आधुनिक यूरोप की कविता

श्रीप्रकाश मिश्र


हमारे समय में कविता के दो लक्ष्य उभरे हैं- सौन्दर्य और मानवता। अब सौन्दर्य क्या है कविता के सन्दर्भ में...इसे अभी तक कहीं भी आधिकारिक रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। स्थूल कलाओं में जरूर प्रयत्न हुआ है, जहाँ कहा गया है कि वह एक तरफ अंगों के आनुपातिक लगाव ‌और समुच्चय, भव्यता और आँखों को अच्छा लगना बहुत वस्तुगत नहीं होता। हमारी जातीय चाहतें, स्मृतियाँ और व्यक्तिगत रुचि आदि उसका निर्णायक होती हैं। यह भी कहा जाता है यदि निर्माण ठीक ठाक हो गया होता है, एकदम से परफेक्ट हो गया होता है तो वह उबाऊ हो जाता है। ..कला दरअसल पूर्णता प्राप्त होने में जो बचा रह जाता है, जिसे दर्शक अपनी अपनी तरह से पूरा करते हैं और ऐसा करने में जो आनन्द लेते हैं , कला वहाँ होती है। यानी जो हमारी कल्पना को स्फुरित करे , वह भी दिए ढाँचे में, कला वहाँ होती है। वही सौन्दर्य होता है। कविता के संबन्ध में कहा जाता है कि वह भीतर की चीज होती है जो अन्ततः कल्याण भावना की ओर ले जाती है।


यह कल्याण भावना ही उसे मानवता से जोड़ती है । इस मानवता के दो रूप हैं। एक तो वह जो मानव पर जोर देती हैः आदमी चाहे जहाँ का हो और जिस किसी भी रूप में हो, उसका भला होना चाहिए। यहाँ आदमी के बरक्स दूसरे जीवधारी काव्य होते हैं और साधन स्वरूप होते हैं।


आदमियों में भी वे नगण्य हैं जो बृहत्तर कल्याण में बाधक होते हैं। उन्हे नष्ट कर दिया जाना चाहिए, जिससे वह कल्याण सबमें बाँटा जा सके। यह अन्ततः तानाशाही की ओर ले जाता है... चाहे वह व्यक्ति विशेष की हो या समुदाय विशेष की। दूसरा मानवता पर जोर देती है। एक तरफ वह व्यक्ति को अपने सन्दर्भों में स्वत्नंत्र रहने के लिए हिमायत करती है तो दूसरी तरफ जब वह व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों के सन्दर्भों में उनके सम्पर्क में आता है जिससे कहीं टकराव तो कहीं एका पैदा होती है उसे सामाजिक सन्दर्भों में अभियन्त्रित करना चाहती है, जहां तक हो सबकि सहमति से। यह प्रजातन्त्र की स्थापना करती है। आधुनिक यूरोप की कविता दोनों से स्फुरित हुई है। वह आदमी बनाम प्रकृति व स्वभाव ( अंग्रेजी में दोनों के लिए एक ही शब्द नेचर उपयुक्त होता है) से आगे बढ़ती है। जो बाह्य है, प्रकृति है उसकी गहराई और सौन्दर्य का वर्णन रोमान्टिक कविता में है। जो मनुष्य का स्वभाव है - उसकी गहराई और तदजन्य खुदाई से उत्पन्न सौन्दर्य का वर्णन आधुनिक कविता में है। जहाँ वह मानवता से जुड़ती है वहाँ वह मानववाद और मानवता दोनो से अवगणित है। इन सबका समुच्चय आधुनिकतावाद है।


इस कविता की कई रीतियाँ हैं, पहली रीति वाल्तेयर की है, जो कविता में आधुनिकता का वास्तविक जनक है। वह कहता है कि आधुनिक समाज में कवि की भूमिका मसीहा की है, क्योंकि परंपरागत ढंग के मसीहों का जन्म अब असंभव हो गया है। जो सामाजिक, राजनीतिक या नैतिक संस्था‌ओं के शीर्ष पर हैं वे लगभग जड़ और तानाशाह हो चुके हैं। इतने कि न तो वे कुछ नया दे पाने की स्थिति में हैं, और न ही उनकी आलोचना सामान्य जन के लिए खतरे से खाली है। यह दोनो ही भूमिका अब कवि को अख्तियार करनी है। इसकी तार्किक परिणिति तो यह होती है कि कविता सोच कर, विचार कर, सोच और विचार दोनो के लिए लिखी जानी चाहिए। इससे हावी वर्ग को खतरा था। इसलिए उनके एक शिष्य मलार्ले की एक उक्ति को सन्दर्भो में काट कर बहुत प्रचारित की गई, कवि और कविता की भूमिका को नीचा करने के लिए। उक्ति थी- कविता विचारों से नहीं शब्दों से लिखी जाती है, और सन्दर्भ था डेगा की एक जिज्ञासा- मेरे दिमाग में अच्छे अच्छे विचार आते हैं लेकिन मैं कविता नही लिख पाता, क्या करुँ? जाहिर है कि मलार्ले ने जो समाधान दिया था, वह विचार को खारिज करने के लिए नहीं, बल्कि उसे शब्द में पकड़ कर रखने के लिए था। लेकिन कमजोर कलावादी कवियों ने उसे शब्द तक ही सीमित कर दिया। परणिति स्वचालित लेखन में होने लगी। - जो भी दिमाग में शब्द आएँ, उन्हे अण्ट शण्ट तरीके से रखते चले जाएँ, बिना अर्थ पर ध्यान दिए। कुछ नवीनता के पुजारी अति उत्साहित लोगों ने इसका एक शास्त्र ही गढ़ना चालू कर दिया। यह एक तरफ अति यथार्थवाद की ओर ले गई और दूसरी तरफ अतियथार्थवाद की ओर।
हालाँकि इनका कोई ऐतिहासिक क्रम नहीं था।

अति यथार्थवादियों ने लेखन को अचेतन मन का कलाप माना, जो इस कलाप के साथ चेतन मन की कारवाई के साथ समन्वय स्थापित करता है। चेतन मन व्यक्ति बाह्य मन को अभ्यान्तरिक करता है। उसी से अचेतन मन की ग्रस्थावस्था की निर्मिति होती है जो पुनर्सृजन में बाह्य पर एक नई दृष्टि प्रदान करती है। इस में रचना अतार्किक ढंग से विकसित होती है क्यों कि मन हमेशा स्थूल, तार्किक ढंग से नहीं सोचता। संमोहन , स्वप्न, नशा कोटि का अपना तर्क एक अपनी दुनिया होती है। यह सोच माया नहीं होती, भ्रम नहीं होता, यथार्थ का ही वह गोपन पक्ष होता है, जो प्रत्यक्ष में छूट गया होता है। इसकी परिणिति पैरा-फिजिक्स में होती है, जो काल्पनिक समाधानों का विज्ञान है जो परम्परागत ज्ञान द्वारा प्राप्त समाधानों को खारिज करता है। प्रति तर्क, विपरीत मति ‌और बेतुकापन इसका मूलाधार है। इसकी भाथा पैराविनिटी की है जो परंपरागत ध्वनि और अर्थ को आर- पार कर रची जाती है। इसका पात्र स्वयं से ही प्रश्न करता है और स्वयं ही उत्तर देता है जो उसी तक सीमित भी रहता है- सत्यता और उपयोग दोनों में ही। इस पूरे परिदृश्य को सरयिलिज्म कहते हैं। जाहिर है कि यहाँ यथार्थ कहीं नहीं होता जो व्यक्ति बाह्य होता है, जो होता है वह व्यक्ति अंतर है। इसमे मनोविश्लेषण की अपनी भूमिका है। उसकी दो भूमिकाएँ गोचर होती हैं- एक रति की, दूसरी आत्मप्रदर्शन की। अतियथार्थवादी कविता में दोनो का निरुपण है।
शुद्ध कविता से तात्पर्य कविता की उस स्थिति से है , जिसमें वह भव्यता की ओर उन्मुख होती है और इस प्रक्रिया में सभी प्रकार के प्रदूषणों और गंदगियों से मुक्त होती है। यहाँ प्रदूषण और गंदगी से तात्पर्य कविता में दर्शन, राजनीति आदि पर दिए गए जोर से है । दूसरे वह सगीत की ओर मुखातिब होती है। उसमें कविता के कथ्य और उसके शब्दों का बेजोड़ सौंदर्य जिस बात में निहित होता है, वह होता है शब्दों की संवादी ध्वनियों और स्वरों की मधुरता का मेल। इस विचार को प्रतिपादित किया था अमेरिकन कवि एडगर एलेनयो ने और पुष्ट किया था फ्रासीसी कवि बादलेयर ने। आगे चलकर इसकी परणति सौंदर्यवाद की स्थापना में हुई।

क्रमशः


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