शुभम अग्रवाल की अन्य कविताएं
 

1.  

रात मौन है

दिन हारा हुआ

खड़ा है सर झुकाए

अपराधी की तरह

प्रश्न थे गंभीर

निरुत्तर भी

विजय किसकी हुई ?

कौन गया हार ?

यह कौन निर्धारित करेगा ?

धागे कहाँ से जुड़े थे , और

उन्हें कहाँ से तोडा जायेगा ?

यह कौन तय करेगा ?

आखिर इस प्रपंच का

कौन होगा सूत्रधार

२.


देखो ध्यान से सुनना

सुनो देखते रहना

होंठ हिलेंगे अभी

शब्द फूटेंगे अभी

गुंजार न हो भले ही

सूरज ढल गया है कब का

रात चढ़ आई है सर पर

दिए की लौ में डोलती हैं परछाईयां

उस छोर तक जहां पहुँचती है दृष्टि

वहीं तक है हमारी सृष्टि

रहना है हमे

इन्ही दीवारों के भीतर

बाहर मत जाना

भाग आओगे डरकर

की अँधेरे में ,

घूमता है 'आज'

और घूमता है 'कल'

वर्त्तमान भ्रम लगता है

भविष्य, धुंधला और अस्पष्ट,

एक भूत ही है जो हमारा है ,

एक अंगुली तुम रखना ,

एक अंगुली हम रखेंगे ,

और स्मृतिपटल से एक याद उठाकर

उसे साझा करेंगे

तुम्हारी उतरन में ही मिलेगा मुझे

अपना निचोड़


३.


अभी तो

कुछ देर पहले

हुआ एहसास जन्म का

अभी तो

कुछ देर पहले

निकला था

किसी औरत की कोख से

अभी तो

भरी थी सांस

पहले-पहल

अभी तो

अनुभूति हुई थी

प्यास की

अभी तो

देखा भी नहीं

खुद को , किसी को ,

नयनभर

की उठाकर,

रख दिया मुझे

कठपुतलियों की टोली में

की कर दिया मुझे अंगीकार

किरदारों से

और थमा दिए हाथों में

अनजाने संवादों से भरे कागज़



राह ताकनी है मुझे

की कब गिरेगा पर्दा

गिरेगा भी की नहीं

कब मिलेगी

मेरे हिस्से की

छुपने की जगह

या बितानी होगी यह रात

निर्वासित,

चीलों की तरह , आकाश में

अभी तो कुछ देर पहले

हुआ है एहसास

अजन्मा होने का

अभी तो

कुछ देर और

छुपा रह सकता हूँ
 
किसी औरत की कोख में

४.


मैं ,
आत्मीयता को अकुलाता हुआ ,
रेलगाड़ी की इस ऊपरी बर्थ पर ,
एक उलटे कीड़े की तरह पड़ा हुआ ,
बहुत प्रयत्न करने पर भी ,
नहीं भुला पाता हूँ ,
अपने समीप , एक स्त्री के होने के एहसास को ,
मैँ क्यों उठाता हूँ ,
यह जोखिम , बार - बार ,
की यह आत्मीयता
मुझे घसीटते हुए ले जाती है
घृणा की ओर , और छोड़ देती है ,
बेसहारा , बीच सड़क पर ,
और मैं ,
आत्मीयता से घृणा तक के ,
इस जीवन-चक्र में घूमता हुआ ,
कसता चला जाता हूँ ,
एक ढिबरी की तरह।


 


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