सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"

 


सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला" हिन्दी भाषा के सुचिरपरिचित कवि हैं जिनके नाम से हर कोई हिन्दी भाषी परिचित है। आपकी अनेक कविताएँ, जैसे राम की शक्ति पूजा, सरोज स्मृति आदि हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर मानी जाती हैं, किन्तु कुछ कविताएँ ऐसी भी हैं जो सामान्य पाठक के काफी करीब होते हुए अपनी अलग छाप छोड़ती हैं। कृत्या में इसी तरह की कुछ कविताओं को प्रस्तुत किया गया है।



आवाहन

एक बार बस ‌और नाच तू श्यामा!
सामान सभी तैयार,
कितने ही हैं असुर , चाहिए कितने तुझको हार?
कर मेखला मुण्ड मालाओं से, बन मन अभिरामा..
एक बार बस और नाच तू श्यामा!

भैरवी भेरी तेरी झंझा
तभी बजेगी मृत्यु लड़ाएगी जब तुझसे पंजा,
लेगी खड्ग ‌और तू खप्पर,
उसमे रुधिर भरूँगा माँ,
मैं अपनी अंजलि भर भर
उंगली के पौरों में दिन गिनता ही जाऊँ क्या माँ
एक बार बस और नाच तू श्यामा

अट्टहास उल्लास नृत्य का होगा जब आनन्द,
विश्व की इस वीणा के टूटेंगे सब तार
बन्द हो जाएँगे ये सारे कोमल छन्द
सिन्धु राग का होगा तब आलाप
उत्ताल तरंग भंग कह देंगे
मा . मृदंग के सुस्वर क्रिया कलाप,
और देखूँगा देते ताल
कर तल पल्लव दल से निर्जन वन के सभी तमाल,
निर्झर के झर झर स्वर में तू सरिगम मुझे सुना मा
एक बार बस और नाच तू श्यामा!


मुक्ति

तोड़ो, तोड़ो , तोड़ो कारा
पत्थर की निकालो फिर,
गंगा जल धारा!

गृह गृह की पार्वती!
पुनः सत्य सुन्दर शिव को सँवारती
उर उर की बनो आरती !
भ्रान्तों की निश्चल ध्रुवतारा!
तोड़ो तोड़ो तोड़ो कारा!

राजे ने अपनी रखवाली की

राजे ने अपनी रखवाली की,
किला बनाकर रहा,
बड़ी बड़ी फौज रखीं।
चापलूस कितने सामन्त आए।
मतलब की लकड़ी पकड़े हुए।
कितने ब्राह्मण आए
पोथियों में जनता को बाँधे हुए।
कवियों ने उसकी बहादुरी के गीत गाए
लेखको ने लेख लिखे
ऐतिहासिकों ने इतिहास के पन्ने भरे,
नाट्यकलाकारों ने कितने नाटक रचे,
रंगमंच पर खेले।
जनता पर जादू चला
राजे के समाज का
लोक नारियों के लिए रानियाँ आदर्श हुई।
धर्म का बढ़ावा रहा धोखे से भरा हुआ।
लोहा बजा धर्म पर, सभ्यता के नाम पर।
खून की नदी बही?
आँख कान मूँद कर जनता ने डुबकियाँ लीं।
आँख खुली राजे ने अपनी रखवाली की।

बाँधों ना नाव इस ठाँव , बन्धु!

बाँधों ना नाव इस ठाँव , बन्धु!
पूछेगा सारा गाँव बन्धु!

यह घाट वही जिस पर हँस कर ,
वह कभी नहाती थी धँस कर,
आँखे रह जातीं फँस कर,
कँपते थे दोनो पाँव बन्धु!

वह हँसी बहुत कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी सहती थी,
देती थी सबके दाँव, बन्धु!

गर्म पकौड़ी

गर्म पकौड़ी
ए गर्म पकौड़ी!

तेल की भुनी,
नमक मिर्च की मिली,
ए गर्म पकौड़ी!

मेरी जीभ जल गई
सिसकियाँ निकल रहीं,
लार की बून्दे कितनी टपकीं
पर दाढ़ तले तुझे दबा ही रखा मैंने
कंजूस की ज्यौं कौड़ी!

पहले तूने मुझे खींचा
दिल लेकर फिर कपड़े सा फींचा
अरी , तेरे लिए छोड़ी
बह्मन की पकायी
मैंने घी की कचौड़ी!

ध्वनि

अभी ना होगा मेरा अन्त!
अभी अभी ही आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्त
अभी ना होगा मेरा अन्त!

हरे हरे ये पात,
डालियाँ , कलियाँ कोमल गात!

मैं ही अपना स्वप्न मृदुल कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर!

पुष्प पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नव जीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,

द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
हैं मेरे वे जहाँ अनन्त
अभी ना होगा मेरा अन्त!

मेरे जीवन का है जब प्रथम चरण,
इसमें कहाँ मृत्यु
है जीवन ही जीवन!

अभी पड़ा है आगे का यौवन,
स्वर्ण किरण किल्लौलो पर बहता रे यह बालक मन

मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु दिगन्त
अभि ना होगा मेरा अन्त!


 

तेलगु कवि इस्माइल की कविता

अनुभव

मुझसे कहा गया कि
"हमे अपने अनुभव से सीखना चाहिए"
मैंने गढ़े हुओं को खोदा,
और अवशेष बाहर निकाले

ओह! नरम और कड़े
एक नया जन्तु तैयार
पाँच लाख वर्ष पहले खत्म हो चुका था जो

झरना
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मैं‍‍--
कैसे गाते हो तुम हरदम
प्रतिध्वनित होती लय में

झरना--

देखो, मेरी जिन्दगी पत्थरो से भरी है
ना गाऊँ तो कैसे पिघलेंगे वे?

चक्रवात

मैं तो बस घूमर हूँ सूखी पत्ती का प्रेम- तूफान

लेकिन यह तूफान अलग किस्म का है
दूर है पर अलग नहीं
नीचे झुकता है, चिन्ता की रेखाओं की तरह
और लौट आता है पेड़ का हिस्सा बनते हुए

खिड़की

क्या होना चाहिये
भीतर‍ बाहर
यह सब मैं जानती हूँ
लेकिन यहाँ
न भीतर कुछ, न बाहर कुछ
किस लिए

वह

कहा जाता है कि
जब वह छोटी थी,
अपनी प्यारी गुड़िया को आग में झौंक दिया था
देश के लिए
कोई आश्चर्य नहीं कि
बड़े होने पर उसने
देश को ही झौंक दिया आग में
अपने लिए

साइकिल

अपनी कविता की तरह
मुझे मालूम नहीं है, कि
यह मुझे उठा रही है या
मैं इसे

आकाश और सड़क के बीच
पहिए घूमते ‌और फिसलते हैं बीच में
ज्यादा भाग आकाश का
थोड़ा सा जमीन पर

घर पर पहुँचने के बाद
शहरी गुण्डों की फुस्स होती हवा की तरह
उड़ती भाप की तरह
एक पहिया जमीन पर घिसटता
‌और एक तैरता सपने में
रिटायर होता, सोने का मन बनाता
मेरी और मेरी कविता की तरह


खेल

तुम्हे याद हैं वे राते
जो हमने बिताईं थी मैदानों में
गाँव से दूर
लोगों से दूर

क्या वे हम ही थे
जो आसमान के पटरे पर चला करते थे?

क्या तुम्हे याद है
प्रेम के खेल में
चमगादड़ की अपने अंगों को प्रेम दाह में फेलाते
हम ही तो थे जो
तारो को उन्हीं से टकराते रहे
खेल की गोटियों की तरह
सारी सारी रात

कहाँ गईं वे राते प्रिया!
वह हवा जो हमारी लिए बहती थी
आज नहीं बहती
लेकिन खेल चलता रहा एक से दूसरे के पास
बस खिलाड़ी बदले, खेल नहीं

तुम

जब तुम होती हो नग्न
अपने कपड़ों की चिन्ता किए बिना
तुम मेरी होती हो
नहीं तो
इस दुनिया की
किसी दिन मैं इस दुनिया को चीर दूँगा
और पिरों दूँगा धागे में


डा वी कोण्डाल राव के अंग्रेजी अनुवाद का रति सक्सेना द्वारा हिन्दी में रूपान्तर

 

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