कृत्या 2005
          
कविता का उत्सव

कृत्या ने साहित्य के विशद संसार में पहला कदम रख लिया । कइयों ने खुशी जाहिर की तो कुछ एक ने आलोचना की । कृत्या दोनों की आभारी है! बच्चे का पहला कदम चाहे कितना लड़खड़ाता क्यो ना हो माता पिता के लिए उत्सव का सबब बन जाता है, क्यों कि पहले कदम में चलना ही नहीं बल्कि दौड़ना, चढ़ना और उड़ना भी निहित होता है । कृत्या के पहले कदम ने कविता प्रेमियों को उत्सव मनाने का अवसर दे दिया । १८ जून को केरल के तिरुवनन्तपुरम शहर के म्यूजियम आडिटोरियम में "कवितोत्सव" मनाया गया । कविता मात्र अक्षरों मे नहीं है, अन्य कलाओं जैसे अभिनय, नृत्य, संगीत और चित्रकारिता में भी है । कवितोत्सव में इन सब कलाओं की उपस्थिति थी ।

अय्यप्प पणिक्कर ने रति सक्सेना की कविता " एक ऋचा चप्पलों के लिए " के वाचन से कार्यक्रम का आरंभ किया । प्रमुख नाट्यधर्मी कावालम नारायण पणिक्कर ने प्रमुख अतिथि के रूप में अपनी और अय्यप्प पणिक्कर की कविताओं के अभिनय और वाचन से लोगों को अभिभूत किया । जिस वक्त मंच पर अय्यप्प पणिक्कर जी और कावालम नारायण पणिक्कर जी कविता वाचन कर रहे थे, केरल के महान चित्रकार बी डी दत्तन जी चित्र बना रहे थे । इस तरह वाचन, अभिनय और चित्रकला की जुगलबंदी ने कविता में रस, रंग और संगीत भर दिया । इसके उपरान्त सोपानम ग्रुप ने संस्कृत नाटक "आश्चर्य चूड़ामणि" के सीता अपहरण भाग को बड़ी खूबसूरती से प्रस्तुत किया । तपोवन में सीता के सौंदर्य का बीसों आँखों से पान करते रावण की तरह दर्शकों ने द्विगुणित मन से नाटक का रसास्वादन किया । इस उत्सव में अन्य महत्वपूर्ण प्रस्तुतियाँ थीः पंजाबी कलाकार नीता महेन्द्रा द्वारा अभिनीत अमृता प्रीतम की कहानीः "कोरी हांडी", श्रीमती पल्लवी द्वारा प्रस्तुत रवीन्द्र संगीत, और पाश की कविताएँ । मलयालम कवि विनय चन्द्रन ने भी श्रोताओं के कविता के श्रवणानन्द से परिचित करवाया । कविता प्रेमियों के लिये कवितोत्सव एक यादगार शाम थी, इसमें कोई संदेह नहीं । कविता को उत्सव के रूप मे मनाना कवि सम्मेलन से अलग अनुभूति है........

(  कृत्या 2005 और जानकारी )


कृत्या 2006

जिन दिनों कृत्या का बीज दीमाग में जड़ जमा रहा था उन दिनों एक चाह मन में रही थी कि कृत्या की जड़ें कन्या कुमारी से कश्मीर ‌और जैसलमेर से कामाक्षी तक फैलें, और इसकी शाखाएँ चीन जापान से लेकर अमेरिका अफ्रीका तक लहराएँ। यही कारण था कि जिन लोगों को कृत्या से जोड़ा गया, उनमे अग्निशेखर ( जम्मू) किम फाम, (शिलांग) और टी पी राजीवन (केरल) आदि थे। अन्य सहयोगी तो कृत्या के साथ अधिक नहीं चले पर अग्निशेखर जी ने कृत्या को आरंभ से बेहद सक्रिय साहित्यिक सहयोग दिया। उन्ही की बदौलत हब्बा खातून, ललद्यत, अरुणिमाल , और रूपभवानी जैसी कवयित्रियों की कविता से हिन्दी समाज और अंग्रेजी समाज को परिचित करवाने का मौका मिला। उन्होंने ही अजेय और अरुणा शर्मा जी जैसे कर्मठ कवियों को कृत्या के साथ जोड़ा।

हमने कृत्या के जन्म के साथ " कवितोत्सव " मनाया और कल्पना की कि पहली वर्षगाँठ कश्मीर की भूमि में हो, वाग्देवी ने कहा "तथास्तु"!!, देखिए हम डोगरी विशेषांक के साथ कश्मीर की साहित्यिक भूमि पर अपनी पहली वर्षगाँठ मनाने के लिए उपस्थित  हो गए।

  

( कृत्या 2006 और जानकारी )


कृत्या 2007

अन्तर्राष्ट्रीय कवितोत्सव कृत्या2007

छोटी सी कोशिश का बड़ा परिणाम


कृत्या की शुरुआत एक वेब पत्रिका के द्वारा हुई थी जिसके पश्चातल में कविता को विश्व पटल में लाने की कोशिश थी। यह कोशिश काफी कुछ ऐसी थी जैसी कि मिथक के अनुसार राम पुल निर्माण में गिलहरी की कोशिश। कृत्या को नेट पर देखते ही अय्यप्पा पणिक्कर ने कवितोत्सव मनाने का सुझाव रखा था। उनका कहना था कि कविता को अन्य कलाओं से जोड़ने पर ही हम आज के समाज से जोड़ सकते हैं।
अतः कृत्या पत्रिका के जन्म के तुरन्त बाद जून 2005 में पहला कवितोत्सव मनाया गया, जिसमें कावालम पणिक्कर, दत्तन जैसे नामी गिरामी कलाकारों ने भूमिका निभाई। दूसरा कवितोत्सव जम्मू में किया गया, जिसमें अग्निशेखर की अहम भूमिका रही।
जनवरी २००७ में कृत्या एक संस्था के रूप पंजीकृत की गई जिसका उद्देश्य और अधिक व्यापक हो गया। पहले दो उत्सवों की सफलता और विश्व पटल पर कृत्या की लोकप्रियता ने हमें विश्व कवितोत्सव के लिए प्रेरित किया।

 

( कृत्या 2007 और जानकारी )


कृत्या 2008

अन्तर्राष्ट्रीय कवितोत्सव कृत्या2008

पंजाब से लौटे हुए एक सप्ताह बीत गया किन्तु नवम्बर के गुलाबी की खुनक देह में, और कविता की गन्ध मन में अभी तक बसी है। कृत्या 2008 के सफल आयोजन के बाद उसके प्रभाव से निकलना मेरे लिए ही नहीं, कृत्या की युवा टीम के लिए कठिन हो रहा है। इतना आसान नहीं था, बिल्कुल नई जगह, नए लोगों के बीच काम करना, वह भी आज के कूटनीति भरे माहौल में, फिर भी सब उतना ही अच्छा हुआ जितना कि हम चाह रहे थे। कृत्या उत्सव की तैयारी काफी पहले से शुरु हो गई थी। विजेन्द्र ने कला का क्षेत्र संभाल लिया था, हरफन मौला अमित हर किसी काम में दखल दे रहा था, शलभा दूर बैठी वाउचर, बजट आदि का काम देख रही थी और मैं हड़बड़ाती हुई फोन से सम्पर्क साधने का काम कर रही थी। चण्डीगड़ पहुँचने से काफी पहले से ही लगने लगा था कि काम आसान नहीं होगा। कृत्या के दो बुजुर्ग ट्रस्टी अस्वस्थ थे, मित्रों मे सभी लोग किसी ना किसी मुसीबत से घिरे थे। पंजाब से आने वाली सूचनाएँ पूर्णतया सकारात्मक नहीं थी। किन्तु जब मैं अकेली सामान लाद कर तीन दिन की यात्रा पूरी करके 9 नवम्बर को दिल्ली पहुँची तो चण्डीगड़ अमित साथ चलने को तैयार था. विजेन्द्र भी अपने हिस्से का काफी कुछ काम कर चुका था। मैं और अमित जब चण्डीगड़ पहुँचे तब पता चला कि इतने बड़े कार्यक्रम की किसी को भनक तक नहीं है। पता नहीं स्थानीय नीति थी, या फिर हर चीज को आराम से लेने की आदत। पंजाब आर्ट काउंसिल के पदाधिकारी शादी ब्याह में शिरकत करने गए थे, पातर जी व्यस्त थे। लेकिन तभी चण्डीगड़ के अनजाने मित्रों ने सहायता की। सुखदेव जी पहली सहायता के रूप में कृपाल नामक युवक को लेकर आए़ , सत्यपाल सहगल ने अपने कार्यक्रम के दौरान कृत्या उत्सव की घोषणा करने की सलाह दी। हमे महसूस हुआ कि जिस कार्यक्रम के लिए हम महिनों से तैयारी कर रहे थे, चण्डीगड़ उसके लिए तैयार तक नहीं था। जिस तरह का प्रचार- प्रसार होना था, उसकी भनक तक नहीं थी। स्थानीय मनमुटाव और आपसी रंजिश भी मन को विचलित कर रही थी, किन्तु फिर भी खुशी इस बात की थी कि अनेक लोग हमारी सहायता के लिए आने लगे। दस, ग्यारह और बारह को अमित , कृपाल और मैं भूत की तरह कृत्या के प्रचार में लगे गए, कालेजों में जाकर पोस्टर बाँटना, लोगों से फोन पर सम्पर्क साधना और जो लोग समय से पहले आ रहे थे, उनकों लाने का इंतजाम करना। 13 को हमारा सारा ध्यान अतिथियों को सही सलामती से होटलों में पहुँचाने का था, और जैसा कि हम आशा कर रहे थे, यह काम आसान नहीं था। कृत्या की टीम का काम करने का तरीका अलग है, हम सब स्वयं सेवकों जैसे काम करने में विश्वास करते हैं। लेकिन पंजाब आर्ट काउंसल सरकारी संस्था होने के कारण बैठकों और बातचीतों पर ज्यादा ध्यान देते थे। इसलिए कुछ समस्याएँ आई। लेकिन एक बार यह बात साढ हो गई कि हम दोनों को अपना अपना मोर्चा संभालना है तो काम आसान हो गया।

( कृत्या 2008 और जानकारी )


कृत्या यूरोप में ( kritya2009)

कृत्या 2008 के बाद मैं थकी थकाई रेल में बैठी अपने लेपटाप में मेल चेक कर रही थी कि एक मेल को देख कर आश्चर्य चकित । मोन्जा - इटली से एक मेल आया था जिसमे POESIA PRESENTE में भाग लेने का अनुरोध था। मुझे विश्वास ही नहीं हुआ, फिर से मेल पढ़ी तो पता लगा कि उन्होंने फैदरिकों दव्रा किए मेरी कविताओं पढ़ कर ही यह मेल लिखा था। फेडरिको ने नेट पर मेरी कविताये पढ़ कर इतालवी में अनुवाद किया था, और पुस्तक के रूप में भी छपवाया था। अभी हाल ही में नोर्वे की ओदवे और वियेना के पीटर ने अपने अपने देश आने का आमन्त्रण दिया था। उनके आमन्त्रण को सुन कर हँसी ही आई थी कि यूरोप कोई बगल का मोहल्ला तो नहीं कि उठ कर चल दिया जाए। लेकिन मोन्जा से आए निमन्त्रण ने मन को बल दिया और यूरोप भ्रमण की योजना बनने लगी। कृत्या के युवा सहयोगियों ने मन में इच्छा तो जगा ही दी थी। अमित, कृपाल और विजेन्द्र सा्थ चलना चाहते थे। इसलिए यही तय हुआ कि हर जगह कविता पाठ या पेन्टिंग से सम्बन्धी कार्यक्रम आयोजित हो जाएँ , और रहने की कोई व्यवस्था तो हम सब ग्रुप में चलेंगे। आरंभ में सभी के मन में उमंग थी, कुछ और लोग अनायास जुड़ गए, खबर फैली तो कुछों ने जुड़ने की बात की। लेकिन बहुत बड़ा ग्रुप तो जा नहीं सकता था। अब वीसा बनने तक की कथा बखान करने की जरूरत नहीं. बस इतना कहूँगी कि खूब पापड़ बेलने पड़े। कारण बस यही था कि मैं कवि के रूप में वीसा लेना चाहती थी। सबसे पहले मैंने अपना वीसा बनवाया, जिससे अन्य लोगों को मालूम पढ़ जाए कि क्या क्या करना चाहिए। लेकिन जाने के वक्त तक मात्र एक व्यक्ति रह गए जो कि हमारे प्रमुख ग्रुप में थे ही नहीं।
हिन्दी विभाग के अध्यक्ष सत्यॉपाल सहगल को यू जी सी से सहयोग मिलने की संभावना थी, इसलिए वे साथ जाने के इच्छूक थे। मेरा विचार था कि जितने लोग साथ होंगे , उतना ही अच्छा होगा? जाने की तैयारी भी धीरे- धीरे की गई, और अन्त में जब मैं मुम्बई से होते हुए स्तावंगर के लिए रवाना हुई तो मन में संशय और भ्रम सब कुछ था। </p><p>
त्रिवेन्द्रम से मुम्बई की फ्लाइट दिन थी और मैं मुम्बई दिन के ३ बजे तक पहुँच गई थी इसलिए रात तक इंतजार करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय विश्रामालय में पैसा देख कर बैठ गई। अजीब सा अकेलापन सा लग रहा था, लेकिन एक विदेशी लड़की को अकेला बैठे देखा तो उसके पास जा कर बैठ गई, जिससे सामान छोड़ कर जाना हो तो सुविधा हो। धीरे- धीरे हम अलग अलग देशों की पाँच छह लड़कियाँ और महिलाएँ इक्कट्ठी हो गईं। हम सब उसी तरह से गप्पे लगाने लगीं, जैसे कि कस्बे मुहल्ले की लड़कियाँ औरते गप्पे लगाती है। हममे से एक लड़की केवल सतरह बरस की थी और वह दुनिया घूम चुकी थी। भारत में भी करीब छह महिने से थी, और काफी कुछ जानती थी। एक अन्य लड़की पांडीचेरि में भारतीय संगीत पर तुलनात्मक अध्ययन कर रही थी। मैं उन्हे देख कर अचंभित थी, हम लोग अपनी जिन्दगी किस तरह यूँ ही गँवा देते हैं, अपने कस्बे के बारे में भी नहीं जान पाते और ये लड़कियाँ कितना कुछ जानती है।
रात के २ बजे फ्लाइट थी, मैं रात के बारह बजे प्रमुख अड्डे में आई, बेहद भीड़ थी, जब मैं सामान के लिए काउण्टर पर पूछी तो मुझे से पूछा गया कि मैं किस लिए जा रही हूँ। मैंने देखा कि मेरे साथ खड़े अन्य किसी दूसरे से कुछ नहीं पूछा गया था। मैंने कहा कि कवितोत्सव में भाग लेने जा रही हूँ, तो वह कहने लगा कि इनविटिशन दिखाई, मैंने कहा कि आप मेरा वीसा नहीं देख रहे हैं क्या, इनविटिशन की क्या जरूरत? और यह इमीग्रेशन काउंटर नहीं है। तो कहने लगा कि ठीक है, आप अपना इनवीटेशन हाथ में रखिए, पूछा जा सकता है। उसकी बात सही थी, इमीग्रेन काउण्टर पर इनविटेशन लेटर के लिए पूछा गया। मैंने उसके साथ उस अखबार की प्रतिलिपी भी दे दी जिसमें नोर्वे के अखबार में मेरा नाम भारत से आने वाले कवियों में लिखा हुआ था। और उससे पूछा कि क्या वे कुछ और सबूत चाहते हैं, मैं देख रही थी भ्रमण के लिए जाने वालों से कुछ नहीं पूछा गया था। खैर इन झंझटों से छूट कर हवाई जहाज में बैठने का इंतजार करने लगी।
एक बार यात्रा शुरु हुई, तो चिन्ता कुछ कम हुई। Frankfurt , Germonay में हवाई जहाज बदलना था। यहाँ पर कुछ वक्त का इंतजार था। सुरक्षा से तो गुजरना पड़ा, लेकिन किसी ने मेरी कविता पाठन में भाग लेने वाली बात पर सवाल नहीं हुये। इतना जरूर कहूँगी कि यहाँ सुरक्षा चैंकिग कुछ गाड़ी थी।
मैं तेरह तारीख को ग्यारह बजे घर से निकली थी , नोर्वे और भारतीय वक्त में करीब पाँच घण्टे का अन्तर है, फिर भी जब स्तवांगर के सोला एयरपोर्ट पर पहुँची तो एक बज चुके थे। यानी कि मैं ३२ घण्टे से घर से बाहर थी।स्तवांगर का हवाई अड्डा अपेक्षाकृत छोटा था। सामान लेकर बाहर निकलते ही ओदवे मिली तो सारी थकावट छू हो गई।

(कृत्या यूरोप में- और जानकारी)


कृत्या2010

कृत्या2010 के अन्तिम दिवस की शाम, हम सब अजीब सी मनोस्थिति में है,
एक बेहद सशक्त काव्य पाठ की सुनहरी आभा के बीचोबीच में से गुजर चुके हैं,
मादक मोहात्मकता हमें बाँध रही है
यात्राएँ हमें अपने नीड़ की ओर ले चलने को तैयार हैं
अलग अलग भाषाएँ, अलग अलग अलग प्रान्त , देश के विभिन्न भोगोलिक कोण, लेकिन कृत्या ने हमें ऐसा जोड़ा कि मानो हम एक मुहल्ले के रहने वाले हैं.
इजराइल की दिति रोनेन इरान के बहजाद जरीनपुर के ऐन सामने बैठी बतिया रही हैं, मानों बचपन से बिछुड़े साथी हों, मैं कुछ देर तक उन्हे देखने के बाद सवाल उछालती हूँ, भाई और भी लोग हैं यहाँ इजराइल और इरान के अलावा,
नोर्वे के ब्रेयान मुस्कुरा कर जवाब देते हैं....जब तक पालिस्तान की समस्या का अन्त नहीं होता ये लोग यूँ बतियाते रहेंगे...
तिब्बती युवक तेनसिंग (Tenzin Tsundue), जो कि कार्यक्रम के आरंभ में एलान कर रहा था कि मैं भारतीय नहीं हूँ, तिब्बती हूँ.. कार्यक्रम के अन्त में मंच की बागडोर संभालता हुआ कहता है... मैं आप सबका हूँ, यहीं का हूँ... जाऊंगा कहाँ..कृत्या2010 बृहद संगोष्ठी का विषय रहा, निष्कासन, पीड़ा और उससे मुक्ति। कृत्या सभी तरह के निष्कासन को रेखांकित कर रही थी। युद्धजनित, आत्मिक, स्वैच्छिक और आर्थिक...अर्जेटाइना की एलिसा पार्टनोई ‍- Alicia Partnoy, जिन्होनें निष्कासन के दर्द को व्यक्तिगत रूप में झेला था ने काव्य पाय का आरम्भ कि , यह कहते हुए-
उन्होने मेरे पाँवों के नीचे सेमेरे देश को खींच लिया
निष्कासन‍- यह नाम देकर
अचानक इस तरह
मेरे पैरों के नीचे की जमीन खींच ली
मेरे चारों ओर अब दूरियाँ ही दूरियाँ
लेकिन इसी निष्कासन ने उन्हें ताकत दी ,
जिससे वे अपने देश की लड़ाई लड़ सकें
‍फिर भी मैं उस दिन को याद करती हूँ
जब सेना ने मेरे देश को
सलाखों के पीछे ढकेल दिया था
लेकिन उस दिन मुझ में जबरदस्त ताकत आई
और डर चला गया
यही शुरुआत थी
इजराइल की दिति रोनेन एक चिड़िया से कहानी शुरु करती हैं और फोटे फ्रेम की तरह हमें क्रूरता के उस क्षण की ओर ले जाती है, जहाँ मानवीयता चिड़िया की तरह पंख फड़फड़ाती हुई जमीन पर तड़प रही है। मंच पर दिति के आँसुओं के साथ श्रोताओं के मन भीग जाते है।तेनसिंग (Tenzin Tsundueऔ की कविता धर्मशाला में बरसात साफ साफ जताती है कि कविता दुख को व्यक्त करने में ही विश्वास नहीं करती बल्कि लड़ने की ताकत देती -
हर शाममैं अपने किराए के कमरे मैं लौटता हूँ
पर मैं इस तरह मरना नहीं चाहता
कहीं न कहीं
कोई रास्ता होना चाहिए
मै अपने कमरे की तरह नहीं रो सकता
मैं बहुत रो चुका
जेल में
हताशा के छोटे छोटे क्षणों में
कहीं न कहीं
कोई रास्ता होना चाहिए
मैं रोना नहीं चाहता
मेरा कमरा काफी भीग चुका है.
कश्मीर के अग्निशेखर अपनी आवाज में धार देते हुए कहते हैं‍‍.....
कहती थीं मेरी माँ
सृष्टि के अनादिकाल में कभी
फिसल गिरी थीं चाँद से
और तब से नहीं टूटता
बूढ़े समुद्र में
उनका आजीवन कारावस
कविता सवाल छोड़ती है, जमीन से जुड़ाव आजीवन कारावस तो नहीं, कहीं इसीलिए तो कबीर बाबा कह बैठे......
रहना नही देश बिराना...
सिंगोनिया सिंगोने ने अपने लेख मे् कहती हैं.....
"आदमी जन्म से ही निर्वासन में जीता है। उसकी जिन्दगी का संचालन मौत के हाथों होता है। तभी तो वह जब तक इस दुनिया में रहता है , अपनी अस्मिता और अपने आप को तलाशता रहता है। यह क्रम शताब्दियों से चल रहा है। यही नहीं अपनी जड़ों को तलाशना आदमी की सबसे तीव्र मनोभावना बन रही है। उसके लिए यह अनुभूत करना ही संतोषदायक होता है कि उसकी जड़े इस धरती में हैं, यही नहीं उसके लिए खास जगह भी है, जो शनै शनै उसकी अपनी बनती जा रही है।
आदमी अधिकार चाहता है, यह उसका नैसर्गिक स्वभाव है। यही निश्चितता का प्रमुख स्रोत होता है। यह आत्मविश्वास की पहली सीढ़ी है। अस्मिता अपने आदमी होने की तलाश है, इसे अपनी जड़ों में, परम्परा में, नाम में और जातिनाम , जाति, जबान जगह के नाम से जोड़ने की कोशिश की जाती है। "एनरिक मोया Enrique Moya की बात
"यदि वे बचते हैं तो, तो वे आवाजे, जिन्होंने कभी उनकी देह कोआशाएँ दी थी, उनकी शहादत की आत्माओं को,वे रहते हैं अपने अनन्त विचारों के संसार कोबाद में चुपचाप बिखर हो जाते हैं सन्नाटे मेंपूर्णता की एक कविता पाए बिना
अमरता के लिए जरूरी है किपैदा ही नहीं हुआ जाए।"
कोस्टा रिका के ओस्वालडो सौमा Osvaldo Sauma इस आत्मिकता को ऊँचाई देते है‍
आत्मसंतुष्टि के मार्ग को अपनाते हुए मैं खुद को समझाता हूं पर ये दिल अब चाहता है अपने पिंजरे से मुक्ति अपने संत होने से नहीं बंधा रहेगा जो आकांक्षाओं को अस्वीकार करेगा यह मुक्ति चाहता है और गलियों तक ले जाते हुए खुद को खपाना उतावले कामों में तमाम खतरों का जोखिम उठाता है यह जानते हुए कि सच्चे यौद्धा की तो पहले ही मौत हो चुकी है।
कृत्या विस्थापन के विभिन्न आयामों से गुजर चुकी है, विभिन्न बिन्दुओं को तलाश रही है, और एक अन्तिम सहमती की ओर रास्ता बना रही है।
इस सफर में कविता फिल्मों ने साथ दिया, साधो की उपस्थिति और ओदवे की भारतीय कवियों पर बनाई गई फिल्में कविता के इस सफर को दृष्टि देती रहीं। भारतीय कवियों की आवाज को ओदवे विश्व पटल पर ले कर घूमी।
पश्चातल में कलाकार इन कविताओं में रंग भरते रहे, जिसे कि प्रांजल आर्ट्स ग्वालियर से लेकर आया था। कृत्या के सारथी डा श्यामला , डा जयश्री और अमित, विजेन्द्र, शलभा, कृपाल थके नहीं बल्कि अधिक उत्साहित लग रहे थे।
कविता ले जा रही है हमे अपने पंखो पर पर बैठा निष्काशन से दूर...
रति सक्सेना

(कृत्या2010 और जानकारी)