सबसे पहले मै अपना परिचय दूँ,
मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो।

मैं उन सब के दिलो जबान में रहती हूँ, जो हर झूठ, हर गलत, हर अन्याय के विरोध में आवाज उठाते हैं।
मैं अनेक रूपों में लोगों के सामने आती हूँ, मेरा एक सशक्त माध्यम कविता है।

कविता - जो कभी बुलन्दियों पर थी।
कविता - जो आज हाशिये पर आने का भ्रम दे रही है।
कविता - जिसके पास सपनों के पंख हैं।
कविता - जो हकीकत की आँच पर नंगे पैर चलने का जुनून रखती है।
कविता - जो प्यार करना सिखाती है, जो जिन्दगी से रूबरु होना सिखाती है।

यह सवाल बेमानी नहीं होगा कि कविता कृत्या की श्रेणी में कैसे आ सकती है? या फिर कविता को कृत्या कैसे कहा जा सकता है? दरअसल इन्हीं सवालों से मैं, कृत्या जूझूंगी, और कविता के माध्यम से अपनी बात कहूंगी। कविता में पैठने से पहले यह जानना जरूरी है कि कविता में ऐसी कौन सी शक्ति है जिससे वह व्यक्ति से समष्टि की आवाज बन जाती है! इस के लिए हमे अपने अग्रज कवियों को पढ़ना जरूरी है। "कवि अग्रज " शृंखला के अन्तर्गत हर महीने भारतीय भाषाओं के उन कवियों से मिलेंगे, जिनके शब्दों की दीवानगी पर काल की छाया तक नहीं पड़ी। इस शृंखला में सबसे पहले आपकी मुलाकात होगी कश्मीर की १४वीं सदी की कवयित्री ललद्यद से, जिनके वाख हर कश्मीरी की जबान पर आज तक चढ़ें हैं। उनके वाख जिन्दगी के शेर को चुनौतियों के जंगल से सियार बना खींच लाने और उस पर सवारी करने का जुनून रखते थे। ये वाख हमे जिन्दगी के बारे में ही नहीं कविता के बारे में भी मार्गप्रदर्शन करते हैं कि कविता आत्मतुष्टि नहीं अपितु सर्व सन्तुष्टि के लिए लिखी जानी चाहिये।

कृत्या की अपनी पसन्द ऐसी कविता है जो अन्याय के खिलाफ आवाज उठाये और जिन्दगी से प्यार करना सिखाये। इस बार "मेरी पसन्द" में पंजाबी कवि पाश, जिनकी कविता में भरा विद्रोह आज की विषम राजनैतिक अवस्था में आम आदमी के मन की आवाज हो सकता है, को प्रस्तुत किया गया है। पाश की कविता उस जमीन की उपज है जिसने जलियों वाला काण्ड देखा है।

हम बड़े अजीब समय में रह रहें हैं, एक ओर संभावनाएँ बढ़ीं हैं तो दूसरी ओर समस्यायें। ऐसे लोगों का प्रतिशत बढ़ा है जो रोजी रोटी की समस्या से कहीं परे हैं तो ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जिन्हें भूख से बचने के लिये आत्महत्या करनी पड़ रही है। ऐसे युवको की कमी नहीं जिन्हें कम समय में काफी कुछ मिला है तो यह बात भी सच है कि उन्हें कुछ पाने के लिये काफी कुछ खोना पड़ा है। एक ओर देश के कुछ हिस्से इतने शान्त हैं कि जिन्दगी की रफ्तार ही मद्यम लगती है तो दूसरी ओर कुछ हिस्सों को रफ्तार बढ़ाने का मौका ही नहीं क्यों कि यहाँ काग बोलने के साथ बम फूटने की आवाज सुनाई देने लगती है। कवि अपने को वक्त के साथ जोड़ कर देखता है, चाहे आतंक हो या भीतरी उथल पुथल भरी शान्ति, उसकी कविता जीवन की भाषा ही बोलती है। कश्मीर के कवि अग्निशेखर हों या मध्यप्रदेश के राजेश जोशी , जिन्दगी दोनों की कविता में बोलती है। कवि की निगाह से अपने समय को देखना आत्ममुग्धता से परे अपने आप से परिचय पाना है।

कविता पढ़ना और कविता के बारे में पढ़ना, दोनों अलग अलग चिन्तन प्रक्रियाएँ हैं। जब एक कवि स्वयं कविता के बारे में बात करें तो पठनीयता की अपेक्षा बढ़ जाती है। कवि अरुण कमल की कलम से कविता क्यूँ कविता की प्रासंगिकता से सम्बन्धित अनेक सवालों का जवाब देने में समर्थ है।

इस दौर में जब खुद को खोने का संकट बढ़ता जा रहा है , तो कविता को केन्द्र में लाने का प्रयास अपना घर फूंक कर तमाशा देखना ही है तो यह पागलपन क्यों? शायद इसलिये कि अपनी पहचान को जानने की जगह हम खुद को पहचान लें, इस ऋचा के विरोध में........

एक ऋचा चप्पलोँ के लिए....

मुँह बेहद कड़ुवा है, जीभ से आँतों तक, कड़ुवाहट ही कड़ुवाहट,
सब कुछ कड़ुवा, ट्यूब में फँसे टुथपेस्ट से लेकर घिसे हुए टुथ ब्रश तक
रात तक सब कुछ सही था, बेहिसाब सपनो वाली नीन्द
उसी में से एक सुबह तक चला आया पलकों के साथ

चप्पलों की लाइन लगी है, मैं चप्पले खोज रही हूँ,
एक से एक खूबसूरत चप्पलें, पर मेरी चप्पले नदारत
उधर सफर की उड़ान तैयार, इधर चप्पलों का अतापता ही नहीं
चप्पलों के लिए सफर छोड़ा जा सकता है क्या, मैं अपने आप पर सवाल दागती हूँ
लेकिन चप्पलों के बगैर सफर, वह भी हवाई, हवाई कल्पना से भी परे है।
यूँ भी कितने कदम चल सकती हूँ मैं चप्पलों के बिना?
चप्पले कहाँ वे मेरे पैर हैं, पिंडलियाँ हैं, घुटने हैं, और पैर?
हाँ पैर तो बस बैसाखियाँ रह गये हैं, जो एक भी कदम नहीं भर सकते चप्पलों के बिना

चप्पले मेरा व्यक्तित्व हैं, चप्पलें मेरा वजूद हैं
चप्पलें मेरी ऊँचाईँ हैं जिसकी सीढ़ी से मैं आसमान छू सकती हूँ
चप्पले मेरा वर्तमान और भविष्य है।
चप्पले मेरे परिधान की खूबसूरती हैं।
एक जेवर कम हुआ तो कोई ध्यान नहीं देगा किंतु
चप्पल की एड़ी टूटी हो तो सारी दुनिया की नजर गढ़ जाएगी


मेरी मंजिल छूट रही है, मैं चप्पले खोज रही हूँ
मेरी उड़ान हाथ से निकली जा रही है, मैं चप्पले खोज रही हूँ
मेरा भविष्य छटपटा रहा है और मै चप्पले खोज रही हूँ ।
चप्पले मेरा मंत्र हैं, मेरा शाश्वत धर्म हैं

वे खो रही हैं या मैं खुद खो रहीं हूँ?

हे इन्द्र वरुण अग्नि देव
हे समस्त दिशाओं
धरती और आकाश
मैं चप्पलें खोज रहीं हूँ

खुद को खो रहीं हूँ.
 

कृत्या का उद्देश्य‍

1-‍ कविता की पुनर्प्रतिष्ठा
2-- भारत की सभी भाषाओं की कविता को विश्व मंच पर लाना
3-- भारतीय कविता परम्परा के पुराने अध्यायों को नए आयाम देना
4- विदेशी कविता के नए अन्दाज को पहचानना, उन्हें अनुवाद द्वारा देशीय पाठकों को उपलब्ध करवाना
5-कविता प्रस्तुति के विभिन्न आयामों को तलाशना (नाट्य अभिव्यक्ति इत्यादि)

कृत्या का लक्ष्य

1- भारतीय भाषाओं की महान काव्य परम्परा को एक अन्तर्राष्ट्टीय मंच देना‍।
2- उत्सव में प्रस्तुत विदेशी भाषा की कविताओं को हिन्दी में अनुदित कर के अन्य भारतीय भाषाओं में स्थान्तरित करना।
3- भारत की (चार प्रमुख भाषाओं की )कविताओं को अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं में अनुदित करना।
4- कविता और अन्य कलाओं के मध्य एक सेतु प्रखायपित करना।

रति सक्सेना