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जब शहर की कोई भी सड़क महफूज ना हो,

जब कोई भी बोली दिल से लग सके,

जब देश की कोई भी सीमा, खुशगवार नहीं लगे

जब अनजाने खतरे अपने काले चोगे फैलाने लगें
तो महसूस होने लगता है कि

यह वसन्त काल नहीं है!

यह अजनबी सा सिलेटी काल , धरती की चरखनी के साथ अंक जरूर बदल रहा है, लेकिन वसन्त काल खुशबू लेकर नहीं आया है,

इस काल की हवा में रक्त की खुशबू है,

इस काल की फिजा में नफरत का रंग है

यह काल आसान तो नहीं है मित्रो!


तो क्या बसन्त के आगमन का इंतजार किया जाये? किस तरह के वसन्त का, यह भी एक सवाल हो सकता हो सकता है?

क्या हम इंतजार करे , ऐसे वक्त का जहाँ किसी को अपना घर ना छोड़ना पड़े?
क्या हम इंतजार करे , ऐसे वक्त का, जब सब समान हों?

क्या हम इंतजार करे उस वक्त का, जब देश और परदेश की सीमाएं मात्र सीमायें रहें, वहाँ ना कोई तोप हो, ना ही बारूद

क्या हम इंतजार करे ऐसी जमीन का जहाँ आदमी किसी भी वर्गभेद में बंधा ना हो

यह काल सही नहीं है

संभवतया मानव इतिहास के अधिकतर काल ऐसे ही रहे हों, फिर भी क्या संभव है कि तनिक सी समझदारी से काल के इस श्याम पत्र को दुरुस्त करने की कोशिश की जाये?

वास्तब में कोशिश में क्या बुराई है?

और ऐसी ही कोशिश है उन दर्दों को आवाज देने की,

बहरे हुए कानों को मन्दिम सुर से आवाज की ओर आकर्षित करने की

संभवतया काल का चक्का रुक जाये
संबवतया वह सही दिशा की ओर मुड़ जाये

कुछ ना भी हो तो कुछ सकारात्मक करने में क्या बुराई है?

कविता अपनी मध्यम ध्वनि में आवाज देती रहेगी

इस अंक के कलाकार है, मार्गस लैटिक जो मथुरा नाम से लिखते हैं

शुभकामनाएँ

रति सक्सेना



     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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