रति सक्सेना

रति सक्सेना की कविताएँ

रंगो की अनुपस्थिति, रंगो की दुनिया मे

बहुत- बहुत पहले
इन्द्रधनुष के जन्म से पहले
रंगो की नगरी में
सिर्फ एक रंग था
नीला नहीं, पीला नहीं
लाल या भूरा नहीं
सिर्फ एक रंग
मौत की तरह बलबलाता
सन्नाटे की तरह गहराता
आग का तम्बू बना
इधर से उधर खिंचा
रंगविहीन रंग

अण्डों में तड़तड़ाई जिन्दगियाँ
जिन्दगियों ने दिए बच्चे
रेंगते रंग घुस गए जमीन में
पत्थरों को धरा बनाते हुए
कुछ उड़ चले फड़फड़ा
आसमान की तरह छाते हुए
रंगो ने खड़ी की रीढ़
रीढ़ पर छाए पत्ते
टिक गई दरख्तों के नीचे छाया
रंगो के साथ ऊँघती हुई

रोशनी की बून्दे टपकी
खिल उठी फूल बन
रंगों के चेहरे चमचमा उठे
रंगबिरंगे बनते हुए

रंगो का शहर बसा
रंगो से होली खेलते हुए
धरती पर रेंगती यात्राओं को भुलाते हुए

मित्रों रंगो की इस कहानी में
वे रंग ही नहीं
जो दरअसल रंग हैं
 

क्या तुम मुझ से बात करोगी?

क्या तुम मुझ से बात करोगी?
पहले की तरह
अपनी कब्र पर रखे पत्थर को उतार कर
कंकाल पर माँस पहन कर
तुम मुझसे बात करोगी
पहले की तरह
उसने पूछा

" कैसे?"
मैंने कहा
"माँस की बात करते हो
हड्डियाँ गल कर
बन गई हैं बुरादा
जीभ झड़ गई
आवाज आसमान में उड़ गई

" बात तो करो
सब कुछ आ जाएगा
माँस, हड्डियाँ, जीभ
और तो और
आवाज"

मैंने दरख्त की जड़ से जीभ बनाई
पत्तियों से दाँत
घाटियों में घूमती आवाज को पकड़ा
सागरी लहरों से देह बनाई
लो . अब मैं तैयार हूँ,
बतियाने के लिए

अरे अब तुम कहाँ गए?


दुख का सुख

एक दिन
दुख ने दरवाजा खटखटा
पूछा‍
क्या चाहती हो तुम
एक बड़ा
या
छोटे अनेक?

मैंने चुने छोटे
चढ़ फटी काली चादर पर
लगे टिमटिमाने वे
धुँधली रोशनी में
राह मिल गई मुझे
उबड़ खाबड़ में

टपक पड़े जमीन पर
बीज बन
खिल गए सूरजमुखी के बिरवे
मेरी बंजर जमीन हरहरा उठी
पीली दुखती ओढनी बन

वे बन गए चींटे
चढ़ गए देह पर
चट करने लगे माँस

अब मेरे पास
एक बड़ा सुख है
ढेर से दुखों का ग्रास
बन पाने का

 


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