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दरअसल वैश्वीकरण की जितनी मार
भाषा पर पड़ी है, उतनी शायद ही और किसी क्षेत्र पर पड़ी हो। खास बात
यह है कि इस मार को महसूस करने और उसके प्रतिकरण करने की क्षमता भी
खत्म सी हो गई लगती है। आज के दौर में भाषा को समकालीन बनाए रखने
के लिए न तो भाषा के प्रति जिद की हद तक संकीर्णता की आवश्यकता है
और न ही अनुदिन मानसिकता की। आवश्यकता है तो सिर्फ इस बात की हम
अपनी भाषा और अपने साहित्य के प्रति किस तरह अपनी युवा पीढ़ी के साथ
अन्य भाषा भाषियों वालों को भी आकर्षित कर सकते हैं। या फिर कि
आत्मसुखाय को जन हिताय में किस तरह से बदल सकते हैं। यहाँ पर
व्यापारिकरण वाली मानसिकता तो नहीं, बल्कि उसी से सम्बद्ध कौशल की
आवश्यकता है। ऐसा कौशल जो भाषा के प्रति आकर्षण जागृत कर सके।
रति सक्सेना
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आम तौर पर
आम आदमी
गैर होता है
इसलिए हमारे लिए जो
गैर नहीं
वह हमारे लिए
मामूली भी नहीं होता
कुँवर नारायण
यह जो लोग मेरे आस पास है
इनके हाथों में जो "कुछ नहीं " है वह
किसी अफवाह से चाकू
किसी अफवाह से पत्थर
किसी अफवाह से " फूलों की भीगी शाखा" बन जाता है
सुरजीत पातर
मैंने कहा
कहाँ से चलना शुरु करूँ
कि सफल हो जाऊँ
पहुँच जाऊँ अभीष्ट तक
दफैरुन
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जिसे
मार्क्सवाद कहा गया , उसके सारे लक्षण उनकी कविता में मौजूद रहे।
यूरोप की इन तमाम कविताओं का उद्देश्य था थार सत्ता में साझेदारी।
टाम्स द क्विंसी ने लिखा था " एक साहित्य ज्ञान का होता है दूसरा
शक्ति का। पहले का उद्देश्य शिक्षा देना होता है, दूसरे का चलाना।
पहला पतवार होता है, दूसरा पाल, डाड़ और लग्गा। पहला एक सरल समझ
पैदा करता है, दूसरा गहरी समझ और विवेक, लेकिन हमेशा ही सुख और
सहानुभूति के माध्यम से।" आधुनिक यूरोप में जो कुछ भी लिखा गया है,
चाहे वह संवेगों को उभार कर हो या सोच को धक्का देकर , सत्ता में
हिस्सेदारी के लिए लिखा गया। पार्टी के कार्यकर्ता मार्क्सवादियों
ने तो साहित्य को सत्ता में आने का एक साधन माना ही। जो कार्यकर्ता
नहीं थे और जो साहित्य को साधन नहीं साध्य मानते थे, उन्होंने भी
इसका उपयोग इसी के लिए किया। और कुछ नहीं कर पाए तो जो सत्ता में
थे उनका विरोध किया।
श्रीप्रकाश
मिश्र ....और »
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बाँधों ना नाव इस ठाँव , बन्धु!
पूछेगा सारा गाँव बन्धु!
यह घाट वही जिस पर हँस कर ,
वह कभी नहाती थी धँस कर,
आँखे रह जातीं फँस कर,
कँपते थे दोनो पाँव बन्धु!
वह हँसी बहुत कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी सहती थी,
देती थी सबके दाँव, बन्धु!
"निराला"
खिड़की
क्या होना चाहिये
भीतर बाहर
यह सब मैं जानती हूँ
लेकिन यहाँ
न भीतर कुछ, न बाहर कुछ
किस लिए
तेलगु कवि इस्माइल
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प्रेम संगीत
धर्म एक ही , जो कि जगत का
प्राणभूत है प्रेम, निराला,
वही न पूर्णेन्दु, सभी हम को
पय पीयूष पिलाने वाला?
है परमेश्वर चैतन्य वही
जो भक्ति दया अनुराग आदि,
कई ढंग के रूप ग्रहण कर
सरंव जगत को प्रकाश देता।
उसी पंथ का परिपंथी जो
नास्तिकता है , विद्वेष वही,
हा! उस तम में लोक पड़े तो
फल होता मृत्यु अकालिक ही।
उल्लूर
एस परमेश्वरय्यर
अनुवादक-कवियूर
शिवराम अय्यर
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