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शब्दों को उसी तरह से साधना चाहिए जिस तरह से घोड़े को। उन्हे अपनी
मर्जी पर उठाना बैठाना और चलाना चाहिए, उन्ही अपनी शर्तों पर सरपट
दौड़ने देना चाहिए। तब ये शब्द कभी बादल बन जाएँगे तो कभी धुपीला
आसमान, कभी फूल बन जाएँगे तो कभी चुभते काँटे, कभी कैंचुएँ बन
मिट्टी खोद डालेंगे तो कभी चूहे जैसे बिल बना लेंगे।
शब्दों को साधना कब शब्द साधना बन गई, यह तभी मालूम पड़ा जब वे
कविता कहलाने लगे...कृत्या में जो कुछ है वह मेरी और मेरे जैसे न
जाने कितनों की शब्द साधना ही तो है। शब्द साधना का परिणाम इतना
जरूर है कि कृत्या इतने महीनों से बिना किसी संसाधन या सहायता के
चलती चली जा रही है, और दूर दूर से ना जाने कितने कलाकार मन इससे
जुड़ते जा रहे हैं।
रति सक्सेना
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मैं........
काले पीले कागज की जमीन पर
लिखना चाहती हूँ
धूप खुशबू और बारीश की कविता...........
पर लिख नहीं पाती.......... स्मिता
झा
माँ
तुमने ही बताया था, शायद
वो पपा की साईकिल
और
तुम्हारी अंगीठी
बेच दी कल
कबाङी वाले को
कबाङ के दाम
ये वही साईकिल थी ना
जिसपर बैठकर
पपा रोज़
आफिस जाया
करते थे
संगीता मनराल
अच्छा ?
और उनके सपनों में झाँको
क्या वे ही परियाँ है?
हाँ पापा ,
वैसा ही राजकुमार!
अजेय
तुमने ढहाया तो क्या ढहाया
मिट्टी की बनी चंद ईंटे
और गदवंजे पर रखे
वो पानी से भरे मटके...
तुमने मिटा डाली
बुजुर्गों की निशानी
कश्मीरियत की कहानी
आदर्श अजीत
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प्रत्येक गीत बीते युग के
सन्दर्भ में अपने समय का नवगीत होता है और प्रत्येक नवगीत आने वाले
कल की पृष्ठभूमि मे अपने जमाने का गीत होता है। ये नव, नूतन या
अभिनव उपसर्ग तो पीढ़ियों के अन्तर को उनमें छिपे अस्तित्व के
संघर्ष को बताते हैं। इनका देशकाल से सम्बन्ध है, शाश्वती का इनसे
क्या लेना देना? फूलों की माला में छिपे धागे की तरह एक ही प्यास
पूरे गीति तत्व को स्भाले हुए है और वह है ऋतुमती प्यास! प्यास जो
ऋतुमती है, ऋतुमती जो प्यासी है अर्थात गीतकार और संगीतकार के बीच
किसी नवगीत के सृजन की अतृप्त उत्सुकता , उर्वर जिज्ञासा , नए
मुहावरे की तलाश , पुराने को छोड़ कर नए शिल्प को ग्रहण करने की
आनन्ददायक उत्तेजना , एक चुनौती , किसी टूटन को ... शब्द से सी
देने की एक लयात्मक ललक, सूई धागे की तरह एक दूसरे में होने न होने
के बीच की अनुभूति , ............
डा किशोर काबरा
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सफेद बिल्ली छत के छज्जे पर
केवल उसकी आवाज
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एक व्यक्ति पढ़ रहा
लेटा हुआ
वसन्त की घास
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उष्ण वर्षा
गिर रही
सूखी घास पात पर
***
वसन्त की हवा
वह हरा खेत
मुझे लुभा रहे पकड़ा पकड़ी खेलने के लिए
***
तरुण मीठी मछली
दो तरफ जुदा हो गईं
प्रवाह के प्रतिकूल जाते हुए
***
पतझड़ की हवा
मेरी यात्रा की सोटी
घिस कर छोटी हो गई
गुजरता वर्ष
माँ स्वस्थ हैं
मैं नहीं
शीकी
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*मुझे नहीं लज्जा
यायावर हूँ
दिन बीते बहुत
भूल गया जन्म भूमि
गुरुचरणों में रहते हुए
बहुत दिन हुए
भूल बैठा सगे सम्बन्धी
चला हूँ बुद्ध मार्ग
कुटियाओं और कंदराओं में रहते हुए
भुला बैठा भौतिक आकर्षण
...................
देखता हूँ क्रीडा
जंगली वानरों की
भूल गया पालतू पशु
याद है मुझे बस"सोख्ता दान"
क्यों याद रखूँ
घरेलू साजो सामान?
मेरे लम्बे एकान्त वास में
न कोई नौकर चाकर
न कोई मालिक
याद नहीं शिष्टाचार भी
लज्जा भूल गया
फकीरी की बेपरवाही में
चीजे मेरे मन में आती हैं
सहज भाव से
कैसे छिपाऊँ
उनका बेरोक टोक आना?
क्या जरूरत कपड़ों की
कि तप रही है काया
तुमों की उष्णा से
सुलझ गई है
द्वैत की गुत्थी
क्या प्रयोजन तुम्हारे
सांसारिक नियमों का?
सहज वृत्ति ही बोधि है
मेरे लिए अब!
मिला रेपा
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