नरेश चन्द्रकर  की कविताएँ

मंदिर के अहाते से



सामूहिक प्रयासों से बने

भित्तिचित्र जैसा था वह कोना

अंकित थी उसमे

अधूरी छूटी आशाएं

अपूर्ण कामनाएं

पूरे न हो पा रहे मनसूबे

टूटते हुए सपने

नाकामयाबियों की फेह्ररिश्तें

असुरक्षित जीवन की शिकायतें

जीने की सामान्य इच्छाएं

भित्तिचित्र जैसे उस कोने मैं

बढ़ते ही जा रहे थे

मन्नतों के रंगीन डोरे

और नारियल

मंदिर के अहाते में खड़े होकर भी

मैंने समझ लिया था ;

इच्छाओं का बुरा हाल

हमारे समय में !!


०००००


जाने की प्रक्रिया



चुपचाप कैसे चली गई

चौमासे की बरसातें

यह पता भी नहीं चला

बारिश की फुहारें देखकर

यह अनुमान कठिन था

कि ऋतांत की बारिश हो रही है

यदि पहले ज्ञात होता

इसके बाद वर्ष भर नहीं होगी बारिशें

रोमांचित रहता मन

चुपचाप करवट लेगा मौसम

इसका संकेत नहीं था

मौसम विभाग के पास भी

बादलों की गर्जना

बारिश में भीगना

सड़कों में जल भराव के दृश्य

सीलन की गंध

गए सब चुपचाप

प्रकृति को देखकर ही नहीं

जीवन पर भी

ठीक बैठता है यह वाक्य

गए सब चुपचाप !!

००००००



रचनाकार : ------ नरेश चंद्राकर

प्रस्तुति : -------- मीता दास

 

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