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मेरी
बात
जिस तेजी से जीवन के अनेक क्षेत्र में परिवर्तन हो रहा है उसी तेजी
से भाषा में भी परिवर्तन हो रहा है, फर्क बस इतना है कि भाषा में
आए परिवर्तनों की तेजी को हम अनुभूत नहीं कर पा रहे हैं, जिसका
परिणाम भाषा ही नहीं हमारी देशीय अस्मिता के हित में भी नहीं है।
इस परिवर्तन का एक मनोरंजन उदाहरण है "रामचरित मानस" जिसकी रचना का
उद्देश्य जनसामान्य की भाषा मे प्राचीन कथा का पुनः कथन था, यही
कथा जो एक वक्त जन सामान्य की भाषा में रची गई थी , वर्तमान पीढ़ी
के लिए इतनी अनबूझ बनती जा रही है कि उसे खड़ी बोली या अंग्रेजी में
अनुदित करने की आवश्यकता पड़ रही है। दरअसल वैश्वीकरण की जितनी मार
भाषा पर पड़ी है, उतनी शायद ही और किसी क्षेत्र पर पड़ी हो। खास बात
यह है कि इस मार को महसूस करने और उसके प्रतिकरण करने की क्षमता भी
खत्म सी हो गई लगती है। आज के दौर में भाषा को समकालीन बनाए रखने
के लिए न तो भाषा के प्रति जिद की हद तक संकीर्णता की आवश्यकता है
और न ही अनुदिन मानसिकता की। आवश्यकता है तो सिर्फ इस बात की हम
अपनी भाषा और अपने साहित्य के प्रति किस तरह अपनी युवा पीढ़ी के साथ
अन्य भाषा भाषियों वालों को भी आकर्षित कर सकते हैं। या फिर कि
आत्मसुखाय को जन हिताय में किस तरह से बदल सकते हैं। यहाँ पर
व्यापारिकरण वाली मानसिकता तो नहीं, बल्कि उसी से सम्बद्ध कौशल की
आवश्यकता है। ऐसा कौशल जो भाषा के प्रति आकर्षण जागृत कर सके। मुझे
लगता है कि भारतीय फिल्में इस क्षेत्र में जितनी तीव्रता से काम कर
रही हैं, भारतीय भाषाएँ और साहित्य उतनी ही सुस्ती दिखा रहा है।
यदि अडूर गोपलकृष्णनन की फिल्मे या फिर आशुतोष गोवारेकर की किल्म
"लगान" विश्व पटल पर अपनी पहचान बना सकती हैं तो भारतीय भाषाएँ और
उनका साहित्य असंपृक्त कैसे और क्यों रहता है? हम यह कह सकते है
दोनों की प्रस्तुति में अन्तर है। हम बात यहीं से शुरु करते है कि
यदि साहित्य को भी फिल्म के समान चक्षु, श्रवण से जोड़ा जाए तो भाषा
और साहित्य वर्तमान समय में अधिक सहज हो सकता हो। और इसका एक मात्र
जवाब वेब या इन्टरनेट है। यही भाषा का एक मजबूत आधार बन सकता है,
और बन रहा है।

मैं इस सन्दर्भ में विश्व की अन्य भाषा का उदाहरण देते हुए अपनी
बात स्पष्ट करना चाहती हूँ, हम जानते हैं कि चीनी भाषा विश्व की
जटिलतम भाषा मानी जाती है, किन्तु जिस तरह से यह भाषा वेब की
दुनिया में छा रही है और साहित्य में अपनी पहचान बना रही है, लगता
है कि वह समय दूर नहीं कि चीनी भाषा और साहित्य व्यापार की तरह
दुनिया के बाजार में कब्जा जमा ले। आज चीनी भाषा विश्व की प्रमुखतम
भाषाओं में स्थान बना चुकी है और जितनी तेजी से वह अपनी जगह बना
रही है , वह दिन दूर नहीं जब चीनी भाषा सीखना अंग्रेजी के समान
आवश्यक बन जाए।
वर्तमान समय में भाषा का जो नया आधार, वेब या नेट का स्थापित हुआ
है, यह गति और प्रतिक्रिया दोनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहाँ
सबसे बड़ी सुविधा है लक्ष्य की तीव्रता। यहाँ जितनी तीव्रता से सोचा
जाता है, उतनी तीव्रता से पाठक के पास पहुँचा जा सकता है। यही नहीं
प्रतिक्रिया भी बड़ी तीव्रता से मिल जाती है। यह प्रिन्ट मीडिया की
अपेक्षा अधिक व्यक्तिगत है किन्तु उतना ही सार्वजनिक भी है। यहाँ
पर ध्वनि , श्रवण , और चक्षु का सामंजस्य भी संभव है। यानी कि
लिखने पढ़ने के साथ सुनना और देखना भी संभव है जिससे रोचकता की
संभावना बढ़ती है। यहाँ अतः आज के सन्दर्भ मे नेट या वेब का प्रयोग
बेहद जरूरी हो गया है। इसलिए आवश्यक यह है कि आज के दौर में भारतीय
भाषाओं को इन्टरनेट का आधार दिया जाए जिसमें भारतीय परिवेश और
समस्याओं को ध्यान में रख कर कुछ काम किया जाए। इस दृष्टि से
कृत्या परिवार कुछ ठोस कार्य करना चाहता है। इस काम की रूपरेखा
शीघ्र ही तैयार कर ली जाएगी और आशा है कि वेब दुनिया से जुड़े सुधी
पाठकों और तकनीकि वैज्ञानिकों का सहयोग मिलेगा।

कृत्या शीघ्र ही अपनी सालगिरह मनाएगी , ऐसा हम लोगों का विचार है।
दसवाँ अंक आपके हाथ में है, इस बात की खुशी है कि धीरे धीरे हिन्दी
वर्ग का सहयोग मिलता जा रहा है। इस अंक से हमारे परिवार में एक नए
सदस्य जुड़े हैंः केलांग के अजेय, जो आरंभ से कृत्या के साथ हैं।
कृत्या परिवार में उनका स्वागत है। इस अंक में अजेय के व्यक्तित्व
का एक और रूप दिखाई देता है, वह है उनकी रेखांकन कला। मुझे पूरा
विश्वास है कि इससे कृत्या के रूप में निखार अवश्य आया है। इस बार
हमें दो विदेशी कलाकारों के चित्र मिले हैं जिनका कृत्या ने खुले
दिल से स्वागत किया है। ये कलाकार हैंः N Marion Hage और Bonni
Reid,। निश्चित ही कृत्या के पाठक इन कलाकृतियों को सराहेंगे।
इस अंक में प्रिय कवि के रूप में निराला जी को स्मरण किया गया है,
खासतौर से जो छोटी और मधुर हैं। इसी के साथ तेलुगु के इस्माइल की
कविताओं को भी लिया गया है जिससे भाषा के पार की कविताओं को समझा
जाए।
इस अंक से श्री प्रकाश मिश्र जी का यूरोप की कविता पर लम्बा आलेख
समाप्त हो रहा है, आशा है पाठकों को भारतीय कविता के साथ विदेशी
कविताओं का इतिहास एक स्वस्थ दृष्टिकोण देगा।

अग्रज कवियों के रूप में हम उल्लूर एस परमेश्वरय्यर को पढ़ेंगे,
जिनकी कविताओं का अनुवाद, अग्रज कवि , शिक्षक, व अनुवादक कवियूर
शिवराम अय्यर ने किया है। हमारा उद्देश्य भारतीय भाषाओं के समग्र
साहित्य के प्रति रुचि जाग्रत करना है।
इस अंक में समकालीन कवियों के रूप में कुंवर नारायण तथा सुरजीत
पातर से लेकर दफैरुन तक हैं, मुझे विश्वास है कि पाठकों को कविता
का व्यापक फलक मिलेगा।
आशा है कृत्या के पाठकों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती जाएगी, और
कृत्या अपने में एक संस्था के रूप मे स्थापत होगी
सविनय
रति सक्सेना
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