चन्द्रकान्त पाटील
 

एक ही समय



एक ही समय अनेक कालों में जागते हुए

कालातीत रहना

एक ही समय अनेक स्थानों पर रहते हुए

स्थानातीत होना

एक ही समय अनेक जीवनों में फँस कर मुक्त ही रहना




कैसा भी हो कवि का जीवन

कविता होती है मछलीघर जोसी

आरपार देखते रहो तो

स्पस्ट दिखता है दूसरी ओर का घर

स्पस्ट दिखती है शब्दों और शब्दों के बीच की जगहें

और पंक्तियों और पंक्तियों के बीच का अंतराल



मछलियों पर ही निगाह गड़ी रही

तो पीछे का कुछ भी मालूम ही नहीं होता

देखने वाला हमेशा क्या देखे ?

भाषा का बिल्लौरी घर ?

दूसरी ओर का संसार ?

या चाही गई वस्तुओं का छूटता अनुभव ?
 



कुछ भी देख लो फिर भी

असली कविता को

आलोकित करना ही होता है

कोई न कोई गहरा अँधियारा अंतर - कोना |



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लिखते नही बनी




उमड़कर छलकता हुआ बहा ह्रदय

दोनों किनारे गर्दन तक भीग गए

नदी में पैठी सुबह की धूप जैसा

उतरा उर में

गला डाला अपना अलगपन

लेकिन लिखते नहीं बनी एक अच्छी प्रेम कविता

प्रेम कविता के लिए लगता भी क्या है ?

निस्संदेह निरुपयोगी होती होगी प्रेम की प्रबलता

और देह पर भी किस तरह होगी अच्छी प्रेम कविता ?



नितांत मूल पर करने वाले प्रश्न न हुए

तो कहाँ से मिलने वाला है कविता का धड़कता ह्रदय



अभी - अभी से सारा खालीपन आने लगने पर

प्रतीत होता है भीतर से मुक्त होने जैसा

अभी - अभी से खुल पड़ने लगी है अन्दर की शिला

शायद उसी में ही होगी कविता की सम्भावना की जड़ - मूलें ?



रचनाकार ------ चन्द्रकान्त पाटील

अनुवाद ------- विष्णु खरे

प्रस्तुति ------- मीता दास


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