हरि मृदुल  की कविता


चादर


विज्ञापन में दिखी झक सफ़ेद चादर

वाशिंग मशीन से अभी - अभी धूलि हुई

थोड़ी देर तक तो समझ में न आया

प्रचार किसका है

चादर का - वाशिंग मशीन का -

डिटर्जेंट पाउडर का

कि उस अट्ठारह साल की लड़की का

जो वस्तुओं की फेहरिस्त में अघोषित तौर पर

पूरी तरह थी शामिल



चमक रही थी चादर

बातें कर रही थी वाशिंग मशीन

आधा चम्मच डिटर्जेंट पाउडर के झाग से

भर गया था पूरा टब

किसी जादूगरनी की तरह हँस रही थी

अट्ठारह साल की वह लड़की




दिन में दस बार चमकाई जा रही थी चादर

दिन में दस बार ठूंसी जा रही थी आँखों में

वाशिंग मशीन

झाग टीवी के परदे से कमरे के फ़र्श पर जैसे

अब फैला - तब फैला

वह लड़की तो आठ साल की

मेरी भतीजी के तन में आकर

बस ही गई

मायावी चादर

मायावी मशीन

मायावी लड़की



एक दिन आम हो जाएगी वाशिंग मशीन

कोई बात नहीं करेगा डिटर्जेंट पाउडर की

लड़की बूढी हो जाएगी

मर जायेगा विज्ञापन

चर्चा में रहेगी फिर भी चादर

चादर वही कबीर की

साड़े पांच सौ साल पुरानी झीनी - झीनी बीनी

 

(  हरि मृदुल की अन्य कवितायें)


वाजदा खान की कविता

 

भक्क से खुल पड़ा एक शहर


भक्क से खुल पड़ा एक शहर

दुस्स्वप्न - सा , जाने कितने

संघर्षों की डगर में भरा हुआ

फिलवक्त सोते - जागते , सफ़र

करते , कविता करते ,

पढ़ रही हूँ दिल्ली शहर के

साथ ही रोटी कपड़ा और

मकान का फलसफा

कुबेर की नगरी , माया की नगरी

अजनबीपन के गहरे आवरण

में बिछा , झुण्ड से लिपटा

कोलाहल से भरा शहर

कितना अपरिचित सा बर्ताव

करता, अक्सर एहसास

करता है , मानो पृथ्वी से दूर

कहीं और किसी ब्रम्हांड पर

बसा हो |


 
(वाजदा खान की और कविताएँ)


नरेश चन्द्रकर की कविता

चन्द्रकर

दूसरा आदमी



पढ़ते हुए किताब खुली छोड़ कर जाता हूँ

बांच लेता है कोई

पेरू खाते हुए जाता हूँ

जरा सा उठकर

दांत गड़ा देता है कोई

बातें करते हुए बच्चों से

बार - बार लगता है

कोई सुन रहा है बगल में बैठे पूरी देर

प्रत्येक दृश्य में अदृश्य है कोई

रोशनी के हर घेरे में छिपा है अँधेरा

कागज के पेड़ हैं काले में छिपा है सफ़ेद

सुर में बैठी है बेसुरी तान वस्तुओं की कीमतें हैं

लकड़ी में दीमकें अनाज में घुन हैं

कहे रह जाता है

हमेशा ही अनकहा

शब्दों में छिपे हैं मौन

बसे हुए शहर में अदृश्य हैं नदियाँ

आईने में हैं दूसरा भी अक्स

रहता हूँ जिस गली , मकान में

वहाँ रह चुका पहले भी कोई

चाय के प्याले से चुस्कियां लेते हुए जानता हूँ

जूठा है कप

नहीं मानता फिर भी

नहीं यकीन करता फिर भी नहीं स्वीकारता फिर भी

हर सिम्त में है
हर वस्तु में है

हर मोड़ पर है

दूसरा आदमी !!

 

(नरेश चंद्राकर  की अन्य कविताएँ)
 


चन्द्रकान्त पाटील -मराठी कवितायेँ


तीन आदमी




तीन आदमी गए झूमते हुए माहिम की तरफ

उनमे से एक मुझे ऐसा आदमी लगा जो

अपने ही सपने में मर गया था

यानी मैंने उसका सपना देखा जो उसका था

या कहो कि उस सपने की मीयाद में

मैं वह बन गया

उनमे से दूसरा सारे वक़्त शब्दों से जूझता था

लाखों दिनों से वह उसी तरह जूझता था सड़क पर

तो कोई ध्यान दिए बिना हम आगे चलते रहे

क्योंकि उससे ज्यादा उसके नुमाइशी शब्द

और संसार के सारे शब्द अजायबघर में रखे

भूस - भरे परिंदों की मानिंद लगते हैं




तीन आदमी गए झूमते हुए सड़क पर

उनमे से एक मैं था ऐसा बताया बाकी दोनों ने

तो मैं क्यों करूँ इंकार और किस बात से |


(चन्द्रकान्त पाटील  की अन्य कविताएँ)
 


कमल जीत चौधरी की कविता


बिना दरवाजे वाले घर से चाँद


 वह मेरी अभिन्न

हँसकर विश्वास पूर्वक कहती है -----

जानते हो

चाँद पर

घर आँगन और खेत

एक दूसरे में होते हैं

वहां संधों

सांकलों और चिटकनीयों में फँस

हाथ जख्मी होने से बच जाते हैं

दरअसल

वहां दरवाज़े नहीं होते

फिर चोर होने का सवाल ही कहाँ

वह ठठाकर कहती है

" और यहाँ दरवाज़े वाले घर हैं कि

चौकीदार से भी डरते हैं "



चाँद पर

एक दूसरे के पांव पहचानते लोग

छातों को

पालतू जानवरों की तरह

बगल में दबाकर चलते हैं



वहाँ आईने नहीं होते

लड़कियों को दीवार पर परछाई देखकर

श्रृंगार करने की कला आती है

लड़के माँ की आँखों से खुद को देख लेते हैं

और माँ !

माँ का नाम सुन

वह उदास हो जाती है

फिर शून्य में ताकती कहती है

जाने क्यों

माँ वहाँ भी अपने आपको नहीं देखती


ऐसा आभास होता है

वह चाँद की शोधकर्ता है

अनेक कहानियाँ सुनाती

वह बताती है

चाँद पर पेड़

कुल्हाड़ियों से नहीं डरते

उनकी जड़ें

लोगों के सपनों में होती हैं


सपनों की चाबी किसी ईश्वर के हाथ नहीं होती


वहां नदियाँ

कंठ में खेलती हैं

पानी की जरुरत पड़ने पर

लोग गीत गाते हैं

घड़े लबालब भर जाते हैं


कितनी अच्छी बात है

चाँद पर

पतलून और कमीजों की जेबें नहीं होती

मुट्ठियाँ ख़ुश रहती हैं

वह एक कविता सुनाती

बात जोड़ती है

राम नहीं

चाँद अपने - अपने होने चाहिए ............


कितना अच्छा सोचती हो मेरी दोस्त !

मैं अच्छी तरह जानता हूँ

दरवाज़ों वाले घर में रह कर

चाँद के बारे में ऐसा नही सोचा जा सकता

बिन दरवाज़े वाले तुम्हारे घर को

मेरा कोटी - कोटि प्रणाम ।

 

(कमल जीत चौधरी की अन्य कविताएँ )
 


ज्योतिकृष्ण वर्मा  की कविता


जीने के लिए


हाँ, बसा ली है एक दुनिया मैंने

हक़ीक़त की दुनिया से अलग,

नहीं टूटते जहाँ सपने

और तोड़ती नही दम

कोई उम्मीद,

नहीं होती फ़िक्र जहाँ इस बात की

की क्या पकेगा चूल्हे पर अगली सुबह

कोख में पल रहे शिशु को

नहीं सताता जहाँ ख़ूनी हाथों का डर,

जहाँ लाशों के ढेर पर चढ़कर

नहीं छूना चाहता कोई नभ

खुद बागबाँ के हाथों ही

जहाँ नहीं बर्बाद होता कोई गुलिस्ताँ

पर फिर पूछता हूँ

ख़ुद ही से

क्या जरूरी है बसाना

ख़्वाबों की दुनिया

हक़ीक़त में जीने के लिए?


( ज्योतिकृष्ण वर्मा  की अन्य कविताएँ)



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