ज्योतिकृष्ण वर्मा  की कविता,
 

अस्तित्व


बहुत सँभालकर

कुछ मजदूरों ने

उतारा था उस मूर्ति को

चबूतरे से

जिसकी ऊँचाई

अब कम हो चली थी;

आदेश मिला था उन्हें

चबूतरे को कुछ और ऊँचा करके

दोबारा उस मूर्ति को

वहीँ स्थापित करने का



ऐसी कितनी ही मूर्तियाँ

और धँस चुकी इमारतें

अब तक

ऊंची कर चुके थे वे

छोटे लोग!



चिरायु


तुम मेरे साथ हो

बचपन से ही

जुदा न हुई

एक पल के लिए भी

देखता हूँ तुम्हें

हर जगह

छत के नीचे,

भोजन में,

कपड़ों में,

दिन और रात में

तुमने कभी

मेरा साथ न छोड़ा

दूसरों की तरह,

तुम मेरे साथ रही

भीषण गर्मी में

कड़ाके की सर्दी में

तब भी नहीं दे सकता

तुम्हें आशीर्वाद

चिरायु होने का

ऐ ग़रीबी!


बूढ़ा


घर के

एक कोने में

जहाँ कम है लोगों का आना-जाना

वहीँ, दे दिया है उन्होंने

उसे

एक कमरा

और जरुरी सामान भी

एक चारपाई

हाथ का पंखा

पुरानी टूटी चप्पल

पानी की बोतल

कटोरी, थाली और एक चम्मच

कुछ दवाइयाँ

ताकि

आराम से बिता सके वह

समय

बाक़ी है जो

ज़िन्दगी और मौत के

दरमियान |



असमंजस


वो कहते हैं –

आईने में

उनकी तस्वीर अब

धुंधला रही है

दिन-पर-दिन

बेचारा आईना

करे तो क्या?

वो नहीं समझ पाता

एक ही धड़ पर

दो चेहरे

दिखाए कैसे?
 


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