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प्रश्न यह नहीं कि आज कविता की जरूरत है या नहीं,


क्यों कि जिस चीज की हमे जरूरत नहीं होती, प्रकृति उसे स्वतः नष्ट कर देती है। यदि कविता की जरूरत नहीं होगी तो यह विधा आराम से विदा हो जायेगी।

प्रश्न यह भी नहीं कि कैसी कविता लिखी जाये
क्यों कि अभिव्यक्ति को किसी भी दायरे में नहीं बाँधा जा सकता, और ना ही इसकी नकल की जा सकती है

प्रश्न यह भी नहीं कि कविता किस के लिए लिखी जाये, क्यों कि यह वह अभिव्यक्ति है, जिसमें स्वतः  का होना आवश्यक है, और जिसमें डूबे बिना तैरा नहीं जा सकता।

भाषा और प्रान्तीयता कविता के दायरे में कभी नहीं आते, क्यों कि भाषाई विविधता कविता के दायरे को विशाल बनाती है।

कविता भावना की अनुकृति नहीं है, स्वतः अभिव्यक्ति है, कविता को दायरे में बाँधना अनुकृति का मार्ग खोलना है। अनुकृति कला को नष्ट करने में अग्रगामी होगी।

कुछ तो है कविता में कि अनेक अभिव्यक्ति माध्यमों के बावजूद पढ़ अपढ़, हर कोई इसी माध्यम की शरण लेता है, कभी गीत या संगीत के माध्यम से तो कभी अनबूझे चित्रों के सहारे, तो कभी अक्खरों से खेलते हुए...

जो कुछ भी है,वही हमे दसियों सालों से सिर्फ कविता के बारे में सोचने लिखने और पढ़ने को मदद करता है

कृत्या इसी लगन की कविता है


शुभकामनाएँ

रति सक्सेना



     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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