अंबरीश की पंजाबी कविताएँ
 

मर्तबान में भर रही है


आम की खट्टी ,  रसदार
महकती फाँकें
मेरी पत्नी आचार डाल रही है
पता नहीं क्यों
अच्छा लगता है
गहरे कहीं महसूस होता
कि ठीक- ‍ठाक ही रहेगा अनागत
बेशक पता है मुझे
कि गिरगिट होता है
आने वाला कल
फिर भी मन भाता है
यूँ देखना उसे
ज्यों साज- संभाल रही हो
अनदीठा समय
और डली- डली
फाँक-फाँक
भर रही हो मर्तबानों में
स्वाद सुरक्षित एवं शाँत
अचार डाल रही मेरी पत्नी
महफूज कर रही है
पूरा एक बरस

अनुवाद‍ सुजाता
 

अंबरीश की अन्य कविताएँ )


विश्वरंजन की कविताएँ

हम तुम और प्यार

पानी कहाँ चढ़ पाता है पहाड़ों पर
वह तो नीचे झुकता है
बहने के लिए

हम और तुम
पूरा झुक जायेंगे
बहने के लिए
मिलने के लिए
*
हममे और तुममे
बहुत अन्दर
कुछ तो है
जिसे हम दोनों ही
न छू पाते हैं
न ही पाते हैं समझ
न रंगों के जरिये
न शब्दों के मार्फत......

पर हम जानते हैं
कि कुछ तो है
जो करता है हमे और तुम्हें
झुकने को बाध्य
एक दूसरे में उतरने को बाध्य
**

( विश्वरंजन की कविता के अन्य अंश )


पराग कुमार मांदले की कविताएँ

आँसू
*
बैठकी जमाए
रहते हैं
आँसू
आँखों में हरदम
ये
थोड़ा-सा हिलें
तो बोऊं
बीज ख़्वाबों के
भूमि में नम।

**

बार-बार
लगातार
यूं छलछलाते हैं
आँखों में आँसू
जैसे
बोलता हो
अनवरत
कोई नन्हा
मासूम बच्चा
कैसे उसे
कोई रोके भला?

***

अधेड़ होती
उम्र में भी
अल्हड़ हैं आँखें
चमक उठती हैं
कभी
ख़्वाबों की रोशनी से
और कभी
अपना चाहा
हो न पाने की
पीड़ा
बरसने लगती है
आँसू बनकर
मुझे नहीं पता
कब आएगी
इनमें परिपक्वता।

( पराग कुमार मांदले की अन्य कविताएँ.. )


सुधाँशु कुमार मालवीय की कविताएँ


मुश्किल

कितना अधिक मुश्किल था
यह सोचना
कि आदमी हवा में उड़ेगा
पंछी की तरह
क्षितिज के पार जाएगा

कितना मुश्किल था
गुनाह की तरह
यह कहना
कि चपटी नहीं
गोल है यह पृथ्वी
और यह
कि सूर्य है
पृथ्वी नहीं ब्रह्माण्ड के केन्द्र में
दिखते हैं जितने सारे ग्रह तारे
उसी का चक्कर लगाते हैं।

कितना विस्मयकारी था
सेब को देखना
गिरते हुए नहीं
खींचे जाते हुए

एक कल्पना
आकाश कुसुम को तोड़ने की
बात करना
इससे अधिक था कहाँ
मानुष का चाँद पर पहुँचना
असूर्यास्त साम्राज्य के अवसान की
बात कहना

कितना मुश्किल है
यह कहना
विज्ञान के हाथों
रहस्यों के ऊपर से
परदे हटते जाने के बाद भी
कि कहीं नहीं है ईश्वर
इस सृष्टि के व्यापार में
है कितना अधिक मुश्किल
यह कहना
कि मुनाफे के बिना भी
चल सकता है
हाथ पाँव हिला सकता है
बहुत तेज गति से
बढ़ सकता है आदमी
अकल्पनीय ऊँचाई पर
पहुँच सकता है
चमत्कार पर चमत्कार
को साकार करते हुए
और यह
‌और कुछ नहीं
मुनाफा ही है
जो नरक दर नरक
मचाए हुए है
सारी दुनिया में!

‌और जब कि
बहुत जल्द
स्वर्ग बनने जा रही है
यह दुनिया
तैयार है सब सामान
इसके लिए
कितना मुश्किल है
इसका विश्वास में आना!

( सुधाँशु कुमार मालवीय की अन्य कविताए )


रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति की कविता


मन पसन्द कविता के लिए

लड़की तुम मन पसन्द कविता के लिए गुड़िया सी रूठती
तब मुझे बहुत परेशान होना पड़ता है
कहाँ से लाउँ मोती सितारे जड़ी कविता
परियों के परिधान वाली कविता

तुम्हारी मन- पसन्द गुड़िया सी कविता
तुम्हारी रंगीन फ्राक सी कविता
मैं बहुत खोजता हूँ रोज- रोज
जब शाम होती है पुल और नदी के पास
उस पहाड़ी पर जहाँ मैं कभी नहीं जाता

तुम्हारी मन- पसन्द कविता
शहर के आस- पास और बीच शहर में खोजता हूँ
लड़ते झगड़ते ‌और प्रेम करते लोगों के घरों और गलियों के मुहानों पर
तुम्हारी मन- पसन्द कविता तो मिलती नहीं
मैं रोज निकलता हूँ
आकाश और धरती पर
तुम्हारी कविता के लिए

तुम रोज मचलती रहना गुड़िया जैसी होकर
ताकि मुझे आगे जाना है
और एक दिन ला सकूँ मन पसन्द कविता......


(रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति की कविता)


रेनु शुक्ला की कविता

नाव

एक नाव खड़ी है
पानी में
किनारे खड़ा पथिक
सोच रहा है
कैसे उतारेगी यह
उस पार
जब खुद ही डूबी है
पानी में
फिर भी
जब बैठता पथिक उसमें
धीरे-धीरे बनाती राह
नाव उतार देती है पार

फिर सोचता है पथिक
वह कैसे जान पाएगा राह
जो दूर खड़ा हो
जो डूबा हो वही जान पाएगा राह
पानी में नाव की तरह

जो डूबी रहती है ताउम्र पानी में
वही उतारती है पार , नाव!


(
रेनु शुक्ला की कविताए )


विनय मिश्र की गजल


रौशनी जैसे अंधेरा बो गई
जिन्दगी वीरानियों में खो गई

मैं मुसलसल गिन रहा हूँ रात दिन
मेरी सदियों से लड़ाई हो गई

कश्तियाँ आँखों में उतराई मगर
एक भी लौटी नहीं है जो गई॔

अपनी ही लाचारियों से चुप रहा
वर्ना क्या क्या बोलती सी वो गई

मुस्कराई ओंस की बून्दे सुबह
रात धीरे से उदासी रो गई

चीख होकर जागने वाली हँसी
खँडहरों में आ, खुशी से सो गई

हर कहीं उसकी महक मौजूद है
लाख तू कहता रहे कि वो गई



(
विनय मिश्र की अन्य गजलें )  


रति सक्सेना की कविता


झील पर मंडराती, मसालों की खुशबू

पूर्वकथन‍-:

कल मैंने तस्वीर खींची
कल मैंने तस्वीर खींची
अपने पैरों की
कैमरा ,
जानते हो, साधारण सा ही है?
कल मेरे पैर , जानते हो
मेरे पैर हमेशा गीले रहते हैं
मीठे पानी में खड़े खड़े
इंतजार में गीले
तुम्हारे इंतजार में, दोस्त!

*
कवि की चिता पर

मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु दिगन्त
अभी न होगा मेरा अन्त!
निराला

यह पहली कविता नहीं है
जिसे अभी- अभी धूल से सनी फाइल से निकाला है मैंने
और भी थीं, जिनकी कोर अभी तक खुली नहीं
मिट्टी की गंध लिए कोरापन बाकी है जिनमें अभी तक

मैंने पहली कविता उठा ली
" अग्नये स्वाहा"
प्रथम आहुति तुम्हारी चिता पर
होने से ना होने की यात्रा इतनी जटिल तो नहीं है?

कल तक तुम यहीं थे
पत्तियों के किनारों पर झाँकती पीलेपन में
मेरी उंगलियों में फँसी कलम में
कागज पर खिंची लकीरों में
पंखे की चक्रवाती हवा में
रसोई में मसाले के डिब्बे में
तुम आज भी यही हो
किन्तु
कलमदान खाली है
रसोई से मसालों की खुशबू खत्म हो गई है
**
" अग्नये स्वाहा"
मैंने दूसरी कविता उठा ली
दूसरी आहुति तुम्हारी चिता पर

समन्दर में किश्ती
किश्ती में जाल
जाल में मछली
एक हत्या, एक मौन
समन्दर के बीचों बीच
तुम्हारा नीला रंग फीका पड़ गया
किश्ती डूब गई
मैं मछली तुम्हारे जाल में
***

यह तीसरी कविता
अन्तिम आहुति अपनी चिता पर
तुम रहोगे यहीं
शब्दों में, ध्वनियों में
साँसों के संगीत में
मेरी यादों के धागों में
अनन्त निरन्तरता में
" अग्नये स्वाहा"

तुम रहोंगे
कविता की पंक्तियों में
जो साथ- साथ लिखीं हमने


( रति सक्सेना की कविता आगे )

 


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