समरेन्द्र बिश्वास { बांग्ला कवि }
 

दिनों बाद जीवनानंद


दिनों बाद जीवनानंद ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दी ,

और बोले----- चलो चलें , घूम आयें इस बरसती बूंदों से भीगे हरे भरे वन में ,

ठीक उसी वक़्त एस 0 टी 0 डी 0 पर एक जरूरी ट्रिंग … ट्रिंग … रिंग

कहा --- आज नहीं , चलेंगे फिर किसी दिन सैर को ।



उस वक़्त जब रात का दूसरा प्रहर ; कते लाश की तरह स्वप्न लोड़कर मैं

आँखे खोलता हूँ । हेमंत जैसे अटका हुआ था खुले खिड़की पर ।

जीवनानंद म्लान हँसते हुए चेहरा आगे बढ़ा कर बोले ------ जाओगे क्या ?

आँखे रगड़ कर देखता हूँ कविताओं के पन्ने उड़ रहे हैं

कांक्रीट के क्वाटरों के टैरिसों पर ।

हँस उठता है अन्धकार ---- क्या कोई कविता पढ़ता भी है ?

थकी आँखों से जीवनानंद खट - खुट करते चले गए और भी अन्धकार में ;

कह गए ----- ठीक है आज जाता हूँ ।


कई दिनों बाद एक शाम जीवनानन्द सैर करने आये ,

टन - टून करता हुये उस हाथ रिक्शा में बैठ ।

उस दिन मैं भी घर पर नहीं था , कपाट बंद था , शायद

ड्यूटी पर था या क्लब के बार में ।

लौट कर देखता हूँ , सिर्फ पड़ा हुआ है उनके हाथों का लिखा एक कागज का पुर्जा :

हो सके तो पहुँच जाना शिवनाथ नदी के निकट , शमशान के पास ,

शाम सात बजे

संग उसे भी ले आना जिसे तुम " बनलता सेन " कहते हो ।

असहज सी रात । और मैं डूब जाता हूँ एक बेहोशीमें ……

स्वप्न में देखता हूँ हमारी " बनलता सेन " जागती आँखों से

पढ़ती जाती कम्पीटीशन के पाठ ,

कंप्यूटर इंटरनेट मैं उसके चेहरे पर देखता हूँ

कविताओं के पंख तोड़ने का हिसाब और विषादकी छाया ।

००००००

 तुम्हारा चेहरा


आग बरस रहा था रास्ते में

गली कूचों में

गुलमोहर पर , तुम्हारा एक चेहरा ।



आग बरस रहा था रास्ते में

वैष्णव पदावली में

ईंट - कांक्रीट के नगर में , तुम्हारा एक चेहरा ।


आग बरस रहा था शाम भी

तुम्हारा रास्ते पर चलाना

तुम्हारे चेहरे , सीने में ----- इतना अभिमान ।


फिर गुच्छों - गुच्छों में

दौड़ कर आई हवा

तुम्हे नहलाकर सराबोर कर गई ,

मेरे घर में

कंपित तुम्हारे दोनों आखें ।

आग के बुझ जाने पर

बचता क्या है ?

राख - राख और उसके भीतर

और भी आग ----------------

तीव्रता ।

आग के भीतर ही जगता है बारबार

एक ही चेहरा , तुम्हारा चेहरा ।

०००००

रचनाकार :------ समरेन्द्र बिश्वास { बांग्ला कवि }

अनुवाद : --------- मीता दास
 


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