मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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कविता लुप्त होते इस समय में कबीर मानस मन में इस तरह बसा है कि गाह- बगाहे हर रूप में याद कर लिया जाता है। मुझे अपने बचपन के दिन याद आए, जब लोक परंपरा में कबीर हर जगह था । जैसे कि होली में गाया जाता , फिर सामुहिक रूप में सरररर, सरररर.. । मैं अपने बचपन और युवा काल में चली जाती हूँ। उन दिनों शादी ब्याहों में रतजगा हुआ करता था। पूरी रात औरते गीत गाया करती थी। जब शादी ब्याह के गीत बीत चुकने की स्थति में आ जाते ढोलक पर थपकार मार जोर से कबीर का एक दोहा गा उठती । दोहा कितना भी दार्शनिक क्यों ना हो उसकी टेक बेहद दैहिक होती थी‍‍-

रति सक्सेना
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अपने विचारों को
संवेदनात्मक भाषा में
लिखते रहो
परवाह न करो
इस बात की
कि क्या कहते हैं लोग
बन जायेगी कविता
अपने आप
तुम्हारी नीन्द खुलने से पहले
रवीन्द्र कुमार दास

अम्मा ने नहीं बताया कि
अब चाय में नहीं लेता चीनी
अम्मा ने नहीं बताया कि अब
खाने में कम लेता हूँ नमक
अब जल्दी आ जाती है थकान
अब रात भर आती नहीं नीन्द अब
अम्मा ने नहीं बताया कि अब
बिल्कुल हो गया हूँ बिल्कुल
अकेला, तन्हा, उदास
अम्मा ने नहीं बताया कि
खाँसते खाँसते आ जाता है
मुंह से खून
झेल रहा हूँ अकेलेपन का त्रास
अम्मा ने नहीं बताया
अजय प्रकाश

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इस बारे में एक बात तो निश्चित कही जा सकती है कि हममे में पागलपन की कमी है, वह पागलपन जो कविता के लिए सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार हो जाए, जब कि विदेश मे मुझे कई उदाहरण मिले हैं जो अपने पागलपन को बनाए हुए है। उदाहरण के लिए इटली का मेसिमो सेनाली जो युवा पीढ़ी में बेहद लोकप्रिय कवि हैं, ने यूनीवर्सिटी की नौकरी दुत्कार कर कविता का गरीब आँचल थाम लिया। बेहद कुशाग्र बुद्धि फेदरिको (इटली)फिजिक्स का प्रफेसर थे पर उन्होने अपने पागलपन के लिए बड़ी नौकरियों को ठुकरा कर कविता और कला को थाम लिया, हाँ ये दोनों पेट पालने के लिए बच्चों को पढ़ाते हैं। हमारे यहाँ एक ऐसे उदाहरण विष्णु प्रभाकर जी रहे हैं, लेकिन वे कथाकार हैं,
रति सक्सेना
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उनकी सोच में प्रगाढ़ पार्थिवता थी जो उनके लोकसंस्कारी स्वभाव के कारण उनकी कविताओं में स्वत: लक्षित होता है। वे गाँव के कृषक-संस्कार के काफ़ी करीब थे जो उन्हें चिरानीपट्टी गाँव और काशी में मिला था। चिरानीपट्टी ने उनको लोक की समझ दी और काशी ने काव्य- चिंतन की। उनका लोक जिन तत्वों से बना है, उसमें बडी़-बडी़ बातों के लिये जगह नहीं। इसलिये त्रिलोचन बातूनी कवि नहीं थे। बिना लाग लपेट के सीधे अपनी बात कहने में विश्वास करते थे, इसलिये कविता के बाहर भी निकल आना चाहते थे अर्थात् कला के बंधन में नहीं फँसते थे। वे वस्तु के निकटतम स्थानापन्न, बल्कि वही हो जाना चाहते थे। जैसे जहां जिस रुप में देखा, हू-ब-हू वैसा ही रच दिया।
त्रिलोचन

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प्रिये ! आई शरद लो वर!

मधुर विकसित पद्म वदनी कास के अंशुक पहनकर,
मत्त मुग्ध मराल कलरव मञ्जु नूपुर सा क्वणित कर
पकी सुन्दर शालियों सी देह निज कोमल सजा कर
रूप रम्या शोभनीय नववधु सी सलजं अन्तर

प्रिये ! आई शरद लो वर!

कास कुसुमों से मही औ" चन्द्र किरणों से रजनी को
हंस से सरिता सलिल औ" कुमुद से सरवर सुरम को,
कुमुद भार विनीवसप्तच्छदों से उन वनान्तों को
शुक्ल करती, प्रतिदिशा में दीप्ति फैला अमल शुचितर,

ऋतु संहार
कालिदास
(पिछले अंक से आगे)
अनुदितः रांगेय राघव

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VOL - III/ PART Xi

(अप्रेल 2008 )

संपादक :  रति सक्सेना


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