अजेय

 अजेय की क्षणिकाएँ

कृत्या के पाठकों के लिए अजेय का नाम बेहद परिचित है, आपके रेखांकन, कविताएँ कृत्या के पाठकों को हमेशा लुभाते रहे हैं। केलाँग जैसी दुर्गम जगह में रहते हुए वे कैसे कविताएँ कर लेते हैं , यह एक सोचने का विषय है। अब वे कृत्या के लेखक ही नहीं संपादन मण्डल में भी शामिल हैं। उनकी कुछ क्षणिकाएँ निश्चित ही कविता को विशेष परिवेश देती हैं।

क्षणिकाएँ
(केलांग की लोकमान्यताओं के आधार पर)

काम

आँखे आशंकित थीं
हाथों ने कर दिखाया

बर्फ


उस का आना
जैसे तितलियों का झुँड
उस का वीराजना
जैसे सम्राट!
उसका खिसकना
जैसे चोर!

बर्फ

सबने दिया     
दादी ने तकला भर
दादा ने हुक्का भर
माँ ने तकली भर
बापू ने तीर भर    
छिप ही गया
मेरा छोटा सा घर

तमीज

तुमने उसके दोनो हाथों में
चार चार काम दे दिए
और कहा
"बहुत बदतमीज है
पैरों से दरवाजा खोलता है।"

भोजन

पतीले में रह जाए
कोई बात नहीं
थाली में रह जाए
बुरी बात ह
पेट में रह जाए
सबसे बुरी बात।

 


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