नाजिम हिकमत को कौन नहीं जानता, उन्हें जितना पढ़ो, कम लगता है, लेकिन जब उन्हे अपनी भाषा में पढ़ों तो आनन्द दुगुना हो जाता है, कृत्या की सम्पादिका नीता पोरवाल ने नाजीहिकमत का बहुत सुन्दर अनुवाद किया है, हिकमत को अपनी भाषा में पढ़ना एक अलग अनुभव है।


 
कुछ सलाह उनके लिए जो उद्देश्य के लिए जेल में हैं
++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++
गर्दन पर फंदा कसने के बजाय
यदि धकेल दिया जाये तुम्हें काल कोठरी में
महज़ इसलिए
कि दुनिया के लिए, अपने देश के लिए,
अपनों के लिए उम्मीद नही छोड़ी तुमने
यदि जिंदगी के बाकी बचे दस पन्द्रह वर्षों में भी
तुम्हारे साथ यही सुलूक होता रहे
तो तुम यह भी नही कह पाओगे कि अच्छा होता
जो मुझे रस्सी के छोर पर एक झंडे की तरह टांग दिया जाता
किन्तु तुम्हें डटे रहना होगा और जीना होगा

वास्तव में यह तुम्हें खुशी नही दे सकता
लेकिन तुम्हारा यह परम कर्तव्य है
दुश्मन का विरोध करने के लिए तुम
एक दिन और जियो

मुमकिन है कि
कुएं के तल से आती आवाज़ की तरह
तुम्हारा अंतर्मन भी अकेलेपन से भर उठे

किन्तु दूसरी ओर
दुनिया की हडबडी देख
भीतर ही भीतर सिहर उठोगे तुम
बाह्य जगत में एक पत्ती भी
चालीस दिनों के अंतराल पर निकलती है

अंतर्घट से आती आवाज़ के लिए प्रतीक्षा करना
दुःख भरे गीत गाना
या पूरी रात छत ताकते हुए जागते रहना
भला तो है किन्तु डरावना भी है

हर बार हजामत बनाते हुए
अपने चेहरे को देखो !
भूल जाओ अपनी उम्र !
दुश्मन से सतर्क रहो
और मधुमास की रातों के लिए
रोटी का आखिरी टुकड़ा खाना
हमेशा याद रखो
और कभी मत भूलो
दिल से खिलखिलाना !

कौन जानता है
वह महिला जिसे तुम प्रेम करते हो
कल तुम्हें प्रेम करना ही छोड़ दे

मत कहना यह कोई बड़ा मसला नही है
यह मनुष्य के लिए
मन की हरी डाली तोड़ देने जैसा होगा

मन ही मन गुलाबों और बागीचों के बारे में
सोचते रहना फिजूल है
वहीँ समंदर और पर्वतों के बारे में सोचना उत्तम होगा

बिना रुके पढते- लिखते रहो
और मैं तुम्हें बुनने और
दर्पण बनाने की सलाह भी दूँगा

मेरा आशय यह कतई नही है
तुम दस या पन्द्रह वर्ष
जेल में नही रह सकते
इससे कहीं ज्यादा .....
तुम कर सकते हो
जब तक
तुम्हारे हृदय के बायीं ओर स्थित मणि
अपनी कांति न गंवा दे !
*

दुनिया का सबसे अजीबो गरीब जीव
++++++++++++++++++++++++++


मेरे भाई, एक बिच्छू की तरह
अँधेरे में बुजदिली से रहते
मुझे एक बिच्छू मालूम होते हो तुम !
कभी गौरैया की तरह फडफडाते,मेरे भाई
मुझे एक गौरैया लगते हो तुम !

मेरे भाई, सीप की तरह बंद, संतुष्ट
तुम मुझे एक सीप से लगते हो
तो कभी सुप्त जवालामुखी के मुहाने से लगे
तुम भयभीत दिखाई देते हो, मेरे भाई

एक नही
पांच नही
दुर्भाग्य से, अनगिनत बार

मेरे भाई, कहीं तुम भेड़ तो नही
जो चोगा पहने चरवाहे के छड़ी उठाते ही
तुरत अपने झुण्ड में जा मिलता है
और फ़िर दौड़ पड़ता है गर्व से, कसाईखाने की ओर !

मुझे लगता है,
तुम इस पृथ्वी के सबसे अजीबोगरीब जीव हो
उस मछली से भी अधिक अजीब
जो जल से भरे समंदर को भी नही देख पाती

और इस दुनिया की कठोरता तो देखो
वह तुम्हारे प्रति कृतज्ञ है

और यदि हम आज भूखे हैं क्लांत हैं, रक्त से तरबतर हैं
और यहाँ तक कि शराब के लिए हमें
यदि अंगूरों की तरह पीस दिया जाता है
तो इसके लिए सिर्फ़ तुम्ही दोषी हो
हालांकि यह कहते हुए मुझे कठोर होना पड़ा है
किन्तु अधिकांश दोष तुम्हारा ही है, मेरे भाई

*


मेरी कविता के बारे में
+++++++++++++++++++
मेरे पास सवारी करने के लिए
चांदी की काठी वाला अश्व न था
रहने के लिए कोई पैतृक निवास न था
न धन दौलत थी और न ही अचल संपत्ति

एक प्याला शहद ही था जो मेरा अपना था
एक प्याला शहद
जो आग की तरह सुर्ख था !

मेरा शहद ही मेरे लिए सब कुछ था

मैनें अपनी धन दौलत
अपनी अचल संपदा की रखबाली की
हर किस्म के जीव-जंतुओं से उसकी रक्षा की
मेरे सहोदर, तनिक प्रतीक्षा तो करो
यहाँ मेरा आशय
मेरे शहद भरे पात्र से ही है

जैसे ही मैं
अपना पात्र शहद से भर लूँगा
मक्खियाँ टिम्बकटू से चलकर
इस तक आएँगी !

*

आशावादी इंसान
+++++++++++++++++++

बचपन में उसने
कभी किसी मक्खी के पर नही नोचे थे
न ही बिल्ली की पूँछ में टिन की केन बाँधी
और न ही भंवरे को माचिस की डिबिया में बंद किया
यहाँ तक कि बाम्बी पर कभी ठोकर भी नही मारी थी
किन्तु बड़े होने पर उसने ये सभी काम किये
जब उसकी मृत्यु हुई
मैं उसके पलंग के पास ही था
उसने मुझसे कहा
मेरे लिए एक कविता पढ़ो
कविता सूरज और समंदर के बारे में
आणविक भट्टियों और उपग्रहों के बारे में
मनुष्यत्व की महानता के बारे में

*

 
लोहे के पिंजरे में शेर
+++++++++++++++++


लोहे के पिंजरे में सिंह को देखो
देखो, उसकी आँखों को गौर से
मानो लोहे के दो नग्न खंजर
क्रोध से तमतमाते हों

किन्तु क्रोध में होने पर भी
वह कभी अपनी गरिमा नही खोता
आता और जाता है
जाता और आता रहता है

तुम उसके घने मुलायम अयालों में
पट्टे के लिए तनिक सी भी जगह नही ढूंड सकोगे
जबकि चाबुक के गहरे निशान
उसकी पीली पीठ पर अभी तक दिखाई देते होंगे
उसकी लंबी टांगें तनाव से अकड़ती होंगी और
दो तांबई पंजें के आकार में दम तोडती होंगी

उसकी गर्दन के बाल
गर्व से तने मस्तक पर एक-एक कर उठते हैं
उसकी नफरत
आती है और जाती है
जाती है और आती है

तहखाने की दीवार पर
मेरे भाई की परछाईं चलती मालुम होती है
ऊपर से नीचे की ओर जाते
और नीचे से ऊपर की ओर

 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ