मणि मोहन  की कविता,
 

एक प्रेम कविता
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वो मुझे बहुत खूबसूरत लगती है
जब बैठी हो
अपने पूजाघर में

अगरबत्ती का धुंआ
और गुलाब के फूलों की ख़ुशबू के बीच
जब वह बुदबुदाती है कोई मंत्र
या प्रार्थना
तो बहुत मन करता है
कि चूम लूँ अपने होंठों से
उसके मंत्र
उसकी प्रार्थना ।

एक छोटी सी प्रेम कविता

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कुछ कहा मैंने
कुछ उसने सुना
फिर धीरे - धीरे
डूबती चली गई भाषा
साँसों के समंदर में ...
हम देर तक
मनाते रहे जश्न
भाषा के डूबने का ।

इतवार की सुबह
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यह एक अलग तरह की सुबह है
और सुबहों से एकदम अलग
देसी गुलाब की तरह खिली हुई
इतवार की सुबह

कांव - कांव करता हुआ एक कौआ
अभी - अभी उड़ा है किसी दरख़्त से
एक पल के लिए
मैं अपने अधिकारी के बारे में सोचता हूँ
और खिलखिलाकर हंस पड़ता हूँ
यह कल्पनाओं की सुबह है


बगीचे की बाउंड्रीवाल पर
दौड़ती हुई निकल जाती हैं
दो नन्हीं गिलहरियां . . .
उफ़्फ़ ! मैं तो भूल ही गया उनसे पूछना
सेतु - समुद्रम की कथा -
भूलने से याद आया
यह तो भूलने की सुबह है

एक - एक कर बुहारना है अभी
सप्ताह के बाकी तमाम दिन
और फिर बगीचे में गिरे हुए
सूखे पत्तों के साथ
उनमे आग लगानी है -
हांलाकि मुझे पता है
वे फिर पैदा होंगे
अपनी ही राख से
फिनिक्स की तरह . . .

बहरहाल
फिलवक्त मुझे
सिर्फ इस सुबह के बारे में सोचना है
जो खिली हुई है
अपराजिता की लता में
नीले रंग की तितली बनकर ।

जन्मदिन
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मुझे पता है
अपने जन्मदिन पर
उसे क्या चाहिए

असंख्य संख्याओं से भरे
मेरे स्मृति कोष में
बनी रहे
यह एक छोटी सी तारीख़
और ऐन वक्त पर

किसी खरगोश की तरह उछलते हुए
निकल आये बाहर
और उसे चौंका दे ....

मुझे पता है
अपने जन्मदिन पर
उसे बस इतना चाहिए ।

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विजयनगर ,सेक्टर बी
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