या धीरे- धीरे अच्छी कविता को आकर्षित कर रही है, पिछले कई अंकों से हमे अच्छी कविताएँ पढ़ने को मिल रही हैं। कृत्या का नया अंक भी सुधी पाठकों को निराश नहीं करेगा,  ऐसा विश्वास है। हमारे अग्रज के रूप में मलयालम साहित्य के अग्रज कवि कुमारनाशान को प्रस्तुत किया गया है। हम जानते हैं कि कृत्या अनेक कारणोंवश किसी कवि को विस्तार से प्रस्तुत नहीं कर पाती है, किन्तु हमारा उद्देश्य रुचि जागृत करना है। अगले अंकों में हम कवित्रय के अन्य कवियों से मिलेंगे।

कमला दास की कविता में एक अद्भुत दर्द,  बेइन्तिहा मुहब्बत और बला की साफगोई है, जो उन्हें सदैव ही भीड़ से अलग करती आई है। उनकी कुछ कविताओं को "प्रिय कवि" के रूप में प्रस्तुत कर हम चाहते हैं कि पाठक उन्हें और पढ़े।

कविता के बारे में हम श्रीप्रकाश मिश्र का यूरोपीय कविता के बारे में लेख पढ़ ही रहे हैं, साथ ही कुछ चर्चा है कविता के बारे में भी। कृत्या आशा करती है कि पाठक इस चर्चा में खुल कर भाग लें।

पिछले कई अंको की तरह इस बार भी विजेन्द्र ने अपनी कलाकृतियाँ कृत्या को दी हैँ, हम हर बार यह ज्ञापित करते है कि यदि सुधीजन कलाकृतियों को खरीदेंगे तो कृत्या को जीने के लिए थोड़ी सी आक्सीजन ‌और मिल जाएगी। हालाँकि आज तक कोई प्रस्ताव नहीं मिला है, किन्तु विजेन्द्र अच्छे कलाकार की तरह बिना कुछ माँगे अपनी कलाकृतियाँ कृत्या के लिए देते चले आ रहे हैं।
रेखाचित्र भी प्रभाकर की देन हैं, जो अपने ना रहने को सार्थक बनाए जा रहे हैं।

दोस्तों ! कृत्या आपके हाथ में है, आप से उम्मीद है कि अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करवाते रहें।

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शुभकामनाओं सहित

रति सक्सेना

 


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