शीकी

मासाओका शीकी का जन्म जापानी इतिहास की नई सदी के उदय के साथ हुआ। यह दौर तकनीकी , शिक्षा आदि के साथ साथ कला ‌और साहित्य में भी नवीन सोच का समय था। शीकी का जापानी साहित्य , विशेषतया हाइकु के नवीनीकरण में बहुत बड़ा हाथ रहा। आपने न केवल हाइकु की शैली अपितु विषय वस्तु में भी परिवर्तन का प्रस्ताव रखा। शीकी ने प्रस्ताव रखा कि हाइकु में उन वस्तुओं का वर्णन किया जाए जो प्रतिदिन जीवन में दिखाई देती हैं या प्रकृति से संबन्धित होती हैं। इसके अतिरिक्त दूसरे देशों में बोले जाने वाले शब्द जैसे आईसक्रीम , खिड़की के शीशे , बेसबाल आदि भी सम्मिलित किए जा सकते हैं। शीकी ने न केवल हाइकु की रचना की बल्कि हाइकु के शिल्प विधान पर वाद विवाद भी चलाया, जिससे आज यह विधा विश्व में अपनी अलग पहचान बना चुकी है। कृत्या के लिए शीकी के हाइकु को उपलब्ध करवाया है डा. अजली देवधर ने, जिनकी अनुदित पुस्तक विशेष रूप से आकर्षित कर रही है।

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सफेद बिल्ली छत के छज्जे पर
केवल उसकी आवाज

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एक व्यक्ति पढ़ रहा
लेटा हुआ
वसन्त की घास

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उष्ण वर्षा
गिर रही
सूखी घास पात पर

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वसन्त की हवा
वह हरा खेत
मुझे लुभा रहे पकड़ा पकड़ी खेलने के लिए

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तरुण मीठी मछली
दो तरफ जुदा हो गईं
प्रवाह के प्रतिकूल जाते हुए

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पतझड़ की हवा
मेरी यात्रा की सोटी
घिस कर छोटी हो गई

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एक यात्री चल पड़ा
माला पर उंगली फैराता हुआ
शरद के पहले छींटे

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पिछला फाटक खोल
बतखों को बुला रही है
शरद की पहली वर्षा

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शरद की पहली वर्षा
नन्ही चिड़िया उड़ रही पर्वतों के ऊपर
कितने सैंकड़ों में

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मेरे हिस्से में बस यही
जैसे भाग्य वाला कागज कहता है
पतझड़ की हवा

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आलूचे के फूल
बस एक टहनी दिखा दे
इस अपंग को

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मनोरंजन की जगह
केवल दस कदम दूर
पतझड़ की हवा

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पीठ के बल लेटी
बड़ी बड़ी बाते बनाती
आकाश गंगा

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पीठ के बल लेटी
भोली बन रही
आकाश गंगा

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पीठ के बल लेटी
कविता दुहरा रही
आकाश गंगा

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काटती बर्फीली हवा
मेरी ओर आ रही
लहर उमड़ती है

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नानी माँ
मनहर कथाएँ कात रहीं
चूल्हे के पास

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गुजरता वर्ष
माँ स्वस्थ हैं
मैं नहीं

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अब कितना रहता है
मेरा जीवन
यह रातेँ छोटीं हैं

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पियोना की पंखुड़ियाँ गिर रहीँ
यह सुनसानी
मेरी बीमारी के कमरे की

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सर्दी के धूप
काँच में से बिखेरती हुई
मेरी बीमारी का कमरा

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अपनी माँ के साथ
अपनी छोटी बहन का इंतजार
ठंडी पतझड़ी रात

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