जिन्दगी से जुड़ाव या कटाव‍‍‍‍‍‍‍‍ ---
--- कविता के दायरे में?



यदि हम कविता को सीधे- सीधे दो खण्डों में बाँटना चाहे‍‍--1- जिन्दगी से जुड़ाव की कविता, 2-जिन्दगी से कटाव की कविता, तो हमे यह भी सोचना एवं तलाशना पड़ेगा कि इन दो स्थितियों के बीच भी कोई कविता हो सकती है या नहीं। ऐसी स्थिति में कविता क्या होगी?, जुड़ाव में कटाव या फिर कटाव में जुड़ाव। कुछ विस्तार से कहे तो यहाँ कविता जिन्दगी से जुड़ी होते हुए भी अपना विचरण स्थान अलग- थलग रखे होगी या फिर विरोधी परिस्थिति में जिन्दगी की बात ना करते हुए भी जिन्दगी की बात कर रही होगी। अद्भुत बात यह है कि शिल्प एवं शैली की दृष्टि से जिन्दगी से कटाव की कविता एक विचित्र आकर्षण या सम्मोहन से भरी होती है , जबकि जिन्दगी से जुड़ी अधिकतर कविताएँ हमें धम्म से धरती पर डाल देती हैं। फिर बहस का मुद्दा है कि यदि कविता जिन्दगी की बात नहीं करेगी तो कैसे लोग, समाज या फिर मनुष्यता से जुड़ेगी। व्यवहार में यह देखा जाता है कि सामान्य जन उन गीतों या कविताओं को जल्द अपना लेते हैं जो भावना के सुखद लोक में ले जाने की क्षमता रखती है। यह भावलोक विशुद्ध काल्पनिक होते हुए भी रसोस्पत्ति मे सक्षम होता है, यथार्थ जिन्दगी से जुड़ी कविताएँ दिल को तभी छूती हैं जब पाठक या श्रोता उस अनुभव से गुजरने की क्षमता रखता हो।
सवाल यह भी है, जिन्दगी शब्द अपने भीतर किस अर्थ को समाहित करती है, क्या यह आदमी की वह मल्कीयत है जिसमें वह अपने सुख- दुख, आशा -निराशा जैसे अनेक भावो के जमीन से जुड़ता है और समाज, लोक और प्रपंच का हिस्सा बनता हुआ जीते- जीते मरता है, मरते- मरते जीता है। जिन्दगी में जिन्दगी के ना होने का भाव इस तरह से जुड़ा होता है कि जिन्दगी कभी- कभी अपने अभाव का पर्याय सी बन जाती है।
जब हम जिन्दगी से जुड़ाव की बात करते हैं तो भी हमारे सामने अनेक दिशाएँ खुल जाती हैं। जिन्दगी से जुड़ाव जिन्दगी के प्रति मोह या रागात्मकता है, जिसे भारतीय दर्शन नकारता रहा है। माया महा ठगिनी हम जानी की बात करते हुए ना जाने कितना सफर पार कर लिया गया। क्या यह जुड़ाव वही मोहात्मकता है जो परिवेश को वैसे ही सलेटी, नीला पीला रंग दे देती है जो उसकी जिन्दगी से काफी परे होता है। या फिर यह वह खुरदरापन है, जिसे हम और अधिक खुरदुरा बना कर पेश कर सकते हैं। शब्दों में इतनी शक्ति होती है कि सामान्य भावों को अधिक खुरदुरा या अधिक चमकदार रूप दिया जा सके। ऐसे में जिन्दगी पार्श्व मे जाने की संभावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है। क्यों कि शब्द चित्रों में जिन्दगी के रंग कहीं ना कहीं बदल जाते है, यही नहीं लेंस की तीव्रता और उपादेयता भी असर डाल सकती है। यही कारण है कि जिन्दगी का खुरदुरापन कविता में अजीब सी चमक लेकर उपस्थित हो जाता है। जब हम निराला के भिक्षुक को पढ़ते हैं तो भिक्षुक की दीनता के साथ शिल्प सौन्दर्य को भी नहीं नकार पाते है। जब हमारी आँखें भिक्षुक के दर्द से नम होतीं हैं तो शिल्प सौन्दर्य से चमक भी लाती हैं। जिन्दगी भी तो कुछ ऐसी ही है, जो दीखता है उसके भीतर बहुत कुछ होता है जो नहीं दीख पड़ता है। ----मैं केरलीय मछुआरिनों को देखती हूँ तो एक अजीब सी आजादी की गंध पाती हूँ, उनकी विचित्र लहराती चाल ‌और कसा बदन.. लापरवाही में सचेतन दिखावा -- कितना आकर्षक होता है, वर्णन नहीं किया जा सकता है। कभी यह भी सोचती हूँ कि किस पहली मछुआरिन ने इस बलखाती चाल की दीक्षा दी होगी? किसने उनकी ड्रेस कोड निर्धारित की होगी। लेकिन जब कभी उनके राग- विरागों से सामना होता है, तो करीब -करीब एक सा दर्द सामने आता है। आदमी मछुआरों का शराब पीना, जुआ खेलना और औरतों को मारना- पीटना, और उनकी कमाई को छीन लेना। फिर भी मैं उन पर कविता की एक पंक्ति भी नहीं लिख पाती । उनके चमकदार रूप को कलम की नोक पर रखूँ तो उनकी पीड़ा को कहाँ रखूँ। और उनकी पीड़ा को शब्द दूँ तो उनके मुक्त हावभावों, चलन , अंगसंचालन को कहाँ रखूँ? लिहाजा जिन्दगी से जुड़ना चाहते हुए नहीं जुड़ पाती हूँ।

आज हम समस्त भावनाओं को मात्र जिन्दगी से जोड़ कर उससे बचे सब को खारिज करना चाहें, यहीं नहीं हम जिन्दगी को भी जीने की तकलीफों, खुशियों गमों आदि तक ही केन्द्रित करना चाहें तो उन सब कल्पनाओं , भावनाओं का क्या होगा जो परोक्ष मे तो जिन्दगी से जुड़ीं है किन्तु परोक्ष में हमे जिन्दगी से दूर ले जाती हैं। वह सब शब्दावलि हमारे शब्दकोश में व्यर्थ हो जाएगी जो कल्पना को प्रतिमान देती है। यूँ तो काफी कुछ होता है जो अपने यथार्थ में भी काल्पनिक होता है, जिसे यथार्थ ना होते हुए भी यथार्थ मान लिया जाता है। जैसे कि माँ शब्द को लेकर जितना काल्पनिक चित्रण होता है उसकी सीमा ही नहीं, यथार्थ भी माँ शब्द को मिथक में परिवर्तित करता है। कोई भी गिरा से गिरा नारी पात्र माँ शब्द के दायरे में आते ही विचित्र लोक में अवस्थित कर दिया जाता हैं, जहाँ से केवल दिव्यता ही करीब होती है। यही नहीं मातृत्व को जिस तरह यथार्थ से जोड़ जाता है, उस वक्त तकलीफ दायक को जिस अपूर्व सौन्दर्य से मण्डित किया जाता है, वह यथार्थ के दायरे में कहीं नहीं आता, लेकिन उससे स्खलन को स्वीकारने में झिझक भी होती है।

कृत्रिमता की ओर गमन और प्रत्यागमन एक दूसरे से जुड़ी स्थितियाँ हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे कि कृत्रिम खाद से जमीन उर्वर और वनस्पति दानवाकार तो बनती गई, किन्तु जब उस दानव ने लोगों का पेट फोड़ना शुरु कर दिया, और जमीन का वन्ध्यापन टिकाऊ होने की स्थिति में आ गया तो पुनः प्राकृतिक स्वाद को याद किया जाने लगा। यूँ तो देखा जाए भाषा का लिप्यान्तर और लिपि का पुस्तकीय आकार भी कृत्रिमता है , किन्तु इसे विकास के दायरे में रखा जाता है। यदि ऐसा है तो नेट पर उपस्थित साहित्य को भी साहित्य के कक्ष में आसानी से स्थान मिलना चहिए था, जबकि ऐसा हुआ नहीं। यहाँ पर विकास के साथ- साथ सुविधा और अपनाये जाने की बात भी आ जाती है। यदि कृत्रिमता को साहित्य की लेंस से देखा जाए तो साहित्य में पूरी तरह से कृत्रिमता से बचना लगभग अंसभव है। साहित्य या कला स्वयं में सत्य का अनुकरण या प्रतिबिम्ब है, स्वयं सत्य नहीं। उसमें सत्य प्रतिभासित अवश्य हो सकता है। जब कृत्रिमता से बचना संभव है तो यथार्थ को पूरी तरह से प्रतिवादित करना कितना सहज होगा, यह विचारणीय है।

अब हम पुनः यथार्थ की कविता की ओर आते हैं, यथार्थ ना तो इतना खुरदरा होता है जितना कि कविता में लगता है , न ही इतना सुनहरा जितना कि दिखाई देता है। भयंकर से भयंकर यथार्थ अपने झेलने की स्थिति में भी अधिकतर सहनीय नहीं होता है। यानी कि जो उस यथार्थ के केन्द्र में हमेशा से है वह उससे हटने की कल्पना से खुश तो होगा किन्तु अपनी स्थिति को इतना नहीं भाग रहा होगा जितना कि सुविधा में रहने वाल चितेरा महसूस करेगा। बड़े बूढ़ों को कहते सुना है.. "जो रहे सो सहे , जो सुने वो डरे", यानी कि यथार्थ क चित्रण कुछ हद तक अयथार्थ हो जाता है, ऐसे में कविता में यथार्थ की भूमिका क्या होगी?

इसका अर्थ तो यह हुआ कि जब हम जिन्दगी की बाते ना कर के उसके आसपास या फिर कुछ दूर चक्कर लगाते हैं तो भी हम जिन्दगी की बात कर रहे होते हैं , और जब हम ठेठ जिन्दगी को शब्दों में उतार रहे होते हैं तो भी हम जिन्दगी से काफी दूर होते हैं। कविता ना तो जिन्दगी से पूरी तरह से कट पाती है और ना ही जिन्दगी से जुड़ पाती है। कहीं बीच में हमें जिन्दगी के आस पास मण्डराने देती है।



रति सक्सेना
9.8.2006

 

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