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संगीता मनराल की कविताये...
सुनहरे अध्याय
वर्तमान की दौङ में
अतीत के कई
सुनहरे अध्याय
कोसों लम्बी दूरीयों में
तबदील होकर
पीछे छूट गये
अध्याय - ०१
याद
आ रहा है आज
वो बरगद का पेङ
और
उसकी छाँव में
कच्ची मिट्टी से बना
छोटा मंदिर
जो हमेशा
बरसात में
काई से जडा
कोनों से
हरा हो जाता था
माँ-पपा की डाँट
की शिकायत करने
मै अक्सर
वहीं जाती थी
याद है मुझे
माँ उन महीनों में
आने वाले हर व्रत
के दिन
भगवान के साथ
उस बरगद को भी
पूजती थी
और
उस बरगद का तना
लाल पीले धागों से लिपटा
बहुत सुन्दर लगता था
अध्याय - ०२
माँ
तुमने ही बताया था, शायद
वो पपा की साईकिल
और
तुम्हारी अंगीठी
बेच दी कल
कबाङी वाले को
कबाङ के दाम
ये वही साईकिल थी ना
जिसपर बैठकर
पपा रोज़
आफिस जाया
करते थे
और तुम
उन्हें पुराने
अखबार के टुकङे में
रोटी बाँध कर
दिया करतीं थीं
और याद है
एक बार
ज़िद्द कर में
उसके पीछली
सीट पर
बैठ गई थी
और पहिये में आकर
मेरा दुप्ट्टा फट गया था
बहुत डाँटा था
पपा ने उस दिन
अध्याय - ०३
और वो अंगीठी
जिस पर रखे
कोयलों को
फूँकते - फूँकते
तुम्हारी आँखें
आँसूओं से भरकर
लाल हो जाया करती थीं
तुम
हर शाम
घर के बाहार बने
आँगन में उसे
जलाती
और वही
समय होता जब
हम सब बच्चे
मिलकर
ऊँच-नीच का पपङा
खेलते
( संगीता
मनराल की कविताये...)
स्मिता झा की कविता
लिखना चाहती हूँ
मैं........
काले पीले कागज की जमीन पर
लिखना चाहती हूँ
धूप खुशबू और बारीश की कविता...........
पर लिख नहीं पाती..........
अव्यक्त ही रह जाते हैं
छटपटाती संवेदनाएँ
वितृष्णाएँ
इच्छाएँ
और वे तमाम सपनें
जो जागती आँखों से देखे गए थे
रात के आखिरी पहर में................
बिलबिलाते अंधेरे के निपट एकांत में
खुद से जूझती हुई
लिखना चाहती हूँ
रोशनी छलछलाती हुई.... सुगंध भरी एक कविता
जिसके अक्षर अक्षर ...........शब्द शब्द
मेरे बिखरे वजूद को
उजाले का अर्थ दे.........
मेरी भीगीं अनुभूतियों को
फलक की गहराई दे......
पर नहीं.........नहीं लिख पाती
ऐसी महकती नूर भरी कविता
जो मेरे भीतर के गीले अँधेरे में
रोशनी के फूल
खिला सके...........!
(
स्मिता झा की कविता
अन्य कविताएँ
)
अजेय की कविता
स्वीट ड्रीम्स
बिटया क्षणिका के साथ कुछ बातचीत
पापा ये सिल्वर फिश
और वि गुबरैला
और कनखजूरा
क्यों चढ़ आते हैं दीवारों पर?
अभी चूँकी रात है
बेटा
तो इन्हीं का समय है
हमारा भी आएगा
कल सुबह
रिंचू कैती थी
इन के मूँ नहीं होता
बात नहीं
कैसे जीते हैं?
जी लेते हैं
जैसे कुछ मनुष्य भी
चुपचाप, अब सो जाओ
लेकिन मुझे इनसे बात करनी थी
पूछना था
इनके सपनों में कौन आता है?
यह तो मैं भी जानना चाहता था
नहीं जान पाया
तुम कोशिश करो
"हलो!
रात के कीट पतंगो
कहाँ जा रहे हो?"
"................
..............."
सुना पापा ,
उनने कहा
अपना काम करने
अपना सपना देखने
और गुडनाइट कहा
अच्छा ?
और उनके सपनों में झाँको
क्या वे ही परियाँ है?
हाँ पापा ,
वैसा ही राजकुमार!
(
अजेय की क्षणिकाएँ
)
आदर्श अजीत की कविताएँ
अंधेरे में
तुमने जलाया तो क्या जलाया
तस्वीरे कुछ कश्मीर की
खूबसूरती की
और हमारे छूटे घरों की दीवारों पर टंगे
ईश्वर के फोटो
जो हमारे विश्वास थे
तुमने जलाई छत की शहतीरें
फर्श पर बिछे रह गए कालीन
जिनपर नाज था दस्तकारों को
वो नक्काशी
आखरोट की लकड़ी पर
जड़ीभूत पसीने की गंध
और वो
लकड़ी की अल्मारी
जिसमें मेरी गोपनीयता थी
संकोच थे
और आत्मीय अंधेरे भी
तुमने ढहाया तो क्या ढहाया
मिट्टी की बनी चंद ईंटे
और गदवंजे पर रखे
वो पानी से भरे मटके...
तुमने मिटा डाली
बुजुर्गों की निशानी
कश्मीरियत की कहानी
तुमने लूटे
कागज के चंद टुकड़े
इसे तुम दौलत कहते हो
वो मेरे कपड़ै
जो तुमने पहन रखे हैं
उससे तुम नहीं कहलाओगे
मेरा पर्याय
और वो मेरा बेजान टी. वी.
और मेरा बेजुबान रेडियो का खोखा
तुम नहीं जानते
मेरे सपनों में आकर यहाँ
जलावतनी में
बज उठते हैं रात भर
वो मेरी शेल्फ पर जो किताबे
जलाई तुमने
काश तुम उनकी बिलखती रोशनी में भी
देख पाते
कि तुम कितने अंधेरे में हो
(उर्दू से अनुवादः शशि कौल)
(
आदर्श
अजीत की कविताएँ
)
सत्य प्रकाश
की कविताएँ
घोड़े की टाप
सागत के तट पर, पहाड़ों पर
घाटियों में , पठारों पर
सुनता आया हूँ
घोड़े की टाप!
जब पहली बार
भागते हुए घोड़े पर
उछलकर बैठा था आदिममानव
तब से भागता ही रहा है
यह पागल अश्व।
कभी अस्वमेघ का झण्डा लिए
कभी क्रान्ति की धूल उड़ाते,
कभी प्रजातंन्त्र का स्म्भ गाड़ते
इस पर सवार मानव
दुनिया में
उथल पुथल करता आया है
कभी चैन नहीं पाया है।
सदियों से
सदियो से सुनता आया हूँ
घोड़े की टाप
सामय की छाती पर
पता नहीं किस ओर
किस ओर
मंजिल है इस पाल घोड़े की!
सागर के तट पर, पहाड़ों पर
घाटियों मे पठारों पर
सुनता आया हूँ
घोड़े की टाप....
(
सत्य प्रकाश
की अन्य कविताएँ )
तैयब हुसैन
की
कविताएँ
फैंकी हुई बीड़ी
अपने जानते तो
मेरा सर्वस्व चूसकर
उसने मेरी आग
बुझा ही दी थी
और उके पीछे आने वाला
मुझे जूतों की नोक से
कूड़ो में उछालकर
समझा था
राहत की साँस मिल गई उसे।
मैँ इस हालत में
बजाय उन कचड़ों को जलाने के
अपने उपर राख की कुछ और परतें
जमा कर रहा था
यह सोच कर कि
दूर किसी आसमानी अँखों की कोर से
सहानुभूति की बूँदे टपकेंगी
और मेरा नया जन्म होगा।
तभी जिन्दगी से पहले की मौत जैसा आश्चर्य
एक तूफान ने देखा
और मुझे झकझोर दिया
मैंने अपने में सुलगती
शक्ति सचमुच पहली बार पहचानी
और अब
सरचढ़ों की छाती पर सवार
चुनौती दे रहा हूँ रौंदते पाँवो को
मुझे देखने को आगे बढ़ आये
ओ मुझ सरीके तमाशायी!
क्या तुममे कुछ भी नहीं बचा है
सुलगने को?
(
तैयब
हुसैन की अन्य कविताएँ
)
केशव शरण की कविता
सावन में
कितना धुवाँ देती हैं सावन में लकड़ी!
जब
दिन रात
बरसते हैं बादल
और भीगीं हुई धरती पर
चारों ओर उग आते हैं जंगल
जंगल की लकड़ी
कितना धुवाँ देती हैं
जैसे कुल्हाड़ियों के दिये जख्मो को
हरा कर गया हो सावन
अभी पिछले साल वह
एक हर भरे पेड़ की
हरी भरी टहनी थी
हरे भरे सावन में
अब जब कि बादल घुमड़ रहे हैं
अब जब कि झमाझम बरस रहा है पानी
अब जब कि सूखी हुई नदी भी उमड़ रही है
वह धुवाँ देती हुई धीमे--- धीमे सुलग रही है
(केशव
शरण की अन्य कविता )
रति सक्सेना की कविताएँ
मेरे साथ
इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ
उन्होंने मुझ पर छुरी चलाई
तरबूजे की तरह दो फाँकों में बाँट दिया
फिर दो और, दो और
मैं रंक्त रंजित अपने ही रस में
मैंने सोचा
कोई बात नहीं
हवा है सूरज के साथ
मेरे साथ
चाँद है बरगद के साथ
मेरे साथ
मेरे साथ आसमान है
चिड़िया के परों के साथ
मेरा रस सूखा
तन का
फिर मन का
पड़ी -पड़ी
सड़ने लगी माटी पर
कैंचुआ भी था
वही,जहाँ मैँ गिरी
"अपनी जगह अपने आप बनानी होती है
बिना दाँतों के काटते हुए कठोंरता को "
मैंने शुक्रिया नहीं कहा कैंचुए को
मुझे मालूम था कि
वह ही है मेरे साथ
(
रति सक्सेना की कविताएँ )
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