|
साधौ , शब्द साधना कीजै.......

शब्दों से मेरी दोस्ती उतनी ही पुरानी है जितनी कि मेरी याददाश्त,
बचपन के उन पलों में जब मैंने अपने को बेहद अकेला पाया ,
मेरी
मुट्ठी में कुछ शब्द हमेशा फड़फड़ाते। मुट्ठी खोलते ही वे जुगनु की
तरह आसमान में फड़फड़ाते चले जाते। मैं उन्हें दूर जाते देखती फिर
दुखी होती कि मैँने मुट्ठी खोली ही क्यों, फिर सोचती कि यदि मुट्ठी
नहीं खोली होती तो जुगुनुओं की चमक से जो वंचित रह जाती। मुझे आजतक
भी पता नहीं चला है कि मैं शब्द देखती थी या चित्र? कहते हैं कि हम
शब्दों को चित्र के रूप में देखते हैं, लेकिन चित्र तो मन में
अंकित छवि के आधार पर ही बना करते होंगे ना! मेरा मन तो ना जाने कब
से अनजानी आकृतियों से दोस्ती कर बैठा है। मैंने हमेशा ही शब्दों
को रंगीन देखा है, उनके श्यामल गात में भी कोई रंग होता था..
गर्मियों की छुट्टी मे
साँझ को छिड़काव से तर आँगन में सफेद झक चादर से ढके पलंग पर आ
बैठती तो ना जाने कहाँ से एक बेहद काला अकेलापन मुझे घेर लेता।
उसके पंजे मेरे सीने पर कसने लगते। मेरी साँस रुकने रुकने को हो
जाती। तभी ढेर सारे शब्द आकार मुझे उस घुटन से निजाद दिलाते। वे
बाजीगर की गेन्द की तरह उछलकूद मचाने लगते । उन्हीं दिनो मुझे
मालूम पड़ा कि शब्दों में रंग होते हैं, उनके पर होते हैं, वे हमे
अपनी पीठ पर बैठा कर कहीं भी ले जा सकते हैं, जरूरत बस इस बात की
है कि हम उन्हें साधना सीख जाएँ। लेकिन बड़े गिरगिट होते हैं वे,
जैसा मन, वैसा ही उनका रंग, मन खुश हो तो क्या कहना, कितने कितने
रंग, इन्द्रधनुष के सातों सवार शरमा जाए, मन दुखी तो कितना श्यामल
तन, कभी कफन की तरह सफेद, तो कभी अमावस की रात की तरह स्याह। उन
दिनों मेरी आँखे शब्दों पर इस कदर चिपक जाती थी जैसे कि चीनी पर
चींटी। झाड़ू लगाते वक्त भी कोई कागज का टुकड़ा हाथ में आता तो कचरा
चाहे उड़ कर वापिस ठिकाने पर चला जाए, आँखे शब्दों से दोस्ती किए
बिना हिलती नहीं। फि कुछ ऐसा हुआ कि शब्द मेरे मुँह से निकल कर फर
फर उड़ते रहे। मैं दंतमंजन का विज्ञापन करने वाले चलते फिरते फेरी
वाले की तरह शब्दों से लोगों को रिझाने तो कभी रुठाने लगी।

एक वक्त ऐसा आया कि शब्द मेरे पास बारात सजा कर आते,
और बिन दुल्हन
के लौट जाते। मैं ऐसी दुनियाँ में प्रवेश कर चुकी थी जहाँ शब्दों
को मरी तितलियों की तरह कपड़ों पर, चादरों पर, साड़ियों पर चिपका
दिया जाता। जहाँ शब्द औरत की कमजोरी माना जाता, जहाँ एक- एक शब्द को
गुब्बारे जैसे फुलाया जाता फिर बेरहमी से फोड़ दिया जाता। मैं कोशिश
करती कि शब्द मेरे मुँह में जम जाएँ, लेकिन जरा सी आँच मिली नहीं
कि वे पिघल- पिघल कर बहने लगते। मैं उन्हें धोती पौछती थक जाती। न
जाने कैसे शब्द मेरे दुश्मन बन गए। बेताल की तरह मुझ पर हावी रहने
लगे। मैं अपने ही शब्दों के कटघरे में कैद रहने लगी। उन्हे जब मौका
मिलता वे मुझ पर वार करते, रात को नीन्द में भी चैन नहीं, इतनी उधम
मचती दीमाग में कि कहा नहीं जा सकता।
तब मुझे लगा कि शब्दों को उसी तरह से साधना चाहिए जिस तरह से घोड़े
को। उन्हे अपनी मर्जी पर उठाना बैठाना और चलाना चाहिए, उन्ही अपनी
शर्तों पर सरपट दौड़ने देना चाहिए। तब ये शब्द कभी बादल बन जाएँगे
तो कभी धुपीला आसमान, कभी फूल बन जाएँगे तो कभी चुभते काँटे, कभी
कैंचुएँ बन मिट्टी खोद डालेंगे तो कभी चूहे जैसे बिल बना लेंगे।

शब्दों को साधना कब शब्द साधना बन गई, यह तभी मालूम पड़ा जब वे
कविता कहलाने लगे...कृत्या में जो कुछ है वह मेरी और मेरे जैसे न
जाने कितनों की शब्द साधना ही तो है। शब्द साधना का परिणाम इतना
जरूर है कि कृत्या इतने महीनों से बिना किसी संसाधन या सहायता के
चलती चली जा रही है, और दूर- दूर से ना जाने कितने कलाकार मन इससे
जुड़ते जा रहे हैं। अनेक जाने अनजाने लेखकों का साथ मिल रहा है।
स्थिति यह है कि हर महीने की 20 तारीख तक मैं सोचती हूँ कि इस बार
कृत्या कैसे निकलेगी, कहाँ से सामग्री आएगी
। लेकिन एक बार टाइपिंग शुरु करती हूँ कि सारे
विभाग अपने-आप अपने सामान का बन्दोबस्त कर लेते हैं। इस बार हमे
मशहूर कलाकार रीवा स्वीट राकेट की कलाकृतियाँ मिली हैं, रींवा
प्रतिभाशील युवा कलाकाल हैं जिन्होने 3 वर्ष की आयु से ही चित्र
बनाना आरंभ कर दिया था। आपकी कला की प्रवीणता और नयापन कृत्या के
पाठकों को अवश्य पसन्द आएँगे। हमे युवा चित्रकार सुरेश विद्यार्थी
के पैंसिल बने चित्र मिले थे, नेट की अपनी सीमाएँ होती हैं जिनके
चलते हम सुरेश के चित्रों का असली रूप नहीं सँवार पाए हैं, किन्तु
फिर भी विश्वास है कि सुरेश के श्याम श्वेत चित्रों का पाठक आनन्द
अवश्य लेंगे।
इस बार कवि अग्रज के रूप में हम बौद्ध भिक्षु मिला रेपा की अद्भुत
कविताओं का आनन्द लेंगे जिन्हें अजेय ने बड़ी मेहनत के साथ तैयार कर
के केलाँग से भेजा है, ये कविताएँ अगले अंक में भी आएँगी।
समकालीन कविता में कुछ नए चेहरे सामने आए हैं उनकी कविता की ताजगी
पाठकों को अवश्य प्रभावित करेगी। कविता के बारे में विभाग में
हम यूरोपीय
कविता को पुनः प्रकाशित करते हुए विद्वान किशोर काबरा के गीत पर
लिखे लेख को प्रस्तुत कर रहे है। संपादक की पसंद के रूप में जापानी
कवि शीकी के खूबसूरत हाइकू को प्रस्तुत किया जा रहा है।
मित्रों , कृत्या एक वर्ष पूरा करने की स्थिति में आ जरूर गई है
किन्तु आप लोगों से और सहयोग की आवश्यकता महसूस करती है। आशा है आप
सबके सहयोग से यह साहित्यिक सोमयाग अखण्ड ज्वलित रहेगा।
शुभकामनाओं सहित
रति सक्सेना
|