सोनी पाण्डेय
हम पूरब मेँ सूर्य को निहार लेते हैँ



अल सुबह
पूरब मेँ उगते सूर्य को निहारना
वस्तुतः एक ऐसी क्रिया है
जो जोड़ती है हमेँ जड़ोँ से ।
हम औरते
सभ्यता के गमले मेँ
उगा हुआ बोनजाई हैँ
जिसे आसानी से हस्तानान्तरित किया जा सकता है ।
संवेदना की ज़मीन से उखाड़कर
पैदा होते ही रोप दिया जाता है आँगन मेँ एक किनारे
गमले मेँ
खाद .पानी देकर इस तरह तैयार किया जाता है कि
एक तय समय सीमा मेँ
दान किया जा सके दूसरे के आँगन मेँ ।
दूसरे आँगन मेँ जगह बदलती जरुर है
किनारे से हटा कर आँगन के मध्य तुलसी की तरह सजा दिया जाता है और जरुरत भर
खाद . पानी समय - समय पर मिलता है
सम्मान थोड़ा बढाकर ।
हम औरतेँ जड़ोँ की तलाश मेँ पूजतीँ हैँ तुलसी
भोरे निहार आती हैँ सूरज
कि . उनकी जडोँ से इनका उतना ही गहरा नाता है
जितना शिशु का गर्भनाल से और
मन ही मन कर लेती हैँ सन्तोष की सूरज आज भी माँ के गर्भनाल से जुड़ा
जोड़ता है उन्हेँ जड़ोँ से ।


अपनी जड़ेँ तलाशती सन्नोँ.


पिता ने तलाश ली है
न ई उर्वरा ज़मीन
खूब विस्तार है
पास ही नदी बहती है
दरवाजे पर राजा की सवारी है
परजा हैँ
पसारी हैँ
दूर तक फैला है ठाट
पिता की इकलौती सन्तान सन्नोँ
खोदी जा रही है जड़ समेत
धूम - धडाके . गाजे - बाजे
सहनाईयोँ की धून पर चल रहा है कुदाल
हल्दी . मटमंगरा .
बारात . द्वारपूजा


और अन्ततः सिन्दूरदान
उखड़ गयी सन्नोँ
कराहते . रोते . चित्कारते पहुँची
न ई ज़मीन मेँ
गाड़ी जारही है सन्नोँ
भर रहे हैँ घाव
निकल रही हैँ शाखाऐँ
​​

लेकिन जड़ोँ से उखाड़ी गयी सन्नोँ जानती है
उखडना उसकी विवशता है
उखाडी जा सकती है एक बार फिरसे बेटोँ के हाथोँ
और बीच से काटकर
बांटी भी जा सकती है
इस लिए अपनी जड़ोँ की तलाश मेँ गढना चाहती बेटी के लिए
एक ऐसा गमला जिसे आसानी से जड़ समेत आयात - निर्यात किया जा सके . बिना उखाडे ।
 


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