मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 
 

हर देश, काल, वर्ग, जाति, भाषा विशेष की अपनी चिन्ताएँ समस्याएँ तथा सरोकार होते हैं। डोगरी कविता को केन्द्र में रख कर यदि बात की जाए तो इसका व्यवहारिक पक्ष साहित्यिक पक्ष पर भारी पड़ता है। डोगरी जो कि पहाड़ी कण्ढ़ी प्रदेश के सीधे साधे, भोलेलोगों की भाषा है, उनकी कविताएँ अपनी सरलता व सहजता के कारण आकृष्ट करती हैं। इनमें जीवन की सच्चाई उद्घोषित होती है। पाब्लो नैरुदा ने कहा भी हैः -किसी पेड़ ने नहीं कहा मुझसे/ मैं सबसे ऊँचा हूँ। किसी जड़ ने नहीं कहा मुझसे/ मैं ही आती हूँ सबसे ज्यादा गहराई से/. और कभी नही कहा रोटी ने/ कुछ भी नहीं रोटी जैसा।
अरुणा शर्मा
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मैं
कुएँ पर रखी
एक बाल्टी हूँ।
जिस राहगीर का मन करता
मेरे गले में रस्सी बाँधकर
कुएँ में से पानी भरता
दो अंजुरी पी लेता।

फिर मुझे
बिल्कुल खाली कर
कुएँ के साथ लगती
कच्ची दीवार पर
लगी हुई कील के साथ
टाँग जाता है,
कील हिलती रहती है
मेरा कलेजा
मुँह तक आता रहता है

पद्मा सचदेव

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गीतों के अमन तराने हैं
हम भाग्य जगाने वाले हैं
नहीं भेदभाव कोई भीतर है
एकता हमारे अन्दर है
रण बाँके कहलाने वाले हैं
हम भाग्य जगाने वाले है
वैसे तो अमन के पुजारी हैं
रणभूमि में तेज कटारी हैं
हम बैर भुलाने वाले हैं
हम भाग्य जगाने वाले है
स्वागत के लिए हम भोले हैं
छेड़ो अगर तो आग के गोले हैं-
ज्ञानेश्वर
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डोगरी कविता के आरंभ के विषय में जब कोई चर्चा सिर उठाती है तो हमारी नजर 18 वीं सदी के डोगरी के आदि कवि "देवी दत्ता" उर्फ कवि "दत्तू " पर जा टिकती है। कहा जा सकता है कि अट्ठाहरवीं सदी से ही डोगरी कविता लिखित रूप में उपलब्ध है।  हालाँकि डोगरा लोक संस्कृति के राग रूप लोक गीतों की उपस्थिति डोगरा जीवन शैली में सदियों से बनी हुई है।

डा. ज्ञान सिंह

डोगरी गजल के जिक्र के बिना डोगरी कविता साहित्य की बात अधूरी है। " गजल " डोगरी साहित्य में मकबूल तरीन विधा है, जो डोगरी साहित्य की बगिया में नया रंग भर रही है। बेशक यह रूप अरबी फारसी की देन है। परन्तु डुग्गर धरती इसको बहुत रास आई है। डोगरी गजल में शायरों की वैयक्तिकता विषयों की विविधता के साथ- साथ अंदाज ए बया बेशक अपना- अपना है। परन्तु पैगाम ए कलाम साँझा है।

शशि पठानिया 
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सुन चन्दा की चाँदनी
तुम को निर्मल जल स्रोत
पर तुम्हारा साजन प्यासा
फिरे प्यासा थार- थार!

सुन चन्दा की चाँदनी
तुम कोई गीत अनरचा
पर गीतों को चाहने वाला
सौ- सौ आँसू पीता !!

सुन चन्दा की चाँदनी
तुम कोई निर्मल आकाश गंगा
फिर भी भागीरथ तुम्हारा
माँगे, जहर भरा प्याला !!
*यह कौन झाँकता शीशे में?
किसका है प्रतिबिम्ब?
मेरा?
नहीं मैं नहीं, कदापि नहीं
मैं ज्ञानी- दानी पराक्रमी
दुनिया का सच्चा उपकारी
नहीं यह मेरा प्रतिबिम्ब!
यह कोई चोर लफंगा लगता
डाकू- लुटेरा दिखता
यह निस्तेज चेहरा
मुँह पर ज्यों थुपी कालिख
कमरे में बस मैं हूं अकेला
फिर, यह कौन
झाँक रहा शीशे में
किसका प्रतिबिम्ब?
मेरा?

केहरी सिंह मधुकर
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*भले सिपाही डोगरे, रौंसली- रौंसली धारायें
तुम्हारे बिन उदास है।
भले सिपाही डोगरे, धारायें रही पुकार
बनफशा के फूल चुन जा।
भले सिपाही डोगरे, दो दिन की छुट्टी आ
सुहानी रुत बीत रही।
भले सिपाही डोगरे, ऊँची हो कर धाराएँ
हैं बाट जोह रही।
भले सिपाही डोगरे, नये नीम्बू की कलियाँ
खिलने को तरस रहीं।।
कृष्ण स्मैलपुरी

यह कौन आया, यह कौन आया!

दुखी मजदूर के माथे पर, यह कैसा किरणों का ताज?
मुर्दों की तरह पीली किसान की आँखों में कैसा प्रकाश?
क्यों चंचल हवा?  क्यों नाच रहे दरख्त?
किसने हारी, भूखी- मांदी , जनता को सरदार बानाया?
रामनाथ शास्त्री

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VOL -  II/ PART -II

(जुलाई -
2006 )

संपादक :  रति सक्सेना


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