तुकाराम

बार-बार काहे मरत अभागी । बहुरि[1] मरन से क्या तोरे भागी ।।धृ०।।
ये ही तन करते क्या ना होय । भजन भगति करे वैकुण्ठ जाए ।।१।।
राम नाम मोल नहिं बेचे कवरि[2] । वो हि सब माया छुरावत[3] झगरी[4] ।।२।।
कहे तुका मनसु मिल राखो । राम रस जिव्हा नित्य चाखो ।।३।।
बार-बार काहे मरत अभागी । बहुरि[1] मरन से क्या तोरे भागी ।।धृ०।।
ये ही तन करते क्या ना होय । भजन भगति करे वैकुण्ठ जाए ।।१।।
राम नाम मोल नहिं बेचे कवरि[2] । वो हि सब माया छुरावत[3] झगरी[4] ।।२।।
कहे तुका मनसु मिल राखो । राम रस जिव्हा नित्य चाखो ।।३।।

बोले तैसा चाले । त्याची वंदीन पाउले ॥
अंगे झाडीन अंगण । त्याचे दासत्व करीन ॥
त्याचा होईन किंकर । उभा ठाकेन जोडोनि कर ॥
तुका म्हणे देव । त्याचे चरणी माझा भाव ॥
 


तुकाराम महाराष्ट्र के एक महान संत और कवि थे। वे तत्कालीन भारत में चले रहे 'भक्ति आंदोलन' के एक प्रमुख स्तंभ थे। उन्हें 'तुकोबा' भी कहा जाता है। इनके जन्म आदि के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। तुकाराम को चैतन्य नामक साधु ने 'रामकृष्ण हरि' मंत्र का स्वप्न में उपदेश दिया था। इसके उपरांत इन्होंने 17 वर्ष संसार को समान रूप से उपदेश देने में व्यतीत किए। तुकाराम के मुख से समय-समय पर सहज रूप से परिस्फुटित होने वाली 'अभंग' वाणी के अतिरिक्त इनकी अन्य कोई विशेष साहित्यिक कृति उपलब्ध नहीं है। अपने जीवन के उत्तरार्ध में इनके द्वारा गाए गए तथा उसी क्षण इनके शिष्यों द्वारा लिखे गए लगभग 4000 'अभंग' आज उपलब्ध हैं। तुकाराम ने अपनी साधक अवस्था में संत ज्ञानेश्वर और नामदेव, इन पूर्वकालीन संतों के ग्रंथों का गहराई तथा श्रद्धा से अध्ययन किया था। इन तीनों संत कवियों के साहित्य में एक ही आध्यात्म सूत्र पिरोया हुआ है।

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साभार bhartdiscovery.org


भारत कोष से साभार
 


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