वाजदा खान
 

पिता



परत दर परत अनावृत होती

प्याज के छिलकों - सी स्मृतियाँ

टटोल रही हैं मन कहीं तो जमीन

होंगी तुम्हारे स्नेह की रश्मियाँ

कभी तो लाड़ दुलार

बातों से भीगा होगा मन , तुम्हारा

ही तोअंश था यह अस्तित्व

हाँ ! तुम्हारा ही

तो फिर कैसे इतने निर्मम / इतने

निर्मोही बने रहे कि उम्र के

किसी भी पड़ाव पर तुम्हे कभी

यह एहसास ही नहीं हुआ कि

हमें तुम्हारी कितनी जरूरत है

तुम्हारी एक प्रेरणा / एक प्रोत्साहन

हमें ब्रम्हांड के उस छोर तक

ले जाता जहाँ हम अपनी खुशियाँ

अपना भविष्य दोनों हाथों से

बटोर लाते

तुम्हारा एक स्नेहिल स्पर्श हमें

संघर्ष के दौर में भी टूटने न देता

पीड़ा से विगलित न होने देता

उन तमाम मासूम रातों में जब

पलकों में ढेरों सपने पलने होते हैं

आंसुओं की निशब्द धार में

हम भीगते न होते

यदि तुमने अपनत्व दिया होता तो

राहों के उन तमाम मोड़ पर

जहाँ असंख्य पगडण्डियां छोटे - छोटे

पौधों- सी उगी होती हैं

परछाइयों में ढलकर

हम उन पर निरुद्देश्य नहीं

भटकते होते

मगर तुमने अपने सुरूर / अपने अहम्

को जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण

अंग मान ! हम तो बस

यूँ ही --------

शाश्वत सत्य को साकार करने की

परिभाषा ही बने रहे |



चीड़ के पेड़ देह के इर्द गिर्द




चीड़ के पेड़ देह के इर्द गिर्द

मातीस की प्रसिद्ध कृति " दडांस "

सा करने लगे नृत्य

बजने लगे कृष्ण बांसुरी

जी भर भीगी उनके उद्दाम खामोश

संगीत में नृत्य की ताल पर

बुना मैंने भी अपने अंतर का संसार

चरम आनंद की अनुभूति के साथ ,

जीवन में जैसे कुछ नया रच गया

जीर्ण - शीर्ण , घिसीपिटीकहानी

सदियों से चली आ रही संघर्ष की

दे दिया सात दिनों का

अल्प विराम ,

साँसों को जिन्दा किया

ख्वाहिशों का संसार फिर से रचा

फिर से अबूझ , रहस्यमय

रोमांचक संसार में प्रवेश किया

बंद पलकों के साथ

जो नितांत अपना था |

 प्रस्तुति : -------- मीता दास
 


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