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गिर्मी सेर्पा की कविताएँ

गिमी सेर्पा सिक्किम के लोकप्रिय कवि हैं। गंगटोक का प्राकृतिक सौन्दर्य किसी भी भावप्रवण व्यक्ति को कवि बनाने का दम रखता है, लेकिन कवि सेर्पा  प्रकृति से ऊपर उठ कर मानवीयता को प्रमुखता देते हुए हमें सोचने को विवश करते है कि क्या कारण है कि मनुष्य प्रकृति के करीब होते हुए भी उसकी खूबसूरती को आत्मसात नहीं कर पाता है। स्पष्टवादी कवि सेर्पा पर्वत के नैसर्गिक सौन्दर्य के नाश से तो दुखी हैं ही, संस्कृति में जिस तरह से विदेशी वस्तुओं का प्रवेश होता जा रहा है, वह भी उनके मन को पीड़ा देता है। वे कहते है कि

" मैं चाहता हूँ तोड़ दूँ तुम्हारे घेरे को
तोड़ दूँ तुम्हारे घर की दीवारों को
तुमने जो बीजक मेरे लिए रखा है
मेरे लिए बहुत संकीर्ण हो गया है।
मैं तुम्हे निमन्त्रण देता हूँ
यह आकाश
और महासागर देखने के लिए"


हम उनकी कुछ कविताएँ ले कर आए हैं, जिनका अनुवाद किया है बिर्ख खडका डुबर्सेली नें, और प्रकाशित किया है साहित्य अकादमी ने।


कुछ अंश प्रसिद्ध कविता हिपोक्रिट चाँप गुराँस से

बसन्त में फूल खिलते हैं
उनकी सुन्दरता और सुगन्ध की
फूलों में अदला- बदली होती है।
वे एक दूसरे को रिझाती हैं।
बसन्त के गर्माहट भरे घूँघट में
झपकी ले कर खिले फूलों के संग हौले-हौले
झूम-झूम कर वन्य हरितिमा
शोभा बढ़ाती है...

हेमन्त के बीतने पर
आता है शिशिर
ये फूल, यह हरियाली
लजाए बिना मुरझा जाते हैं
झर जाते है लजाये बिना ही
हालाँकि लिखा जाता है इनके बारे में हरदम


बसन्त और ग्रीष्म ऋतुएँ नहीं होती हैं हमारी
लगता है हम मरुभूमि पर आबाद हैं शायद
मरुभूमि पर चलने वाले तूफान तथा आँधी
उड़ाकर लाए, बालू के कण हमारी आँखों मे
लगे घुसने...

.......

मैं अपनी डफली जोर-जोर से बजाता हूँ
तुम अपनी डफली और जोर से बजाने लगते हो
तुमने मेरी डफली की धुन सुनी
मुझे तुम पर शंका होती है
लेकिन क्या मैं तुम्हारी डफली की धुन नहीं सुन रहा?
मैं, बेशरमी में भूल ही जाता हूँ।

घर, सड़क, विद्यालय, मन्दिर, गुफा
मस्जित और गिरिजाघरों में
पान दूकान, दारू दूकान, दफ्तर, अस्तपताल
और सिनेमा घरों में
हम अपनी अपनी डफली बजाते हैं
खुद नाचते हैं और तमाशा दिखाते हैं

......

डफली माइनस हम.. हम कुछ नहीं
डफली माइनस ..हम कुछ नहीं
डफली ना बजाने की प्रथा आ जाए तो
हम चींटियों की तरह मर जाएंगे
हमारी सभ्यता की दीवारे ढहने लगेंगी

...

क्यों?
हम स्वयं को छुपाना चाहते हैं?
हम दूसरों को धमकाना चाहते हैं?
क्यो किसी को गुमराह करना चाहते हैं हम?
ये सब कदाचित नहीं है
ये सब कदाचित नहीं है
......

उस लहर में
उस अंधड़ में
प्रलय का सन्देश प्राप्त होने पर क्या होगा?
मक्खियों की मृत्यु लेकर लौट रही
इन तर्गों को इन लहरों को
अवश्य होगी आत्मग्लानि

...

मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ!
इस व्यवस्था में जन्मे लोग
व्यवस्था में नामकरण हुए लोग
व्यवस्था से हृदयहीन बने लोग
फूलों को कुचलते दौड़ रहे हैं
दिशा हीन हो
हमारी नदियों और झरनों को रोक रहे हैं
दिशा हीनता में
....

मैं इस तरह बैठा हूँ

यह पूर्वजों का शाप है शायद
कि अभी मैं समुद्र के किनारे की चट्टान हूँ
लहरों पर लहरों के प्रहार में भी
एक अडिग चट्टान हूँ!
कहाँ-कहाँ पहुँचने और ढहाने की चाह रखती तरंगे
क्यों मुझे टुकड़े-टुकड़े कर डालती हैं
क्यों ये मेरा शाप धोती नहीं?

इस समुद्र को देखते हुए बैठे
बहुत युग बीत गए।

मुझे इस युग का शाप है शायद
लगता है कि मैं यह धर्मयुद्ध हार गया हूँ
मेरे स्वप्न का युग आना और बहुत बाकी है, कहते हैं
मेरे शाप की मियाद और बढ़ गयी है, कहते हैं
समुद्री तूफान और आँधी मेरे लिए कुछ नहीं हैं
यहाँ से निकलने वाली आग की ज्वाला
तुम जैसे के लिए, जो श्राप में नहीं पड़ा है
बड़ी जबरदस्त चुनौती है।

इस उजाले को देखो
इस आग की ज्वाला को पकड़कर देखों
अभी तो मुझ पर शाप का प्रभाव नहीं है
पूर्वजों का शाप
युग के शाप से प्रभावहीन घटना बन कर रह गई है
धर्मयुग में मेरी हार में
मुझे धो रही हैं ये तरंगे
मैं उसी तरह बैठा हूँ
मैं उसी तरह सोच रहा हूँ

......

सच है, इन हथेलियों में जान नहीं

आज मैंने फिर अपनी हथेलियों को
स्वयं छूकर देखा
गुदगुदी लहरे नहीं थी अब वहाँ
स्पर्श की पार्श्वध्वनि तक नहीं थीं, वहाँ
मेरे शरीर के रोंगटे
मेरी हैरानगी ने भौंह नचाकर
कुछ कहना चाहा
इस गुदगुदी प्रसंग में यदि कहना हो तो कहें
" इन हथेलियों में अब प्राण नहीं"


हाँ, सच है
इन हथेलियों में अब प्राण नहीं।
इन हथेलियों को लेकर मैं बड़े भ्रम में हूँ
स्वयं को धोखा दे रहा हूँ।
इन दिनों के सन्दर्भ में कहना हो तो कहें
गुदगुदी की तनिक भी जरूरत नहीं है यहाँ।

मृत हथेली
स्पर्शहीन स्पर्श के ढोंग
संवेदनशील स्पर्श की छाप
हम हेर-फेर करते रहते हैं
केवल औपचारिकता के नाम पर।
हमने अपनी गुदगुदी कहाँ छोड़ ऐसी है?
हमारे दिल की धड़कन कहाँ तक सुनी जाती है?
स्पर्श की ताजा स्मृतियाँ कब भूल गये?

बड़ी मुश्किल से याद आये सवाल
किसी जीवित हृदय को पूछना होगा
यहाँ पेड़ों की कतार को
यहाँ के शिखरों को पूछना होगा।
इन हथेलियों में बची-खुची गुदगुदी
ऊँचे शिखर और बड़ी नदी को
मैं और मेरे परिवार खातिर
रक्षा कीजिए!
क्षमा कीजिये!!
कहते हुए बलि चढ़ाये गये इन
तितेपाती की पत्तियों को तोड़ कर सजाए गए..
पत्थरों पर ताजे खून से स्पष्ट लिखा गया है..
मैं और मेरे परिवार मात्र के
शरीर को बाँधा जाए
मेरी ही केवल श्रीवृद्धि हो
मेरी ही केवल अभिवृद्धि हो
इस स्वार्थ का
स्पष्ट उल्लेख किया गया है!

गुदगुदी भरी चंचलता
और व्यग्रता
इस तरह कैद की गयी हैं।
 


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