कुँवर नारायण की कविताएँ

कोई मामूली आदमी नहीं होता

अक्सर मेरा सामना हो जाता है
इस आम सच्चाई से

कि कोई आदमी आम नहीं होता
कि कोई आदमी गैरमामूली नहीं होता

आम तौर पर
आम आदमी
गैर होता है
इसलिए हमारे लिए जो
गैर नहीं
वह हमारे लिए
मामूली भी नहीं होता

मामूली न होने की कोशिश
दरअसल किसी के प्रति भी
गैर न होने की कोशिश है

कुँवर नारायण की अन्य कविताएँ‍ )


सुरजीत पातर की कविता

मैं जहाँ खड़ा हूँ

मैं जहाँ खड़ा हूँ
यह मेरी धरती है
बार बार खुद को यकीन दिलाता हूँ

यह जो लोग मेरे आस पास है
इनके हाथों में जो "कुछ नहीं " है वह
किसी अफवाह से चाकू
किसी अफवाह से पत्थर
किसी अफवाह से " फूलों की भीगी शाखा" बन जाता है

यह जो मैं कह रहा हूँ
यह न जाने धूप है या जल या पवन या आरी के दंदे हैं

मेरे शब्दों की सब विश्वनीयता
खत्म हो गई

मेरे हर वाक्य की साँकल में
एक कमजोर " शायद" की कड़ी है
किसी पल भी मेरे वाक्यों की साँकल टूट सकती
बिखर सकती है

यह सच है
मैँ इस धरती से उगा हूँ
लेकिन यह भी सच है कि
खौफ दरख्तों की जड़ों तक को
तीखे पैर बना देते हैं

वृक्ष भी तेज दौड़ते रातों ही रात
एक दूसरे को काटते, कुचलते,फुंकारते हुए
मान भी ले कि वृक्षों को
कभी पैर नहीं उगते
लेकिन वृक्ष को कहाँ मालूम
कल उसके पास से एक रेखा
चुपचाप गुजर जाएगी

और तब फैसला होगा
कि वृक्ष को चीरा जाए
गर उसे चीरा जाना है
तो उसका क्या बनाना है

वृक्षों के ये घने जंगल यह बेचारे क्या जानें

कभी वृक्षों की राय लेकर
तो चलते नहीं आरे


( सुरजीत पातर की अन्य कविताएँ )


सुधीर सक्सेना की कविताएँ

अभी भी लाल है पूरब

यकीनन
बेतरह खुश हैं वे
मगर, थोड़े से उदास,
थोड़े से नाखुश,
थोड़े से हताश

कि अभी भी लाल है पूरब
अभी भी लाल है सूरज का मुखड़ा,
अभी भी लाल है मनुष्य की देह में बहता रक्त ।

और तो और
बेतरह लाल है
अभी अभी जनमे बच्चे का चेहरा ।


( सुधीर सक्सेना की अन्य कविताएँ.. )


दफैरुन की कविताएँ

चलने का गीत

मैंने कहा
कहाँ से चलना शुरु करूँ
कि सफल हो जाऊँ
पहुँच जाऊँ अभीष्ट तक

उसने कहा
तो फिर स्मरण करो
कि संसार के सफलतम मनुष्यों ने
कहाँ से चलना शुरु किया था
तुम वहीं से चलना शुरु करो

मैंने कहा ठीक है
और मैंने स्मरण शूरु किया
पुश्किन ने रूस से चलना शुरु किया था
जिब्रान ने लेबनान से
........................
.......................
मैं जैसे जैसे स्मरण कर रहा था
भरता जा रहा था आश्चर्य से,
आश्चर्य से महासमुद्र में गोते लगाते हुए मैंने कहा.
फिर तुम भी ऐसा क्यों नहीं करते
कि जहाँ खड़े हो वहीं से चलना शुरू करो


(  दफैरुन की अन्य कविताएँ )


सुरेश कुमार विद्यार्थी का गीत


बुआ क्या तुम्हें याद है?


महज एक वारिस के लिए/
जो तुम नहीं हो सकती थीं
विलखती माँ
तड़पता पिता
आए दिन मनौतियाँ तीर्थ, व्रत , टाणा-माणा,
देखती रही तुम
अचंभित
नंगे पैर " चप्पा-चूहा"
छतों पर डरंग् खेलती
कतर की फरमाइशें
पिता की डपट
और नाराज होकर घंटों छिपे रहना कोठरी में?
राजा भैया के जन्म पर
खाए थे देसी घी के पकवान
और न जाने कब
तुम्हारी पीठ पर
वही राजा भैया
याद है तुम्हे?
हो गई घर बदर
एक बोतल के साथ कर दी गईं विदा
दो दाने मूँगा के पहन कर खुद काच बन गई
किस्मत का लेखा जान सब स्वीकार कर गई
खेत सींच कर मटर तोड़ती
घास काट कर आलू खोदती
तकलियों के साथ घिसती रही उंगलियाँ
ता उम्र तुमसे लिपटी रहीं थिगड़ियाँ।
सब कुछ याद है तुम्हे
बुआ
सब कुछ तो पता है!
फिर भी
फटी हथेलियों से बासन माँजती हो
एक अदद घुंडु की लालव में
फटे हुए "पूलों के साथ
घोप ढ़ोती हो अपनी पीठ पर
क्या अब तक?
अभी कहाँ तक और कब तक?
 

(यह बहुचर्चित कविता मूल पट्टनी बोली में लिखी गई है जिसे स्वयं कवि ने अजेय की मदद हिन्दी में रूपान्तरित किया)

डरंग्- पचेंटे या पाँच पत्थर के टुकड़ों से खेला जाने वाला खेल।
कतर--
लाहुली महिलाओं की पोशाक।

काच--काच से बने सस्ते मनके।
घुंटु--
चुनरी।पूलों-- जो की घास से बने देसी जूते।
घोप--
मैला

(सुरेश कुमार विद्यार्थी अन्य कविताएँ )


राहुल झा की कविताएँ

मैं छूना चाहता हूँ

 

मैं छूना चाहता हूँ
हवा के पहाड़ पर चढ़ते हुए
उस फूल को
जिसकी पंखुड़ियों के
रंगीन सागर में
तुम्हारी दुनिया का सूरज ढलता है
जिसकी खुशबू के
मदमाते भिनसारे में
तुम्हारी दुनिया का सूरज उगता है
मैं छूना चाहता हूँ उस फूल को
जिसे छूते ही
गमगमा उठूँ.....
नाभि से ब्रह्माण्ड तक‍‍...........!


(
राहुल झा की अन्य कविताएँ )


ईशिता की कविताएँ

शिमला

बादलों वाली दोपहर
जिसमें
सुबह होने का भान हो,
ठण्डी हवाओं के आगोश में...
धीरे- धीरे,  सरकता शहर!
बचपन से यौवन
और
यौवन से अब तक
बहुत कम बदला हुआ !

..... गुजरे दिनों के अहसास
सपनों के से लौट आते...

पर अब वे कुलबुलाते नहीं
उन दिनों से, बल्कि
कर जाते हैं मायूस,

अपना होने का ख्याल ही शायद
खो गया है इस शहर में
बदले चेहरों ‌और
बदली रवायात के बीच


( ईशिता की अन्य कविताएँ )  


विनोद दास की कविताएँ

जूते काट रहे हैं

मुझे शहर जाना है
और जूते काट रहे हैं

मैं जूते उतारना चाहता हूँ

लेकिन मैं डरता हूँ
कहीं मेरी देशज संवेदनाएँ
शहर में आहत ना हो जाएँ

मैं शहर से डरता हूँ
जहाँ जूता एक विचार है

जहाँ जूतों की चमक में
गायब हो जाता है
एक साबुत आदमी
उदार व्यवस्था के बावजूद

जहाँ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ
हमारी आँत में छिपे कीड़ों की तरह रहती हैं
और सिर्फ अपने ट्रेडमार्क से
स्वदेशी जूतों को
हमें महँगे दाम में बेचती हैं

मुझे शहर जाना है
और जूते काट रहे हैं
बुरी खबर की तरह।

इसी विषय पर कृत्या के पहले अंक मे एक कविता छपी थी , रति सक्सेना की‍
एक ऋचा चप्पलों के लिए )


(
विनोद दास की अन्य कविताएँ )

 


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