हरि मृदुल   की कविता
 

इमारतें

 

सचमुच इतनी ऊँची इमारतें हैं कि

देखने वाले की टोपी गिरने का किस्सा

झूठा नहीं लगता

हाँ , टोपी वाले ही इन इमारतों

को देखते हैं

और खुश होते हैं

टाई वाले तो अन्दर तक जाते हैं

सबसे ऊपर वाली मंजिल पर जाकर भी

नीचे नहीं झांकते



००००००००
 

 घंटा



मुझे सपने में टंगा हुआ एक भारी भरकम घंटा

दिखाई देता है आजकल

ठीक - ठीक वैसा ही

जैसा बन्दर की तरह उछल कर एक मंदिर में बजाया

करता था बचपन में




देखता हूँ कि यह भारी घंटा अब काफी नीचे झुक आया है

इतना कि इसे कोई भी बच्चा बजा सकता है लगातार

में इसी कारण चिंता में पड़ जाता हूँ

लेकिन फिर थोड़ी देर बाद जाने क्यों खुद ही घंटा

बजाने का उपक्रम

करने लगता हूँ

आश्चर्य कि हवा में हाथ लहरा भर जाता है बस

" टन्न " की आवाज नहीं होती



मैं घंटे पर एक गहरी नजर फिर से डालता हूँ तो

चौंक जाता हूँ कि यह तो बिना जीभ का एक

भयावह एक पोपला मुंह है

जो किसीको भी लील लेने को तत्पर लगाता

चीख पड़ता हूँ मैं



चीख सुनकर आसपास खड़े लोग जोर - जोर से

हँसने लगते हैं

फिर उनमे से एक आदमी बड़ा सा हथौड़ा थमा

देता है मुझे

अब मैं विस्मित हूँ

मेरी समझ में नहीं आता है कि क्या करूँ

तब वह मेरे हाथों से हथौड़ा छीन अट्टहास के साथ

घंटा बजाता

चला जाता है टन्न - टन्न - टन्न

हर आवाज विस्फोट - सी



जाने क्यूँ मुझे आजकल यह घंटा

बड़ी ही अजीबोगरीब मुद्रा में

बार - बार दिखाई देने लगा है सपने में



प्रस्तुति : -------मीता दास
 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ