मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली
आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से
साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 
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प्रश्न यह नहीं कि आज कविता की जरूरत है या नहीं,
क्यों कि जिस चीज की हमे जरूरत नहीं होती, प्रकृति उसे स्वतः नष्ट कर देती है। यदि कविता की जरूरत नहीं होगी तो यह विधा आराम से विदा हो जायेगी।

प्रश्न यह भी नहीं कि कैसी कविता लिखी जाये
क्यों कि अभिव्यक्ति को किसी भी दायरे में नहीं बाँधा जा सकता, और ना ही इसकी नकल की जा सकती है

प्रश्न यह भी नहीं कि कविता किस के लिए लिखी जाये, क्यों कि यह वह अभिव्यक्ति है, जिसमें स्वत का होना आवश्यक है, और जिसमें डूबे बिना तैरा नहीं जा सकता।

भाषा और प्रान्तीयता कविता के दायरे में कभी नहीं आते, क्यों कि भाषाई विविधता कविता के दायरे को विशाल बनाती है।

कविता भावना की अनुकृति नहीं है, स्वतः अभिव्यक्ति है, कविता को दायरे में बाधना अनुकृति का मार्ग खोलना है। अनुकृति कला को नष्ट करने में अग्रगामी होगी।


रति सक्सेना
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विज्ञापन में दिखी झक सफ़ेद चादर

वाशिंग मशीन से अभी - अभी धूलि हुई
थोड़ी देर तक तो समझ में न आया

प्रचार किसका है
चादर का - वाशिंग मशीन का -

डिटर्जेंट पाउडर का
कि उस अट्ठारह साल की लड़की का

जो वस्तुओं की फेहरिस्त में अघोषित तौर पर
पूरी तरह थी शामिल
हरि मृदुल
#
भक्क से खुल पड़ा एक शहर
दुस्स्वप्न - सा , जाने कितने
संघर्षों की डगर में भरा हुआ

फिलवक्त सोते - जागते , सफ़र
करते , कविता करते
पढ़ रही हूँ दिल्ली शहर के

वाजदा खान
#
हाँ, बसा ली है एक दुनिया मैंने
हक़ीक़त की दुनिया से अलग,
नहीं टूटते जहाँ सपने
और तोड़ती नही दम
कोई उम्मीद,
नहीं होती फ़िक्र जहाँ इस बात की
की क्या पकेगा चूल्हे पर अगली सुबह
कोख में पल रहे शिशु को
नहीं सताता जहाँ ख़ूनी हाथों का डर,
ज्योतिकृष्ण वर्मा

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यदि हम कविता को सीधे- सीधे दो खण्डों में बाँटना चाहे‍‍--1- जिन्दगी से जुड़ाव की कविता, 2-जिन्दगी से कटाव की कविता, तो हमे यह भी सोचना एवं तलाशना पड़ेगा कि इन दो स्थितियों के बीच भी कोई कविता हो सकती है या नहीं। ऐसी स्थिति में कविता क्या होगी?, जुड़ाव में कटाव या फिर कटाव में जुड़ाव। कुछ विस्तार से कहे तो यहाँ कविता जिन्दगी से जुड़ी होते हुए भी अपना विचरण स्थान अलग- थलग रखे होगी या फिर विरोधी परिस्थिति में जिन्दगी की बात ना करते हुए भी जिन्दगी की बात कर रही होगी। अद्भुत बात यह है कि शिल्प एवं शैली की दृष्टि से जिन्दगी से कटाव की कविता एक विचित्र आकर्षण या सम्मोहन से भरी होती है , जबकि जिन्दगी से जुड़ी अधिकतर कविताएँ हमें धम्म से धरती पर डाल देती हैं। फिर बहस का मुद्दा है कि यदि कविता जिन्दगी की बात नहीं करेगी तो कैसे लोग, समाज या फिर मनुष्यता से जुड़ेगी। व्यवहार में यह देखा जाता है कि सामान्य जन उन गीतों या कविताओं को जल्द अपना लेते हैं जो भावना के सुखद लोक में ले जाने की क्षमता रखती है।

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हमारा दर्शन

थोड़ी-बहुत संपत्ति अरजने में कोई बुराई नहीं
बेईमानी से एक फासला बनाकर जीना संभव है
ईमानदारी के पैसे से घर बनाया जा सकता है
चोर-डाकू सुधर सकते हैं
किराएदारों को उदार मकान मालिक मिल सकते हैं
खरीदार दिमाग ठंडा रख सकता है
विक्रेता हर पल मुस्कुराते रहने की कला सीख सकता है
गरीब अपना ईमान बचा सकते हैं
जीने का उत्साह बनाए रखना असंभव नहीं
लोगों से प्यार करना मुमकिन है
बारिश से परेशान न होना सिर्फ इच्छा शक्ति की बात है
खुश और संतुष्ट रहने के सारे ऊपाए बेकार नहीं हुए हैं
लोग मृत्यु के डर पर काबू पाने में सक्षम हैं
पैसे वाले पैसे के गुलाम न बनने की तरकीब सीख सकते हैं
कारोबार की व्यस्तताओं के बीच एक अमीर का प्रेम फल-फूल सकता है
समझौतों के सारे रास्ते बंद नहीं हुए
बेगानों से दोस्ती की संभावनाएं खत्म नहीं हुई........

अमिताभ बच्चन
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कुछ सलाह उनके लिए जो उद्देश्य के लिए जेल में हैं
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गर्दन पर फंदा कसने के बजाय
यदि धकेल दिया जाये तुम्हें काल कोठरी में
महज़ इसलिए
कि दुनिया के लिए, अपने देश के लिए,
अपनों के लिए उम्मीद नही छोड़ी तुमने
यदि जिंदगी के बाकी बचे दस पन्द्रह वर्षों में भी
तुम्हारे साथ यही सुलूक होता रहे
तो तुम यह भी नही कह पाओगे कि अच्छा होता
जो मुझे रस्सी के छोर पर एक झंडे की तरह टांग दिया जाता
किन्तु तुम्हें डटे रहना होगा और जीना होगा

वास्तव में यह तुम्हें खुशी नही दे सकता
लेकिन तुम्हारा यह परम कर्तव्य है
दुश्मन का विरोध करने के लिए तुम
एक दिन और जियो

मुमकिन है कि
कुएं के तल से आती आवाज़ की तरह
तुम्हारा अंतर्मन भी अकेलेपन से भर उठे

किन्तु दूसरी ओर
दुनिया की हडबडी देख
भीतर ही भीतर सिहर उठोगे तुम
बाह्य जगत में एक पत्ती भी
चालीस दिनों के अंतराल पर निकलती है

अंतर्घट से आती आवाज़ के लिए प्रतीक्षा
नाजिम हिकमत
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VOL - IX/ ISSUE-VI
(जून -जुलाई 2015
)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

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