मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
कृपया लिंक देखें

 

 

 

कृत्या 2010
अन्तर्राष्ट्रीय  काव्योत्सव

 

 

 

नए दिन की शुरुआत मैं धूल झाड़ने से करती हूं, फर्नीचर पर, अलमारियों में ओर किताबों पर जमी धूल झाड़ते झाड़ते मैं ना जाने कब यादों पर जमी धूल जाड़ने लगती हूं, पता ही नहीं चलता है। मेरे हा् चल रहे हें. लेकिन यादों पर, मन भटक रहा है तो बस बीते हुए वक्त पर। मैं अपने को झकझोर कर कहती हूँ कि भई , यह वक्त आगे का सोचने का है, पीछे का नहीं... लेकिन भविष्य की नींव भूत पर ही तो रखी गई है। लोग जश्न मनाते हैं न॓ साल का, लेकिन नया क्या है इसे समझने में काफी वक्त लगता है। केवल कुछ अंकों के बदलने से, या दीवार पर टंगे कलेण्डर के बदल जाने से क्या क्या बदल सकता है?
मैं फिर धूल झाड़ने लगती हूं, यादों को चमका देती हूँ, लेकिन इससे मन को कष्ट ही होता है। हर याद किसी ना किसी तरफ की कसक लिए ही होती है। मेरी यादों से निकलते हैं केरल के धान के खेत, जो आज किसी सपने की तरह गुल हो गए है, आज सभी खेतों पर करोड़ों की कोठियाँ खड़ी हो गई हैं,  लेकिन आज ये कोठियाँ खाली हैं, क्यों कि उनकी सारी कमाई तो ईँट- गारे में ही खप गई, लेकिन धान का कटोरा खाली हो गया।
रति सक्सेना

और »

 

 

अंधेरी रातों में
याद आती है
कोई कविता।

उसे पढ़ने की जिद
देर तक ढूंढती रहती है
उस दीये की लौ
दिनों पहले ही
जल कर हो चुका है खत्म
जिसका तेल।
सुरेश सेन निशान्त
*
अमृतपान
नहीं चाहता हूँ मैं
नहीं होना चाहता हूँ अमर
देवता बन कर

विष पीना चाहता हूँ
चाहता हूँ तांडव
इस रौरव समय में

दोस्तों उठों!!
उठ के ही मृत्युंजय
शैलेय
*
जब बाढ़ आयी नदियों में
मैंने बादल और पानी को दी
कारण बताओ की चिट्ठी

जब भूकम्प आया तो
मैंने डाँट दिया धरती को
जब झुलसे लोग गर्मी में
तो मैं झल्लाया सूरज पर
ब्रज श्रीवास्तव

*
गिनता है कौन
उनकी भेदी हुई छातियाँ,
बनाते हैं अपने सर से
जो किसी वक्ष मध्य
गड्ढा
छोटा – सा.
के. एस. एस. कन्हैया

और »

 

शुक्लोत्तर समीक्षकों ने कमोबेश इसी लोक अवधारणा का समर्थन अपनी आलोचना में किया है। डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने स्पष्ट कहा है...."मध्य युग में जिसका समर्थन अध्यात्म ने किया है वही आज का मनुष्यत्व है।" इस मनुष्यत्व को बचाए रखना किसी भी भाषा साहित्य का दायित्व है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। भले ही कलावादी चिंतन आलोचना की इस सुचिन्ता का समर्थन न करता हो लेकिन उसके निरन्तर विकासमान रूप की अवहेलना नहीं की जा सकती है । आज की आलोचना परम्परित आलोचना व्यवस्था के प्रति उदास और बेपरवाह दीखती है, तथा समकालीनता के सन्दर्भ में नए मूल्य स्तर की खोज करती है। अपने नए सोच संयम की वजह से आलोचना को नया आयाम मिला है,जिसकी पकड़ के लिए मनुष्य की समझ नितान्त जरूरी है। यदि बदले हुए सामाजिक सोच विचार के कारण कविता का मिजाज बदलता है तो उसकी भूमिका के अनुरूप आलोचना के मूल्यों और मापदण्डों में भी बदलाव आना चाहिए।
डा. अरुण कुमार
 ....और »  

 

अक्कितम

आग में कूदकर मरने के लिए या
आग खाने की लालसा में
आग की ओर समूह में
दौड़े जा रहे हैं छोटे पतंगे?

आग में कूद कर मर जाने ले लिए ही
दुनिया में बुराइयाँ होती हैं क्या?
*
कल आधी रात में बिखरी चाँदनी में
स्वयं को भूल
उसी में लीन हो गया मैं
स्वतः ही
फूट फूट कर रोया मैं
नक्षत्र व्यूह अचानक ही लुप्त हो गया।

पैदा होते ही
भर गई निराशा कैसे?

*
बाँबी की शुष्क मिट्टी के
अन्तः अश्रुओं के सिंचन से
पहली बार विकसे पुष्प!

मानव वंश की सुषुम्ना के छोर पर
आनन्द रूपी पुष्पित पुष्प!

हजारों नुकीली पंखुड़ियों से युक्त हो
दस हजार वर्षों से सुसज्जित पुष्प!
*
अनुवाद - उमेश कुमार सिंह चौहान


और »  

 
धर्म एक ही , जो कि जगत का
प्राणभूत है प्रेम, निराला,
वही न पूर्णेन्दु, सभी हम को
पय पीयूष पिलाने वाला?

है परमेश्वर चैतन्य वही
जो भक्ति दया अनुराग आदि,
कई ढंग के रूप ग्रहण कर
सरंव जगत को प्रकाश देता।

नत होवें उन्नत होवें
कुछ बोवे तो कुछ हम खावें
दिया करें तो कुछ पावें
नाक नरक हम स्वयं बनाएँ

हम मानव और सब प्राणी
सहोदर भाइयों से रहते
ताना बाना खद बना कर
संसार पटल को खुद बुनते।
उसी पंथ का परिपंथी जो
नास्तिकता है , विद्वेष वही,
हा! उस तम में लोक पड़े तो
फल होता मृत्यु अकालिक ही।

है वह दुर्देवता बदलता
दारकर्म को प्रेत कर्म में,
मधुमय फुलवारी को ऊसर,
स्वर्ग लोक को नरक भयंकर।
उल्लूर एस परमेश्वरय्यर
 और »

VOL - V/ PART VIII

(जनवरी -  2010
)

संपादक :  रति सक्सेना


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए