समरेन्द्र बिश्वास { बांग्ला कवि }

 

यदि कुछ बन पड़े तो मुझे भी सिखाओ


चुप क्यों हो ?

अब मेरे तीर धनुष , साज - सज्जा , कवच - कुंडल

तुम्हारे चरणों में रखता हूँ |



बादलों में बादल नहीं


धूप तेजहीन है,

समय की चिंतायें घिसे हुए फिल्म की तरह धुंधलाया |



कौन किस से मांग रहा है भीख ?

यह शहर भी जनहीन , तृण भूमि है ,

आँखों में मरुस्थलीय मोह माया ।

यदि कुछ बन पड़े तो मुझे भी सिखाओ ?

यह रहे मेरे तीर - धनुष , साज - सज्जा , कवच - कुंडल

तुम्हारे ही चरणों में रखता हूँ ।


( समरेन्द्र बिश्वास { बांग्ला कवि } की अन्य कवितायें)


सुशांत सुप्रिय  की कविता

दीवार

बर्लिन की दीवार
कब की तोड़ी जा चुकी थी
लेकिन मेरा पड़ोसी फिर भी
अपने घर की चारदीवारी
डेढ़ हाथ ऊँची कर रहा था

पता चला कि वह उस ऊँची दीवार पर
काँच के टुकड़े बिछाएगा
और फिर उस दीवार पर
कँटीली तारें भी लगाएगा

मैं नहीं जानता
उसके दिमाग़ में
दीवार ऊँची करने का ख़याल
क्यों और कैसे आया

हाँ , एक बार उसने
मेरे लॉन में उगे पेड़ की
वे टहनियाँ ज़रूर काट डाली थीं
जो उसके लॉन के ऊपर फैल गई थीं

पर उस पेड़ की छाया
इस घटना के बाद भी
बराबर उसके लॉन में पड़ती रही
एक ही आकाश
इस घटना के बाद भी
दोनो घरों के ऊपर बना रहा
धूप इस घटना के बाद भी
दो फाँकों में नहीं बँटी
और हवाएँ
इस घटना के बाद भी
बिना रोक-टोक
दोनो घरों के लॉन में
आती-जाती रहीं

फिर सुनने में आया
कि मेरे पड़ोसी ने शेयर-बाज़ार में
बहुत पैसा कमाया है
कि अब वह पहले से ऊँची कुर्सी पर
बैठने लगा है
कि उसकी नाक
अब पहले से कुछ ज़्यादा खड़ी हो गयी है

मैं उसे किसी दिन
बधाई दे आने की बात
सोच ही रहा था
कि उसने अपनी चारदीवारी
डेढ़ हाथ ऊँची करनी शुरू कर दी

उन्हीं दिनों
रेडियो टी. वी. और
समाचार-पत्रों ने बताया
कि बर्लिन की दीवार
तोड़ने की बीसवीं वर्षगाँठ
मनाई जा रही है ...

याद नहीं आता
कहाँ और कब पढ़ा था
कि जब दीवार
आदमी से ऊँची हो जाए
तो समझो
आदमी बेहद बौना हो गया है


(सुशांत सुप्रिय की और कविताएँ)


सोनी पाण्डेय  की कविता


छोटे शहर की लड़की. .


​​
छोटे शहर की लड़की
पारुल
जा रही है ब्याह कर
मुखौटोँ के शहर दिल्ली
पति दिल्ली मेँ लाखोँ के पैकेज पर कार्यरत है
गाड़ी . फ्लैट . और सुख सुवि
​​
धाओँ से भरा जीवन होगा
बेटी का
​ ​

इस लिए पिता ने लाखोँ खर्च कर भेज दिया
बेटी को बड़े शहर दिल्ली
अभी आऐ हुए
ज़ुमा - ज़ुमा चार दिन ही हुए थे कि पति ने फरमान जारी किया
ये गवारु परिधान
सिन्दूर . बिन्दी उतारोँ और
ठीक वैसे रहो
जैसे रहती हैँ बिल्डिँग की औरतेँ
पारुल ने छोड़ दिऐ
पिहर के परिधान
अब वह पहनती है ठीक वही कपडे जो पहनता है
बड़ा शहर दिल्ली
अभी ज़ुमा -ज़ुमा आए चार माह ही गुजरे हैँ कि पति चाहता है
पारुल नौकरी करे ठीक वैसे
जैसे करती हैँ बिल्डिँग की अन्य औरतेँ
फरमान जारी किया
पूरे दिन घर मेँ बैठी रहती हो गवारोँ की तरह
नौकरी करो
एम0ए0. बी0एड0
पारुल अब पढाती है पब्लिक स्कूल मेँ ठीक वैसे
जैसे पढातीँ हैँ औरतेँ छोटे शहरोँ की
जैसे पढ़ाता है बड़ा शहर दिल्ली
सुबह आठ बजे से रात बारह तक
पति करता है काम बड़े पैकेज पर
बैँक भर रहा है रुपयोँ से
पति पारुल को पहनाता है मँहगेँ कपड़े . क्रेडिट कार्ड से कराता है खरीददारी
लेकिन नहीँ जानना चाहता पारुल की पसन्द
नही सुनना चाहता उसकी भावुक फरियाद
तुम औरतेँ सेण्टीमेण्टल होती हो
थोड़ी क्रेजी भी
जिन्दगी मेँ प्रेम एक जरुरत है फिजिकल
ठीक वैसे . जैसे भागती हुई मैट्रो मेँ जीता है
बड़ा शहर दिल्ली
पारुल तलाशती है मैट्रो मेँ बैठी
हम उम्र औरतोँ की आँखोँ मेँ
अपना छोटा शहर
अनगिन आँखोँ मेँ पाती है
प्यास अपनी सखियोँ के सपनोँ की
भूख उड़ान की . मन भर अपने मन की
तलाश अपने पसन्द के कपड़ोँ की
ख्वाहिशेँ अपनी . अपना जीवन
अपनी शर्तोँ पर जीना
लेकिन पिता चाहते हैँ बेटी राज करे पति के बड़े पैकेज की नौकरी मेँ
ठीक वैसे ही , जैसे करतीँ हैँ छोटे शहर की लड़कियाँ
जीता है बड़ा शहर दिल्ली
लगा कर मुखौटा आधुनिकता का पारुल जीती है पति के शर्तोँ पर समेट कर आँखोँ
मेँ छोटे शहर के सपने .अपना जीवन
और तलाशती है हर एक मेँ अपना छोटा शहर ।


(सोनी पाण्डेय  की अन्य कविताएँ)
 


शुभम अग्रवाल की  कविता

 

देखो ध्यान से सुनना

सुनो देखते रहना

होंठ हिलेंगे अभी

शब्द फूटेंगे अभी

गुंजार न हो भले ही

सूरज ढल गया है कब का

रात चढ़ आई है सर पर

दिए की लौ में डोलती हैं परछाईयां

उस छोर तक जहां पहुँचती है दृष्टि

वहीं तक है हमारी सृष्टि

रहना है हमे

इन्ही दीवारों के भीतर

बाहर मत जाना

भाग आओगे डरकर

की अँधेरे में ,

घूमता है 'आज'

और घूमता है 'कल'

वर्त्तमान भ्रम लगता है

भविष्य, धुंधला और अस्पष्ट,

एक भूत ही है जो हमारा है ,

एक अंगुली तुम रखना ,

एक अंगुली हम रखेंगे ,

और स्मृतिपटल से एक याद उठाकर

उसे साझा करेंगे

तुम्हारी उतरन में ही मिलेगा मुझे

अपना निचोड़

( शुभम अग्रवाल की अन्य कविताएं )


अनन्त कुमार

संकायाध्यक्ष

संकायाध्यक्ष हूँ मैं
संकाय भी मैं और संकायाध्यक्ष भी मैं
बाकि सब ...
वो क्या जाने, क्या होता है संकायाध्यक्ष
इसका महत्व, इसकी गरिमा, दंभ और जाने क्या क्या
वो तो महसूस करते हैं संकायाध्यक्ष की ...
खीजते हैं, लोकतंत्र की बात करते हैं
नियम, समता, और जाने क्या क्या की दुहाई देते हैं
वो क्या जाने, क्या होता है संकायाध्यक्ष

मैं संकायाध्यक्ष हूँ, और बना रहूँगा
कौन बताये इन्हें, कभी कभी अनायास ही
रातों में डर जाता हूँ
नींद खुल जाती है
इस विचार मात्र से ही डर जाता हूँ
मूर्छा सी आने लगती है

फिर एक नई शक्ति का संचरण होता है
मन कहता है, डरो मत
तुम संकायाध्यक्ष हो
तुम्हें कोई डिगा नहीं सकता

और हमने तो महसूस किया है, देखा है
संकायाध्यक्ष की इस गजब की ताकत को
जो मुर्दा को भी जिन्दा कर दे
अनुपस्थितों को भी उपस्थित कर दे

हे इश्वर, नाश हो
उन सबका
जो मेरी संकायाध्यक्षता पर सवाल उठाते हैं
वो क्या जाने, क्या होता है संकायाध्यक्ष
इसका महत्व, इसकी गरिमा, दंभ और जाने क्या क्या
 


मणि मोहन  की  कविता

 

प्रार्थना
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जीवन में आकंठ
डूबा हुआ मनुष्य
अचानक एक दिन
पुकारने लगता है
मृत्यु को
और देखते ही देखते
बदल जाते हैं
उसकी प्रार्थना के
कथ्य , शिल्प और भाषा।

मकड़ी
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जरा सी कम हुई
हमारी आवाजाही
चीजों के करीब
कि आ धमकती है मकड़ी
और बुन देती है जाले

तस्वीरें , किताबें
गुलदान , सितार या हारमोनियम
सब उसकी ज़द में हैं

हमारे सौंदर्यबोध पर भी
उसकी नज़र है ।

( मणि मोहन  की अन्य कविताएँ)


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